Saturday, 5 November 2016

मुलायम ने होशियारी से शिवपाल और रामगोपाल को लगाया किनारे

मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी को उसकी स्थापना के बाद से ही यूपी की सबसे अहम पार्टियों में शुमार करा दिया। मुलायम की वजह से समाजवादी पार्टी ने 25 साल में चार बार मुख्यमंत्री दिए। पार्टी की स्थापना के 25 साल पूरे होने पर लखनऊ में समारोह मनाया जा रहा है। इस समारोह के जरिए राजनैतिक ताकत दिखाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे समय में मुलायम की राजनीति पर विमर्श किया जाना सामयिक भी है और लाजिमी भी है। आज भले ही लोग मुलायम सिंह की प्रशंसा करें, पर वह ही ऐसे शख्स हैं जिन्होंने पिछड़ी जाति के लोगों का समाज और राजनीति में सबसे अधिक नुकसान किया है। अब बड़ी होशियारी से अखिलेश यादव का राजनैतिक कद ऊंचा करने के लिए शिवपाल और रामगोपाल यादव को किनारे लगा दिया है। उनका जीवन हमेशा अवसरवादी राजनीति के रुप में जाना जाएगा। मुलायम सिंह का सक्रिय राजनीतिक करियर 1967 में शुरू हुआ जब वह पहली बार उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए चुने गए। बड़े स्तर पर मुलायम सिंह की सियासत का पहला अध्याय 1977 में शुरू होता है। यह कांग्रेस विरोध का दौर था तब उत्तर प्रदेश में संघियों और सोशलिस्टों की मिली-जुली सरकार थी। मुलायम सिंह यादव उस सरकार में सहकारिता मंत्री थे। उसी दौरान मुलायम जाने-माने समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्रा के संपर्क में आए। मुलायम सिंह यादव ने 1980 में तब के उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े समाजवादी नेता लोकबंधु राजनारायण का साथ छोड़कर चौधरी चरण सिंह का हाथ थाम लिया। लोकबंधु राजनारायण को धोखा देने के बाद मुलायम सिंह ने दूसरा शिकार उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के सबसे बड़े नेता रहे चौधरी चरण सिंह को बनाया। 1989 में जब उत्तर प्रदेश सरकार का गठन होने वाला था तब मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दो नेता थे मुलायम सिंह और चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह। अजित सिंह अमेरिका से लौटे थे। वी. पी. सिंह हर हाल में अजित सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। मुलायम सिंह को यह मंजूर नहीं था। मुख्यमंत्री का नाम तय करने के लिए गुजरात के समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को लखनऊ भेजा गया। वे उस समय उत्तर प्रदेश के जनता दल प्रभारी थे। वी. पी. सिंह का दबाव उनके ऊपर था कि अजित को फाइनल करें। यहां मुलायम सिंह यादव ने जबरदस्त राजनीतिक होशियारी दिखाई। चिमनभाई पटेल ने लखनऊ से लौटते ही मुलायम सिंह के नाम पर ठप्पा लगा दिया। मुलायम सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान अयोध्या मुद्दे से मिली। 1990 में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने विवादास्पद बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया था। इसके बाद मुलायम सिंह ने सभी सहयोगियों का साथ छोड़कर खुद अपनी पार्टी बनाने का निर्णय लिया। 4 नवंबर 1991 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी, तब से अबतक पार्टी एक लंबा सफर तय कर चुकी है। समाजवादी पार्टी के 25 साल के इतिहास में कई बड़ी कामयाबियां दर्ज हैं। इस पार्टी के दम पर ही मुलायम सिंह यादव तीन बार खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और महज 38 साल की उम्र में उनके बेटे अखिलेश यादव की भी सीएम के रूप में ताजपोशी हुई। समाजवादी पार्टी को देश की सबसे ताकतवर क्षेत्रीय पार्टियों में से एक बनाने में जिस शख्स ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई वो हैं 77 साल के मुलायम सिंह यादव।  1992 में बाबरी मस्जिद टूटने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति सांप्रदायिक आधार पर बंट गई और मुलायम सिंह को राज्य के मुस्लिमों का समर्थन हासिल हुआ। अल्पसंख्यकों के प्रति उनके रुझान को देखते हुए कहीं-कहीं उन पर ‘मौलाना मुलायम’ का ठप्पा भी लगा। मुलायम सिंह करीब दो दशक से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। मुलायम सिंह की उम्र 77 साल की हो गयी है। वर्ष 2012 में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने तो उनकी छवि शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव के केयरटेकर के रुप में उभर कर सामने आयी। मुलायम सिंह ने 2017 के आम चुनाव से पहले कुछ ऐसी चाल चली कि अखिलेश के आगे दोनों बौने नजर आने लगे हैं। यह बात भले ही शिवपाल और रामगोपाल और उनके समर्थक न मानें, पर सच्चाई यही है। पारिवारिक विवाद में जिस तरह से मुलायम सिंह ने अखिलेश और रामगोपाल को बेवकूफ बनाया, उससे इन दोनों का ही नुकसान हुआ और राजनैतिक रुप से हाशिए पर आ गए। अब पूरी तरह से आने वाले समय में समाजवादी पार्टी पर अखिलेश यादव का ही एकाधिकार नजर आएगा। 

Monday, 22 August 2016

जिन बातों पर राजन नापसंद, उन्हीं पर पहली पसंद बने पटेल

रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया के नए गवर्नर उर्जित पटेल होंगे। उर्जित फिलहाल आरबीआई के डिप्टी गवर्नर हैं। खास बात ये है कि बीजेपी नेता सुब्रमणियन स्वामी जिन बातों को लेकर रघुरामराजन पर हमलावर थे, उर्जित में भी वही बातें हैं। लेकिन इस बार स्वामी विरोध नहीं बल्कि समर्थन कर रहे हैं। उर्जित पटेल को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का नया गवर्नर नियुक्त किया गया है। वह रघुराम राजन का स्थान लेंगे जो कि चार सितंबर को गवर्नर पद से मुक्त हो रहे हैं। उर्जित पटेल इस समय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर हैं। नए आरबीआई गवर्नर के तौर पर उर्जित पटेल की नियुक्ति को लगता है भाजपा नेता सुब्रहमण्यम स्वामी का समर्थन हासिल है। स्वामी ने निवर्तमान आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन पर कई हमले किए थे। कई रीट्वीट और अपने ट्विटर फॉलोवरों को जवाब देते हुए स्वामी ने कहा कि यह सोचना बेवकूफाना होगा कि वह पटेल की इस बात के लिए आलोचना करने की सोचेंगे कि उनका जन्म केन्या में हुआ। मुद्रास्फीति को रोकने के लिए ब्याज दर कम नहीं करने की राजन की नीति के स्वामी कटु आलोचक रहे हैं। स्वामी ने उम्मीद जताई कि पटेल वैसे आक्रामक नहीं होंगे। जब स्वामी के एक फॉलोवर ने केन्या का नागरिक होने के कारण पटेल की आलोचना की तो स्वामी ने कहा कि वह केन्या के नागरिक नहीं हैं, वह थे। आर 3 का जन्म भारत में हुआ और उन्होंने भारत में 2007 से रहने के बावजूद अपना ग्रीन कार्ड बरकरार रखना चुना। आर 3 रघुराम राजन का उल्लेख करने के लिए आदिवर्णिक शब्द है। इसका उन्होंने ब्याज दर ऊंची रखकर विकास को नुकसान पहुंचाने के लिए राजन पर हमला करने के दौरान कई बार इस्तेमाल किया। उनके ट्वीट की वजह से उनके फॉलोवरों ने दावा किया कि वह पटेल की नियुक्ति का समर्थन कर रहे हैं। स्वामी ने एक फॉलोवर की टिप्पणी को रीटवीट किया। इसमें कहा गया है, ऐसा लगता है कि स्वामी उर्जित पटेल की नियुक्ति को स्वीकति दे रहे हैं। जब एक ट्विटर पर मौजूद व्यक्ति ने कहा कि मैं सुनिश्चित हूं कि स्वामी इस नियुक्ति से खुश नहीं हैं तो भाजपा सांसद ने पलटकर कहा कि बकवास। स्वामी ने एक फॉलोवर के टवीट को रीट्वीट किया जिसमें कहा गया है, अलविदा रघुराम राजन। कोई और शौक चुनें। शुक्रिया। स्वागत उर्जित पटेल। स्वामी ने इससे पहले आरोप लगाया था कि राजन देश के लिए उपयुक्त नहीं हैं और उन्होंने कहा था कि राजन ने मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करने की आड़ में ब्याज दरों में वद्धि की जिससे देश को नुकसान हुआ। आश्चर्यजनक तरीके से राजन ने जून में आरबीआई कर्मियों को भेजे गए पत्र में घोषणा करते हुए कहा कि वह शिक्षण कार्य में लौटेंगे और दूसरा कार्यकाल नहीं लेंगे।

इन बातों पर हुआ था राजन का विरोध
1. विदेशी मानसिकता
भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी बोले- अमेरिका में पढ़े राजन ग्रीन कार्ड होल्डर हैं। दिमागी तौर पर पूरे भारतीय नहीं हैं।
हकीकत: पटेल की तो स्कूलिंग भी विदेश की है उर्जित मूल रूप से गुजरात के खेड़ा जिला के महुधा गांव के हैं। माता-पिता केन्या में रहते थे। जन्म नैरोबी में हुआ था। स्कूलिंग से पीएचडी तक लंदन और अमेरिका की।

2. सिर्फ महंगाई की चिंता, इंडस्ट्री की नहीं
राजन पर आरोप लगा कि उन्होंने स्माल इंडस्ट्रीज को नुकसान और अमेरिका को फायदा पहुंचाया।
हकीकत: राजन का यह फैसला उर्जित कमेटी की सिफारिश पर ही लिया गया था। उर्जित की अध्यक्षता वाली कमेटी ने सिफारिश की थी कि रिजर्व बैंक महंगाई रोकने पर ध्यान दे। और खुदरा महंगाई दर 4% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।

3. यूपीए के करीबी
कहा गया कि राजन की नियुक्ति यूपीए समय की है। वे अब भी चिदंबरम के करीबी बने हुए हैं।
हकीकत: उर्जित ने यूपीए का 100 डे प्लान बनाया। यूपीए सरकार ने ही उर्जित को आरबीआई का डिप्टी गवर्नर बनाया था। उस समय उन्होंने ही यूपीए-2 का 100 दिन का प्लान बनाया था। ये भी चिंदबरम के करीबी हैं।

अब यह कहा स्वामी ने?
-उर्जित पटेल को आरबीआई गवर्नर बनाए जाने के फैसले का स्वामी ने स्वागत किया। ट्विटर पर जब लोगों ने पटेल पर स्वामी का रिएक्शन जानना चाहा तो उन्होंने कहा-पटेल केन्या के नागरिक हैं नहीं बल्कि थे। राजन भारत में पैदा हुए, 2007 से यहीं रह रहे थे लेकिन ग्रीन कार्ड अमेरिका का रखे हुए थे।
- स्वामी ने ये भी कहा कि सिर्फ केन्या में जन्मे होने की वजह से पटेल को क्रिटिसाइज करना मूर्खता होगी। उम्मीद ये करनी चाहिए कि वो राजन की तरह तेज नहीं होंगे।

इसलिए बनी उर्जित के नाम पर सहमति
1. रघुराम राजन ने ही की पहली सिफारिश
- सबसे पहले रघुराम राजन ने उर्जित पटेल का नाम सुझाया था। उनका कहना था कि जो काम तीन साल में हुए, उनमें पटेल की अहम भूमिका।
2. उर्जित पटेल को हमेशा आगे रखा
- उर्जित सबसे अहम मॉनिटरी पॉलिसी डिवीजन के प्रमुख थे। पॉलिसी से जुड़े सवालों के दौरान राजन उन्हें ही जवाब देने के लिए आगे करते थे।
3. नॉन ब्यूरोक्रेसी बैंकग्राउंड होना
-आरबीआई में 5 डिप्टी गवर्नरों में एक अर्थशास्त्री होता है। पटेल ब्यूरोक्रेसी कैटेगरी से थे। इसका फायदा आरबीआई को आगे भी मिलेगा।

कौन हैं उर्जित पटेल?
- 52 साल के पटेल को इस साल जनवरी में तीन साल के लिए री-अप्वॉइंट किया गया था। वे 11 जनवरी 2013 को आरबीआई से जुड़े।
- रघुराम राजन के आने से पहले ही वे आरबीआई में आ गए थे।
- राजन और उर्जित में समानता ये है कि दोनों वाशिंगटन में आईआईएफ में साथ काम कर चुके थे।
- उर्जित कई फाइनेंशियल कमेटी के मेंबर रह चुके हैं। 2014 में देश में पहली बार महंगाई दर का लक्ष्य तय करने का फैसला भी पटेल की अगुआई वाली कमेटी की सिफारिशों के आधार पर ही हुआ था।
-पटेल ने कहा था कि खुदरा महंगाई का लक्ष्य 4% रखा जाना चाहिए और इसमें 2% कम-ज्यादा की गुंजाइश हो।
- आरबीआई में आने से पहले पटेल बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के एडवाइजर थे।

ये होंगी चुनौतियां
- आरबीआई के नए गवर्नर के पास सबसे बड़ी चुनौती महंगाई कंट्रोल करने की होगी।
- महंगाई को लेकर पटेल का रुख राजन के ही समान है। राजन भी ग्रोथ के बजाय महंगाई को ज्यादा तवज्जो देते रहे हैं।
- माना जा रहा है कि ब्याज दरों पर रिजर्व बैंक की सख्त नीति बरकरार रहेगी।
- साथ ही मोदी सरकार के कई अहम रिफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधे पर होगी।
- कहा जाता है कि राजन को बनाए रखने के लिए इंडस्ट्री से लेकर फाइनेंस मिनिस्ट्री तक की रजामंदी थी।
- ऐसे में नए सिरे से काम शुरू करते वक्त उर्जित पटेल को इसी तरह का सपोर्ट हासिल करना होगा।

उर्जित पटेल के बारे में 
केन्या में हुआ जन्म
उर्जित पटेल का जन्म केन्या में हुआ था। उनके दादा गुजरात से 20वीं शताब्दी में केन्या गए थे। उनके पिता की नौरोबी में स्पेयर पार्ट्स की दुकान थी।

विदेश मे हुई पढ़ाई
वहीं वह पढ़ाई के लिए यूके और यूएस में रहे। उन्होंने येल यूनिवर्सिटी से 1990 में अर्थशास्त्र में डाक्टरेट की और इससे पहले 1986 में आॅक्सफोर्ड से एम फिल किया। उन्होंने भारत में पोस्टिंग होने के बाद ही गुजराती और हिंदी सीखी थी।

पहले गुजराती गवर्नर के गांव से नाता
उनके दादाजी गुजरात के गांव पालना से थे। यह वही गांव है जहां से देश को फइक के पहले गुजराती गवर्नर मिले। वह थे आईजी पटेल।

मां के लिए छोटे घर में आए
पटेल के पिताजी की मौत के बाद से मां उनके साथ रहती है। कुछ महीने पहले उन्होंने मुंबई के एक छोटे से घर में शिफ्ट कर लिया क्योंकि आॅफिस से मिले चार रूम के बेडरूम वाले घर में उनकी मां का दिल नहीं लगता था।

मनमोहन सिंह ने बताया था ‘सबसे जरूरी’
 2013 में उर्जित ने आरबीआई का डिप्टी गवर्नर बनने के वक्त भारतीय पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया था। उनका पासपोर्ट बनाने की पैरवी खुद उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी। मनमोहन सिंह ने उन्हें देश के लिए बहुत जरूरी शख्स बताया था।

तीन बड़ी चुनौतियों से सामना करना होगा

1. सरकारी बैंकों का डूबता कर्ज कैसे बचाया जाए
पिछले एक साल में करीब 39 लिस्टेट बैंकों का कुल एनपीए 96% प्रतिशत तक बढ़ गया है। यानी कुल 6.3 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बैंकों का देनदारों के बीच फंसा है जो कि साल 2015 में 3.2 लाख करोड़ था। इसी साल जून में रिजर्व बैंक ने एक रिपोर्ट में कहा है कि अगले साल तक ये कुल कर्ज़ का 8.5 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। मौजूदा गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों को डूबते कर्ज़ को अपनी बैलेंसशीट से हटाने के लिए मार्च 2017 तक का समय दिया है। इस स्थिति से निपटना उर्जित के लिए पहली बड़ी चुनौती होगी।

2. मुद्रा नीति के लिए समिति
उर्जित ब्याज दरों को तय करने के लिए बनी समिति मोनेटरी पॉलिसी कमिटी के पहले अध्यक्ष होंगे। छह सदस्यीय इस समिति को ही ब्याज दरों पर निर्णय लेना है। अगर किसी मामले पर वोटिंग करना पड़ता है तो वहां गवर्नर के पास वीटो पावर नहीं बल्कि वोट करने का अधिकार दिया गया है। इसके अलावा खुदरा महंगाई दर अगले पांच साल के लिए 4% तय किया गया है। 2% इसके ऊपर या नीचे ही हो सकता है। नए गवर्नर के लिए ये भी एक बड़ी चुनौती होगी।

3. डॉलर कर्ज भुगतान
उर्जित पटेल को पहला बड़ा टास्क अगले ही महीने मिलेगा। भारत 2000 करोड़ डॉलर के बॉन्ड्स भुनाएगा। बैंकों ने पिछले कुछ वर्षों में विदेशी बाजारों से ये रकम वसूल की थी। इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत आज 67 रुपये के इर्दगिर्द चल रही है। इसे नियंत्रित करना भी उर्जित के लिए बड़ी चुनौती होगी।

Thursday, 28 April 2016

दारा सिंह की रिहाई के लिए उठी आवाज

श्री माता बाला सुंदरी देवा जी धाम करनाल में दारा सिंह जी की जेल रिहाई के लिए विशेष बैठक हुई, जिसमें साध्वी देवा ठाकुर जी ने तुरंत करवाई करते हुए गृहमंत्री  राजनाथ सिंह जी के पास फोन किया और उनसे दारा सिंह जी की रिहाई की माँग की। साघ्वी के मुताबिक गृहमंत्री  राजनाथ सिंह जी ने भी दारा सिंह की रिहाई का आश्वासन दिया। जल्द ही साध्वी देवा ठाकुर अपने समर्थकों के साथ जल्द ही गृहमंत्री  राजनाथ सिंह से मिलेंगी और दारा सिंह को जल्द से जल्द रिहा करवाने का हर संभव प्रयास करेंगी। इस बैठक में अरविंद सिंह जी (दारा सिंह के भाई), धर्मयोद्धा अनुपम बजरंगी, लकी ठाकुर,राजीव ठाकुर आदि लोग सम्मलित हुए। हिन्दू हित के लिए 17 साल पहले उड़ीसा में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले महाप्रतापी दारा सिंह के भाई अरविन्द लगातार दारा सिंह को रिहा कराने के अभियान में लगे हुए हैं। 

Wednesday, 27 April 2016

2 साल में 3 बार संसद पहुंचे मिथुन

मिथुन चक्रवर्ती के राज्यसभा की कार्यवाही में मौजूद रहने से छुट्टी मांगने पर सांसदों ने एतराज जताया है। टीएमसी सांसद ने बीमारी के चलते सदन में आने से छूट की एप्लिकेशन दी है। इस पर जेडीयू सांसद केसी त्यागी और सपा के नरेश अग्रवाल का अपर हाउस में ही गुस्सा फूट पड़ा। बता दें कि मिथुन को टीएमसी ने 2 साल पहले राज्यसभा भेजा था। इस दौरान वे महज तीन बार ही सदन में मौजूद रहे।  मिथुन ने मंगलवार को अपर हाउस की कार्यवाही में शामिल होने से छूट देने की एप्लिकेशन दी। जिस पर सांसदों ने एतराज जताया है। मिथुन ने अपनी लीव एप्लीकेशन के साथ मेडिकल सर्टिफिकेट भी दिया है।  उनके छुट्टी मांगने पर टीएमसी नेताओं ने हाउस को बताया-मिथुन को हेल्थ प्रॉब्लम्स हैं। वे बीमार भी हैं और उनकी आॅथोर्पेडिक सर्जरी भी हुई है। इस पर जेडीयू और सपा के सांसदों ने कहा-वह शख्स जो फिल्मों के अपने प्रोफेशनल वर्क में बिजी है, उसके पास हाउस की कार्यवाही में शामिल होने का टाइम कैसे नहीं है। टीएमसी नेताओं ने इन आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया कि मिथुन फिल्मों में बिजी हैं, लेकिन सदन में मौजूद होने के समय बीमार कैसे हो जाते हैं। बता दें कि 2 साल में तीन बार सदन पहुंचे मिथुन ने एक बार भी स्टेटमेंट नहीं दिया है।

Wednesday, 13 April 2016

अकेले अंबेडकर को संविधान का भगवान मानना गलत

बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर भारत देश ही नहीं अपितु दुनिया के अमूल्य धरोहर हैं। अस्पृश्यता के विरुद्ध उनके द्वारा चलाए गए आन्दोलन वरेण्य हैं।  इस देश की माटी का कण-कण उनका अभिनंदन करता है। किन्तु यह अत्यंत निन्दनीय है कि अकेले अंबेडकर को भारतीय संविधान का भगवान बताकर आने वाली पीढ़ी को इतिहास की सच्चाई से भटकाने की घृणित कोशिश की जा रही है।

ऐसे हुआ भारतीय संविधान का निर्माण

--संविधान सभा की प्रेरणा का स्रोत 17वीं और 18वीं शताब्दी की लोकतांत्रिक क्रांतियां हैं। इन क्रांतियों ने इस विचार को जन्म दिया कि शासन के मूलभूत कानूनों का निर्माण नागरिकों की एक विशिष्ट प्रतिनिधि सभा द्वारा किया जाना चाहिए।

--भारत की संविधान सभा का निश्चित उल्लेख भारत शासन अधिनियम, 1919 के लागू होने के पश्चात 1922 में महात्मा गांधी ने किया था।

--जनवरी 1925 में दिल्ली में हुए सर्वदलीय सम्मेलन के समक्ष कॉमनवेल्थ आॅफ इण्डिया बिल को प्रस्तुत किया गया, जिसकी अध्यक्षता महात्मा गाँधी ने की थी। भारत के लिए एक संवैधानिक प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत करने का यह प्रथम प्रमुख प्रयास था।
---19 मई, 1928 को बंबई में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन में भारत के संविधान के सिद्धांत निर्धारित करने के लिए मोतीलाल नेहरु के सभापतित्व में एक समिति गठित की गई। 10 अगस्त, 1928 को प्रस्तुत की गई इस समिति की रिपोर्ट की नेहरू रिपोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। इसे लगभग ज्यों-का-त्यों 21 वर्ष बाद 20 नवंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत स्वाधीन भारत के संविधान में समाविष्ट कर लिया गया।

---जून 1934 में कांग्रेस कार्यकारिणी ने घोषणा की कि श्वेत-पत्र का एकमात्र विकल्प यह है कि वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित संविधान सभा द्वारा एक संविधान तैयार किया जाए। यह पहला अवसर था जब संविधान सभा के लिए औपचारिक रूप से एक निश्चित मांग प्रस्तुत की गयी।
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1940 के अगस्त प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार ने संविधान सभा की मांग को पहली बार अधिकारिक रूप से स्वीकार किया, भले ही स्वीकृति अप्रत्यक्ष तथा महत्वपूर्ण शर्तो के साथ थी। यद्यपि 1942 का क्रिप्स मिशन पूर्णत: असफल सिद्ध हुआ, फिर भी उसमें संविधान सभा बनाने की बात को स्वीकार कर लिया गया था।
---अंतत: कैबिनेट मिशन, 1946 द्वारा संविधान निर्माण के लिए एक बुनियादी ढांचे का प्रारूप प्रस्तुत किया गया।
--- निर्धारित फॉर्मूले के अनुसार संविधान सभा में प्रांतों के अधिक-से-अधिक 296 सदस्य हो सकते थे और देशी राज्यों के 93।

--संविधान सभा में अंतिम रूप से प्रांतों के केवल 285 और देशी रियासतों के 78 प्रतिनिधि थे तथा संविधान के अंतिम मूल मसौदे पर इन्हीं 808 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए गए।
---संविधान सभा के सर्वाधिक प्रभावशाली सदस्य थे- डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, जवाहरलाल नेहरु, वल्लभ भाई पटेल, डॉ. अम्बेडकर, गोविंद वल्लभ पंत, एन.जी.आयंगर, कृष्णास्वामी अय्यर, के. एम. मुंशी, आचार्य कृपलानी तथा श्यामाप्रसाद मुखर्जी।

--- तेजबहादुर सपू और जयप्रकाश नारायण को भी संविधान सभा की सदस्यता के लिए आमंत्रित किया गया था, किन्तु सप्रू स्वास्थ्य संबंधी कारणों के आधार पर इसे स्वीकार न कर सके और जयप्रकाश नारायण ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

---संविधान को सफलतापूर्वक निर्मित करने के उद्देश्य हेतु संविधान सभा ने कुल 22 समितियों का गठन किया, जिसमें 10 कार्यविधिक मामलों संबंधी एवं 12 तात्विक मामलों की समितियां थीं।

प्रारूप समिति (अध्यक्ष-बी.आर. अम्बेडकर)
प्रारूप समीक्षा समिति (अध्यक्ष-सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर)
समझौता समिति (अध्यक्ष-राजेंद्र प्रसाद)
संघ संविधान समिति (अध्यक्ष-जवाहरलाल नेहरू)
प्रांतीय संविधान समिति (अध्यक्ष-सरदार वल्लभ भाई पटेल)
मुख्य आयुक्त (प्रांत) समिति मूल अधिकार एवं अल्पसंख्यक समिति (अध्यक्ष-सरदार वल्लभ भाई पटेल)
भाषायी प्रांत समिति संघ शक्ति समिति (अध्यक्ष- जवाहरलाल नेहरू)

--संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर, 1946 को संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में संपन्न हुआ। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को सर्वसम्मति से संविधान सभा का अस्थायी अध्यक्ष चुन लिया गया। इसके पश्चात् 11 दिसम्बर, 1946 को कांग्रेस के नेता डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित किए गए। 13 दिसम्बर, 1946 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा उद्देश्य-प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्ताव में भारत के भावी प्रभुसत्तासंपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की रुपरेखा प्रस्तुत की गई थी।

---सम्पूर्ण संविधान निर्माण में 2 वर्ष, 11 मास और 18 दिन लगे। इस कार्य पर लगभग 64 लाख रुपये व्यय हुए। संविधान के प्रारूप पर 114 दिन तक चर्चा चली। अंतिम रूप में संविधान में 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां कायम की गईं।

---नागरिकता, निर्बचन, अंतरिम संसद, अल्पकालिक एवं परवर्ती उपबंध जैसे संविधान के कुछ अनुच्छेद संविधान की स्वीकृति के तुरन्त पश्चात अर्थात 26 नवम्बर, 1946 से ही लागू कर दिए गए थे, जबकि शेष संविधान 26 जनवरी, 1950 से संपूर्ण देश में लागू हुआ। 

Tuesday, 12 April 2016

महाराष्ट्र के 15 हजार गांव में गंभीर जलसंकट

 सूखे से जूझ रहे महाराष्ट्र के लातूर जिले के लिए पानी लेकर पहली ट्रेन मंगलवार सुबह यहां पहुंच गई। इस ट्रेन ने 350 किलोमीटर की दूरी 18 घंटे में तय की। हालांकि लोगों तक इसका पानी काफी देर से पहुंच पाएगा। पहले इस पानी को फिल्टर किया जाएगा। ट्रेन से कुल पांच लाख लीटर पानी भेजा गया है। लातूर में धारा 144 लागू है। इस बीच नेताओं में क्रेडिट लेने को होड़ मच गई है। मौजूदा समय में राज्य में करीब 15,000 गांव गंभीर जलसंकट से जूझ रहे हैं, जिनमें से अधिकांश गांव लातूर, बीड और उस्मानाबाद जिले में आते हैं।

कुछ ऐसी है महाराष्ट्र की हालत
- महाराष्ट्र में साल 2016 में हर महीने करीब 90 किसानों ने सुसाइड किया।
- कई तालाबों और नदियों में पानी 4% से भी कम बचा है।
- लगातार चौथी बार महाराष्ट्र सूखे का सामना कर रहा है।
- सबसे ज्यादा असर औरंगाबाद, लातूर और विदर्भ के जिलों में देखने को मिल रहा है।

कहां-कहां हैं सूखे जैसे हालात?
- महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में नदी और डैम पूरी तरह से सूख चुके हैं।
- आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी बेहाल।
- यूपी और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में बंदूकों के सहारे पानी की निगरानी की जा रही है।

सामान्य से ज्यादा बारिश की उम्मीद
 पिछले दो साल बरसात में कमी और सूखे जैसी स्थिति के बाद सरकार ने सोमवार को कहा कि इस वर्ष मानसून के सामान्य रहने की उम्मीद है। उसने तथा राज्यों को निर्देश दिया कि वे जून से शुर होने वाली खरीफ सत्र में फसल का रकबा और उत्पादन बढ़ाने की योजना तैयार करे। कृषि सचिव शोभना के पटनायक ने वर्ष 2016.17 के लिए खरीफ अभियान को शुरू करने के लिए एक रारष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, अल नीनो (समुद्री सतह के तामान में बदलवा की घटना) के प्रभाव में गिरावट आ रही है। ऐसी उम्मीद है कि इसके बाद ‘ला नीना’ की स्थिति आयेगी और जिससे इस वर्ष मानसून बेहतर हो सकता है।

Monday, 11 April 2016

‘नीट’ के जरिये ही होंगे निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश

 अपने एक फैसले को वापस लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निजी मेडिकल कालेजों में दाखिले राष्ट्रीय योग्यता प्रवेश परीक्षा (नीट) के आधार पर होंगे। संविधान पीठ ने सोमवार को दिए अपने आदेश में कहा कि यह फैसला उचित नहीं था इस फैसले में न तो बहुमत के दृष्टिकोण पर विचार किया गया और न ही पीठ के सदस्यों के साथ विमर्श किया गया। इसलिए इस निर्णय पर पुनर्विचार का आदेश दिया जाता है और इसे वापस लिया जाता है।
इस आदेश का देशभर के 600 मेडिकल कालेजों पर असर होगा जो अपने टेस्ट के आधार पर मेडिकल कोर्सों में प्रवेश देते हैं। पूर्व के आदेश में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने कहा था कि निजी मेडिकल कालेजों में प्रवेश नीट के जरिये करने की जरूरत नहीं है। इस पीठ में जस्टिस एआर दवे भी थे। ये कालेज ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सों में प्रवेश अपने टेस्ट के आधार पर कर सकते हैं। पीठ का कहना था कि मेडिकल कौंसिल को नीट कराने का अधिकार नहीं है, यह सिर्फ मेडिकल शिक्षा का विनियमन ही कर सकती है। सोमवार को जस्टिस एआर दवे की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने 18 जुलाई 2013 का फैसला वापस लेते हुए कहा कि इस मामले में दोबारा से सुनवाई होगी। इस आदेश में निजी मेडिकल कालेजों को नीट के दायरे से बाहर कर दिया गया था। संविधान पीठ ने कहा कि पूर्व के फैसले में खामियां थी और इसमें बहुमत के दृष्टिकोण पर विचार नहीं किया गया और न ही स्थापित तथा बाध्यकारी नजीरों पर विचार हुआ। इसलिए हम इस फैसले पर पुनर्विचार करने की याचिका को स्वीकार करते हैं और 18 जुलाई 2013 को सुनाए गए फैसले को वापस लेते हें। साथ ही मामले का नए सिरे से सुनने के आदेश देते हैं। इस फैसले के खिलाफ मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया ने पुनर्विचार के लिए याचिका दायर की थी। उसने कहा था कि टेस्ट कराने का मकसद मेरिट को जांचना है क्योंकि एमबीबीएस करने वाले छात्र डाक्टर बनते हैं जो लोगों को इलाज करते हैं।



Sunday, 10 April 2016

भारत में अब भी सिर्फ 27 फीसदी महिला कर्मचारी

खेल हो या राजनीति, विज्ञान हो या तकनीक, महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। हालांकि भारत के कार्य बल में उनकी हिस्सेदारी अब भी बेहद कम है। देश के कुल कामकाजी लोगों में सिर्फ 27 फीसदी महिलाएं हैं। इंडिया स्पेंड की ओर से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत में पिछले 10 सालों में 2.5 करोड़ महिलाओं ने नौकरी छोड़ी है। कार्य बल में महिलाओं की हिस्सेदारी के मामले में हम बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे हैं। भारत के कामकाजी लोगों में महिलाओं की संख्या बेहद कम है। इस मामले में हमारा देश दक्षिण एशिया में सिर्फ पाकिस्तान से ही बेहतर स्थिति में है। इंडिया स्पेंड की ओर से जुटाए आंकड़ों के मुताबिक स्वास्थ्य और शिक्षा के लिहाज से महिलाओं की स्थिति पहले से काफी बेहतर हुई। बावजूद इसके कार्य क्षेत्र और पेशेवर जगत में उनकी भागीदारी बढ़ने के बजाय घटती जा रही है।

शिक्षा में स्थिति बेहतर हुई पर काम में नहीं
इंडिया स्पेंड के आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2005 में सेकेंडरी एजुकेशन से जुड़े कोर्स में जहां 49.5 फीसदी महिलाएं शामिल थीं वहीं 2012 में इनकी हिस्सेदारी बढ़कर 69.4 फीसदी हो गई। इसी तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उनकी स्थिति में सुधार हुआ है। साल 2005 में जहां जन्म के समय महिलाओं की औसतन जीवन प्रत्याशा 65.4 साल थी, वहीं साल 2012 में यह बढ़कर 68.7 साल हो गई। स्वास्थ्य और शिक्षा में स्थिति सुधरने के बावजूद कार्य बल में महिलाओं की भागीदारी कम हुई है। साल 2005 में देश के कुल कामकाजी लोगों में जहां 36.9 फीसदी महिलाएं थीं, वहीं साल 2012 में उनकी हिस्सेदारी घटकर 26.9 फीसदी पर पहुंच गई।

Friday, 1 April 2016

50 लाख से अधिक आमदनी वालों पर कड़ी नजर

 आयकर विभाग ने आकलन वर्ष 2016-17 के लिए नए आयकर रिटर्न (आईटीआर) फार्म अधिसूचित किए हैं जिसके तहत 50 लाख रुपये सालाना आमदनी और याच, विमान और बहुमूल्य जेवरात का शौक पूरा करने में समर्थ लोगों को इन महंगी परिसंपत्तियों का खुलासा करना होगा. नए फार्म का उपयोग आज से शुरू हो रहे नए वित्त वर्ष से होगा. वित्त मंत्रालय ने इस संबंध में 30 मार्च को राजपत्रित आदेश प्रकाशित किया और करदाता 31 जुलाई तक अपने आयकर रिटर्न भर सकते हैं. विभाग ने नए आईटीआर (आइटीआर-2 और 2ए) फार्म में नया प्रावधान ह्यसाल के अंत तक परिसंपत्ति एवं देनदारी' किया है जो ऐसे मामलों में लागू होगा जिनमें कुल आय 50 लाख रुपये से अधिक है. इस आयवर्ग में आने वाले व्यक्तियों और इकाइयों को ऐसी परिसंपत्तियों की कुल लागत का भी उल्लेख करना होगा.इसलिए नयी आईटीआर प्रणाली के तहत जमीन और मकान जैसी अचल परिसंपत्तियों, नकदी, जेवरात, सरार्फा, वाहन, याच, नाव और विमान जैसी चल परिसंपत्तियों की भी जानकारी कर अधिकारियों को देनी होगी. इन उच्च मूल्य वाली परिसंपत्तियों की जानकारी देने वालों को इस सामान से जुड़े उत्तरदायित्व का खुलासा करना होगा.एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ह्यह्य50 लाख रुपये सालाना से अधिक आमदनी दर्ज करने वालों के लिए नयी खुलासा प्रणाली उच्च निवल मूल्य वाले लोगों और इकाइयों द्वारा की जाने वाली कर चोरी पर लगाम लगाने के लिए बनायी गयी है. उनका आयकर रिटर्न अब तक एक ही फार्म में शामिल होता था लेकिन अब कर अधिकारियों को सूचित करने के लिए नए विशिष्ट कॉलम आवश्यक है.' पहली बार आईटीआर को सरकार की स्टार्टअप कारोबार को बढवा देने के प्रमुख एजेंडे को ध्यान में रखकर इस क्षेत्र से आय अर्जित करने वालों के लिए एक अलग कॉलम लाया गया है. आईटीआर-2ए, ऐसे लोग या एचयूएफ दाखिल करेंगे जिनकी आय न कारोबार, प्रोफेशन या पूंजी लाभ के जरिए होती है और न ही उनके पास विदेशी परिसंपत्ति है. इस में एक नया कॉलम पास थ्रू इनकम (पीटीआई) है और इसके तहत आयकर अधिनियम उद्यम पूंजी कंपनी में किए गए निवेश कारोबार न्यास या निवेश कोष का ब्योरा मांगा गया है जो उभरती कंपनियों या स्टार्टअप कंपनियों से जुड़ा है.
 वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2016-17 के बजट में घोषणा की थी कि स्टार्टअप को तीन साल के लिए 100 प्रतिशत छूट मिलेगी. इस साल के लिए संबंधित फार्म आठ पन्ने (परिशिष्ट समेत) का हो गया है जो पिछले वित्त वर्ष में सात पन्ने का था. आईटीआर-2 का उपयोग भी उसकी प्रकार की इकाइयां करती हैं पर उनके पास विदेशी परिसंपत्तियां होती हैं. इस फार्म में नया पीटीआई कॉलम शामिल है. कुल नौ आईटीआर अधिसूचित किए गए हैं. इनमें सहज आईटीआर-1, आईटीआर-2, आईटीआर-2ए, आईटीआर-3, सुगम (आईटीआर-4एस), आईटीआर-4, आईटीआर-5, आईटीआर-6, आईटीआर-7 और एक पावती फार्म आटीआर-वी शामिल हैं. सबसे आसान आईटीआर-1 (सहज) उन लोगों के लिए है जो वेतन भोगी हैं, एक घर है या अन्य स्रोत हैं. इसमें अब एक-एक अतिरिक्त कॉलम होगा, जिसमें कर संग्रह स्रोत (टीसीएस) का होगा और इस फार्म में अब सात पन्ने होंगे जो पहले पांच पन्नों का होता था. विभाग ने ऐसे कॉलम में कोई बदलाव नहीं किया है जिसमें व्यक्तियों या इकाइयों से विदेशी परिसंपत्तियों के खुलासे की मांग की गयी हो इसके अलावा आधार संख्या, व्यक्तिगत मोबाइल फोन नंबर और ईमेल आईडी जैसी विशिष्ट जानकारियों की अनिवार्यता यथावत रखी गयी है. पासपोर्ट की जानकारियां इस बार भी अनिवार्य की गयी है. व्यक्तियों और इकाइयों को पिछले वर्ष अपने नाम के बचत और चालू बैंक खातों की संख्या का विवरण देने की अनिवार्यता इस भी बनाए रखी गयी है. इसमें निष्क्रिय खातों की जानकारी देने की जरूरत नहीं है.

Saturday, 26 March 2016

छलावे की राजनीति से तौबा करना चाहता है उत्तर प्रदेश का नौजवान

उत्तर प्रदेश का नौजवान कशमकश में है। पिछले दो दशक से यहां का नौजवान छलावे की राजनीति का शिकार होता आ रहा है। कभी वह बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के छलावे में फंसा तो कभी सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के झांसे में आकर अपने जीवन के कीमती समय को गवांया। बदले में कुछ भी हासिल नहीं हुआ, सिवाय बेबसी और बेकारी के। 2017 में एक बार फिर निर्णय लेने का समय आ गया है। नौजवानों पर एक बार फिर डोरे डालने शुरू हो गए हैं। कोई राजगार को प्रलोभन दे रहा है तो कोई बेरोजागरी भत्ते की बात कहकर फिर बहकाना चाहता है। वर्ष 2007 में मायवती के छलावे में आकर नौजवानों ने बसपा की सरकार बनाई तो मायावती ने इसे अपनी कूबत समझ ली और प्रदेश में जमकर लूट व भ्रष्ट्राचार को बढ़ावा दिया। एनआरएचएम घोटाला, मनरेगा घोटाला जैसे कारनामे इसी सरकार के देन रहे। 2012 में नौजवान एक बार फिर मुलायम सिंह के बहकावे में आ बैठे और अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया तो फिर वही देखने को मिला। अखिलेश यादव खुद कठपुतली मुख्यमंत्री साबित हुए। वह अपने मंत्रियों को मनाने में ही पांच साल का समय गवां बैठे। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस भी चुपचाप बैठी रही और लोगों को लुटते देखती रही। अब तो सयम आ गया है जब उत्तर प्रदेश के नौजवान दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ईमानदार और स्वच्छ छवि  के उम्मीदवारों को चुनाव जिताना चाह रहे हैं, भले ही वह स्वतंत्र उम्मीदवार क्यों न हो। 

Friday, 25 March 2016

बदला लेने के लिए लश्कर ए तैयबा से हेडली ने मिलाया था हाथ

मुंबई। आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली ने मुंबई कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि उसने भारत से बदला लेने के लिए लश्कर ए तैयबा संगठन से हाथ मिलाया था। हेडली ने कहा कि 1971 में पाकिस्तान स्थित उसके स्कूल को भारतीय प्लेनों ने बम से उड़ा दिया था जिसके बाद बचपन से ही उसके मन में भारत और भारतीयों के खिलाफ नफरत पैदा हो गई थी। यही वजह थी कि वह भारत को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाना चाहता था। गौरतलब है कि 2008 में हुए 26/11 मुंबई हमले में अपने कथित रोल के लिए फिलहाल हेडली अमेरिका में 35 साल की सजा काट रहा है।
इसलिए करता था भारत से नफरत
मुंबई कोर्ट में क्रॉस एक्जाम के दौरान हेडली ने कहा कि मैं भारत से इसलिए नफरत करता था क्योंकि 1971 में भारतीय हवाई जहाजों ने मेरे स्कूल को उड़ा दिया था, जो लोग वहां काम करते थे वह सब मारे गए थे।' हेडली यहां 3 - 16 दिसंबर 1971 तक हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध का जिÞक्र कर रहा था। उस वक्त हेडली की उम्र 11 साल थी। पाकिस्तानी पिता और अमेरिकी मां के बेटे हेडली ने 16 साल की उम्र तक पाकिस्तान में पढ़ाई की जिसके बाद वह अमेरिका चला गया। मुबंई कोर्ट को उसने बताया कि 2002 में उसने लश्कर से हाथ मिलाया था। मुबंई पर 2008 में हमला करने से पहले हेडली ने अपनी कई यात्राओं के दौरान शहर का जायजा लिया था।

यूसुफ रजा गिलानी उसके घर आए थे
हेडली ने अपने बयान में एक नया मोड़ लाते हुए मुंबई अदालत को बताया कि 26/11 आतंकी हमलों के कुछ हफ्ते बाद ही पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी उसके घर आए थे। हेडली ने सत्र अदालत के विशेष न्यायाधीश जी ए सनाप को बताया कि यह कहना सही नहीं होगा कि पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने 26/11 हमले के एक महीने के बाद मेरे पिता के अंतिम संस्कार में शिरकत की थी। दरअसल, वह (गिलानी) इसके कुछ सप्ताह बाद हमारे पाकिस्तान स्थित घर आए थे। हेडली ने कहा कि उसके पिता पाकिस्तान रेडियो में महानिदेशक थे और वह लश्कर के साथ उसके संबंधों के बारे में जानते थे। हेडली ने कहा कि मेरे पिता लश्कर-ए-तैयबा के साथ मेरे जुड़ाव के बारे में जानते थे और वह इससे खुश नहीं थे। हेडली से जब पूछा गया कि क्या यह सच है कि उसका सौतेला भाई डेनियल उसके लश्कर से संबंध के बारे में जानता था, तो हेडली ने सिर्फ इतना ही कहा कि डेनियल पाकिस्तान में नहीं रह रहा था।

हां मैं बुरा आदमी हूं..
2009 में हेडली को अमेरिका में गिरफ्तार कर लिया गया था और गारंटी दी गई थी कि अगर वह लश्कर के बारे में खुलासे करेगा तो उसे फांसी की सजा नहीं दी जाएगी। फरवरी में अमेरिका की एक अज्ञात जगह से वीडियो लिंक के जरिए कई दिनों तक चली गवाही के बाद अब मुबंई कोर्ट में उसे क्रॉस एक्जाम किया जा रहा है। हेडली ने क्रोस एग्जामिनेशन यह भी बताया कि वह अमेरिका में  शिवसेना के लिए फण्ड रेजिंग प्रोग्राम करना चाहता था। इसके लिए वह राजाराम रेघे से संपर्क में था। हेडली वहां शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को भी ले जाना चाहता था  लेकिन वहां उन पर हमले का कोई प्लान नहीं था। जब हेडली से एफबीआई और उसके बीच हुई डील से जुड़ा सवाल पूछा गया तो हेडली ने हिंदी में कहा हां मैं बहुत खराब आदमी हूँ  मैंने मान लिया। आप कहेंगे तो फिर से मान लेता हूं लेकिन इससे आप साबित क्या करना चाहते हैं?


Tuesday, 22 March 2016

नक्सलवाद खत्म करने के लिए आदिवासियों की राय से विकास योजनाएं बनानी होगी

रायपुर। विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के बुलावे पर छत्तीसगढ़ विधानसभा परिसर में आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल होने आए कवि कुमार विश्वास की नक्सलवाद पर राय जुदा है। कुमार विश्वास आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय नेता भी है। उन्होंने सोमवार की रात संस्कृति भवन के गढकलेवा में कुछ पल पत्रकारों के साथ बिताए। यहां उन्होंने हर पहलू पर खुलकर चर्चा की। नक्सलवाद पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जब तक आदिवासियों को विकास योजनाए तैयार करने में भागीदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक इस समस्या का समाधान हो पाना संभव नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि उद्यमियों को सरकार आखिर भूमि क्यों मुहैया कराती है। उद्यमी जिस तरह से कारोबार से जुड़ी हर सामग्री को एकत्र करता है, उसी तरह से उसे भूमि का प्रबंध करने के लिए भी आदिवासियों के बीच जाना चाहिए, किन्तु दुखद पहलू यह है कि उद्यमी भूमि लेने के लिए सरकार के पास आता है और सरकार उसे भूमि मुहैय्या कराती है। इस पहलू पर विचार करना होगा। उन्होंने नक्सलियों द्वारा चलाई जा रही समानान्तर सरकार को लोकतंत्र का शर्मनाक पहलू बताया और कहा कि लोकतांत्रिक देश में ऐसा किसी भी हालत में संभव नहीं हो सकता।

राहुल गांधी पर साधा निशाना
आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधा और चुटकी ली। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी में नेता बनने की न तो सोच है और न ही नेतृत्व करने का कोई गुण है, पर उन्हें पार्टी द्वारा जबरिया नेता का ताज पहनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी चाहे जो कर ले, वह राहुल गांधी को नेता नहीं बना पाएगी।

छत्तीसगढ़ पर ‘आप’की नजर
आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने इस बात का संकेत किया कि पार्टी की नजर छत्तीसगढ़ पर है। पार्टी इस बात का अध्ययन कर रही है कि किस तरह से यहां के स्थानीय नेताओं की भागीदारी को बढ़ाकर संगठन को गांव स्तर तक मजबूत किया जा सके। पांच राज्यों में चुनाव हो जाने के बाद पार्टी छत्तीसगढ़ की ओर रूख कर सकती है।

Saturday, 19 March 2016

साध्वी प्रज्ञा निर्दोष और न्यायिक आतंकवाद की शिकार

अखिल भारतीय संत परिषद के राष्ट्रीय संयोजक व हिन्दू संसद के प्रणेता यति बाबा नरसिंहानंद सरस्वती जी महाराज और हिन्दू स्वाभिमान के राष्ट्रीय कार्यवाहक अध्यक्ष बाबा परमेन्द्र आर्य ने भोपाल के अपने साथियो के साथ  एक प्रेस वार्ता को सम्बोधित किया जिसमे उन्होंने साध्वी प्रज्ञा को निर्दोष और न्यायिक आतंकवाद की शिकार बताया।
प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुये यति बाबा नरसिंहानंद सरस्वती जी ने कहा की भारतीय लोकतन्त्र को नेताओ ने धर्म निरपेक्षता के नाम पर बर्बाद करके रख दिया है।एक विदेशी महिला के इशारे पर चलने वाली कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार ने भगवा आतंकवाद शब्द गढ़ने के लिये बिलकुल गैर संवैधानिक तरीके से निर्दोष साध्वी प्रज्ञा और उनके साथियो को जेल में डाला और अब केवल हिन्दुओ की ताकत पर बनी मोदी सरकार उन्हें इसलिये नहीं छोड़ रही है की कहीं मुसलमान नाराज न हो जाए।इसके लिये जिस तरह से संविधान को कुचला गया है,ये एक सभ्य लोकतन्त्र के लिये शर्मनाक है। उन्होंने बताया की जिस तरह भूमापीठाधीश्वर स्वामी अच्युतानंद तीर्थ जी महाराज ने अर्धकुंभ में धर्म संसद आयोजित करके साध्वी प्रज्ञा के मुद्दे को पुरे संत समाज में उठा दिया था,उसी प्रकार अब कुम्भ में भी ये मुद्दा सन्यासियों के बीच सबसे प्रमुख मुद्दा होगा और संत समाज 14 और 15 मई 2016 को कुम्भ में हिन्दू हितो की रक्षा के लिये हिन्दू संसद का आयोजन करेगा जिसमे साध्वी प्रज्ञा और निर्दोष हिन्दू कार्यकर्ताओ की रिहाई सबसे प्रमुख मुद्दा बनेगी।भूमापीठाधीश्वर स्वामी अच्युतानंद तीर्थ जी महाराज के मार्गदर्शन और जूना अखाडा के अंतर्राष्ट्रीय मंत्री दूधेश्वरनाथपीठाधीश्वर स्वामी नारायण गिरी महाराज की अध्यक्षता में आयोजित होने वाले इस आयोजन में देश के सभी वरिष्ठ संत और 100 से अधिक संगठनो के प्रतिनिधियों के भाग लेने की सम्भावना है।
प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुये हिन्दू स्वाभिमान के राष्ट्रीय कार्यवाहक अध्यक्ष बाबा परमेन्द्र आर्य ने कहा की जिस तरह से देश में हिन्दुओ की जनसंख्या का अनुपात घट रहा है वो न केवल भारतवर्ष बल्कि पुरे विश्व के लिये एक अशुभ संकेत है।ये देश केवल हिन्दू बाहुल्य होने के कारण लोकतान्त्रिक देश है।यदि ये देश हिन्दू बाहुल्य नहीं रहा तो लोकतान्त्रिक भी नहीं रहेगा। उन्होंने कहा की जिस तरह से आई एस आई एस ने भारत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है,ये बहुत ही चिंताजनक बात है।आज हमारे सामने रामजन्मभूमि से बड़ा मुद्दा इस्लामिक जिहाद से हिन्दू के अस्तित्व की रक्षा है।इस बार कुम्भ में इस मुद्दे पर भी गहन चिंतन होगा की यदि भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हो गया तो बचेगा कैसे?जिस तरह से सभी राजनैतिक दल मुस्लिम वोट बैंक के लालच में हिन्दू हितो पर कुठाराघात कर रही हैं इससे संत समाज बहुत चिंतित और खिन्न है।संत समाज हिन्दू संसद के माध्यम से अपनी चिंताओं पर खुल कर मन्थन करेगा। प्रेस वार्ता में श्री दिनेश श्रुति जी,मनदीप चौहान,संजय जी भी उपस्थित थे।

Friday, 18 March 2016

खेती और सहकारिता के समन्वय से किसान बनेंगे खुशहाल

 केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री मोहन भाई कुण्डारिया ने कहा है कि खेती और सहकारिता के समन्वय से ही किसानों को समृद्ध और खुशहाल बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बेहतर कार्य हो रहे हैं और खेती के लिए केन्द्रीय बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। श्री कुण्डारिया ने इस सिलसिले में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और नई फसल बीमा योजना और ई-मण्डी योजना का भी उदाहरण दिया। श्री कुण्डारिया इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में ‘मेक-इन-इंडिया में सहकारिता की भूमिका-ग्रामीण विकास के संदर्भ में’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला के समापन सत्र को सम्बोधित कर रहे थे। मुख्य अतिथि की आसंदी से श्री कुण्डारिया ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य में उन्नत खेती को बढ़ावा देने और किसानों की बेहतरी के लिए लगातार किए जा रहे प्रयासों की भी प्रशंसा की।
लागत कम करने का सुझाव
श्री कुण्डारिया ने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकार दोनों का यह प्रयास है कि उन्नत खेती ऐसी तकनीकों का विकास किया जाए, जिससे किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन मिल सके। उन्होंने इस मौके पर कृषि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय परिसर में रबी अरहर फसल प्रदर्शन, संरक्षित खेती, टिशूकल्चर प्रयोग शाला और जैव नियंत्रण प्रयोगशाला सहित डॉ. आर.एच. रिछारिया के नाम पर स्थापित अनुसंधान प्रयोगशाला का भी अवलोकन किया।

Tuesday, 15 March 2016

प्रतापगढ़ में दिनदहाड़े अधिवक्ता की दुस्साहसिक अंदाज में हत्या

बेखौफ बदमाशों ने 15 मार्च 2016 को उत्तर प्रदेश की सत्तारुढ समाजवादी पार्टी की सरकार के चौथी वर्षगांठ पर प्रतापगढ़ में दिनदहाड़े अधिवक्ता की दुस्साहसिक अंदाज में हत्या कर दी। सुबह बाइक से कचहरी आ रहे जवाहर लाल मिश्र (50) पर ओझा का पुरवा के पास कई गोली मारी गईं। घटना से गुस्साए अधिवक्ताओं शव लेकर जिला जज के चैंबर के सामने रख दिया और धरने पर बैठ गए। देर शाम तक धरना जारी था। मुख्यमंत्री ने अधिवक्ता के आश्रितों को दस लाख रुपये दिये जाने की घोषणा की है। लालगंज कोतवाली क्षेत्र के लीलापुर पंडित का पुरवा खरगपुर गांव निवासी जवाहरलाल मिश्र (55) जिला मुख्यालय पर वकालत करते थे। मंगलवार सुबह वह बाइक से कचहरी आ रहे थे। करीब साढे़ 11 बजे वह शहर के करीब नगर कोतवाली के पूरे ओझा गांव स्थित चंद्रशेखर आजाद बाल शिक्षा निकेतन के पास पहुंचे बाइक सवार दो युवकों ने उन्हें रोका और उनके हेलमेट में पिस्टल डालकर कई गोलियां सिर में उतार दी। हेलमेट उनके सिर से नहीं निकला और वह जमीन पर गिर पड़े। करीब आधे घंटे बाद पहुंची पुलिस ने उन्हें मैजिक से जिला अस्पताल भेजा, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। वकील की हत्या की खबर पर जिला प्रशासन को पहले ही बवाल की आशंका हो गई थी और जिला अस्पताल को छावनी बना दिया गया था। हालांकि तब तक भारी संख्या में वकील पहुंचे और पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों को धक्का देकर शव लेकर चले आए। पहले उनका शव पुलिस लाइंस गेट पर रखकर चक्काजाम किया गया लेकिन जैसे ही पता चला कि पुलिस लाइंस में सरकारी कार्यक्रम में आए जनपद प्रभारी मंत्री सुरेंद्र सिंह पटेल यहां से जा चुके हैं तो लोग शव लेकर पहले कचहरी, फिर जिलाजज कार्यालय पहुंच गए। यहां शव बरफ पर रखकर हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग करने लगे। वकीलों का कहना था कि पंचायत चुनाव के दौरान उनके बेटे को गोली मारी गई थी। यही नहीं उनके परिवार वालों पर पिछले सप्ताह भी हमला किया गया था लेकिन उपयुक्त कार्रवाई न करने के कारण उनकी भी हत्या कर दी गई। 

Tuesday, 8 March 2016

रानी लक्ष्मीबाई वीरता पुरस्कार से नवाजी गई शिक्षाविद् डा. भारती गाँधी

लखनऊ सिटी मोन्टेसरी स्कूल की संस्थापिका-निदेशिका एवं प्रख्यात शिक्षाविद् डा. (श्रीमती) भारती गाँधी एवं 85 अन्य महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान हेतु आज मुख्यमंत्री  अखिलेश यादव ने ‘रानी लक्ष्मीबाई वीरता पुरस्कार’ प्रदान कर सम्मानित किया। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित एक समारोह में सभी पुरस्कार विजेता महिलाओं को एक-एक लाख रूपये नगद पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। सी.एम.एस. संस्थापिका-निदेशिका एवं प्रख्यात शिक्षाविद् डा. (श्रीमती) भारती गाँधी को यह पुरस्कार महिला सशक्तीकरण की दिशा में उनके उल्लेखनीय योगदान हेतु प्रदान किया गया। उक्त जानकारी सी.एम.एस. के मुख्य जन-सम्पर्क अधिकारी हरि ओम शर्मा ने दी है। श्री शर्मा ने बताया कि पुरस्कार समारोह के उपरान्त एक अनौपचारिक वार्ता में डा. गाँधी ने कहा कि नारी को सशक्त, समझदार व समाज में रचनात्मक योगदान हेतु प्रेरित करना ही मेरे जीवन का ध्येय है। वर्तमान आधुनिक समाज में भी महिलाओं से जुड़े कई गंभीर मुद्दे हैं जिन पर जागरूकता व रचनात्मक सोच की जरूरत है।

Saturday, 5 March 2016

कन्हैया को भारत में कैसी आजादी चाहिए?

हमारे युग की कला क्या है? न्याय की घोषणा, समाज का विश्लेषण, परिमाणत: आलोचना। विचारतत्व अब कलातत्व तक में समा गया है। यदि कोई कलाकृति केवल चित्रण के लिए ही जीवन का चित्रण करती है, यदि उसमें वह आत्मगत शक्तिशाली प्रेरणा नहीं है जो युग में व्याप्त भावना से नि:सृत होती है, यदि वह पीड़ित ह्रदय से निकली कराह या चरम उल्लसित ह्रदय से फूटा गीत नहीं, यदि वह कोई सवाल नहीं या किसी सवाल का जवाब नहीं तो वह निर्जीव है।
बेलिंस्की (19वीं शताब्दी में रूस के जनवादी कवि)
दिल्ली के जवाहरलाल यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पहले गिरफ्तारी और अब तिहाड़ जेल से रिहाई के बाद दिया गया भाषण देश में राजनीति का केन्द्र बन गया है। यह देश के लिए दुर्भाग्य की बात तो है ही लेकिन सबसे अधिक दुर्भाग्य की बात भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टी के नेताओं के लिए है। देश के दोनों शीर्षस्थ दलों को यह समझना चाहिए ‘ये पब्लिक है सब जानती है’। न भाजपा के कहने से कोई देशद्रोही हो जाएगा और न ही कांग्रेस के कहने से कोई राष्ट्रभक्त। इस लेख के माध्यम से हम इस तथ्य को देश के आम नागरिकों तक पहुंचाना चाहते हैं कि किस तरह से एक सोची-समझी रणनीति बनाकर राजनीतिक दलों द्वारा लोगों को मूल विषय से भटकाने की कोशिश की जा रही है। घटना के मूल को देखें तो जो रिपोर्ट सामने आयी है उसके अनुसार 9 फरवरी 2016 को जेएनयू में डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन की तरफ से अफजल गुरु की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। सांस्कृतिक संध्या के नाम पर आयोजित कार्यक्रम में कश्मीर की आजादी पर चर्चा होनी थी और अफजल गुरु से जुड़ी एक फिल्म भी दिखाई जानी थी। सांस्कृतिक संध्या के लिए के लिए पहले यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इजाजत दी थी लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से बीस मिनट पहले उसे रद्द कर दिया गया। बावजूद इसके डीएसयू के उमर खालिद की अगुवाई में कार्यक्रम हुआ और उसमें देश विरोधी नारे लगे। वहां मौजूद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोगों ने इसका विरोध किया और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन के खिलाफ नारेबाजी की। कार्यक्रम के दौरान वहां पुलिस मौजूद थी लेकिन वो मूकदर्शक बनी रही। अखिल भारतीय विद्याथी परिषद ने अगले दिन थाने में शिकायत दर्ज करवाई और यूनिवर्सिटी कैंपस में विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। ग्यारह फरवरी को बीजेपी सांसद महेश गिरी ने वसंतकुंज थाने जाकर एफआईआर दर्ज करवाई। पुलिस ने अज्ञात लोगों पर धारा 124 अ के तहत केस दर्ज किया। बारह फरवरी को जांच के लिए पुलिस जेएनयू पहुंची और छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लिया। कन्हैया के अलावा पुलिस की डायरी में कार्यक्रम के आयोजक उमर खालिद समेत पांच और लोगों के नाम हैं। दिल्ली पुलिस का दावा है कि उसके पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि कन्हैया ने भी देश विरोधी नारे लगाए थे। 15 फरवरी को पटियाला हाउस कोर्ट में कन्हैया की पेशी के दौरान वकीलों ने पत्रकारों और कोर्ट में मौजूद जेएनयू के छात्रों के साथ मारपीट की। कोर्ट में कन्हैया की पेशी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशा निर्देश के बावजूद 17 फरवरी को पटियाला हाउस कोर्ट में फिर हंगामा हुआ। वकीलों ने पेशी के दौरान कन्हैया पर हमला किया। पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी हुई। पूरे घटनाक्रम से नजर डालने पर दूध का दूध और पानी का पानी साफ हो जाता है कि न तो जेएनयू में आयोजित कार्यक्रम को देश का आम नागरिक सही ठहराएगा और न ही उसके बाद कोर्ट परिसर में तथाकथित वकीलों द्वारा कई गई मारपीट को सही ठहराया जाएगा। इन सारे मामलों में संविधान में प्रदत्त कानून के तहत कार्रवाई की जानी ही चाहिए। पर ऐसा नहीं हो रहा है। लोग अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में लग गए हैं। दूसरी तरफ देखें तो  जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के परिवार का कहना है कि ‘गरीब का बेटा होने की वजह से उन्हें फंसाया जा रहा है’। कन्हैया का संबंध बिहार के बेगूसराय जिÞले से है और उनका परिवार जिÞले के बरौनी प्रखंड के बीहट में रहता है। उनके पिता जयशंकर सिंह लकवा ग्रस्त हैं जबकि उनकी मां आंगनबाड़ी सेविका हैं। देशद्रोह के मामले में गिरफ़्तारी के बाद जमानत पर रिहा हुए जेएनयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने 3 मार्च 2016 की रात जेएनयू परिसर में छात्रों को संबोधित किया।
उनके संबोधन के कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं-
-- इस देश में जनविरोधी सरकार है। उस सरकार के खिलाफ बोलेंगे तो इनका साइबर सेल डॉक्टर्ड वीडियो दिखाएगा।
-- हमें एबीवीपी से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि हम सही मायनों में गणतांत्रिक लोग हैं। हम भारतीय संविधान में विश्वास करते हैं।
--दोस्तों मैं तुम्हारा यानी एबीवीपी का विच-हंटिंग नहीं करूंगा क्योंकि शिकार उसका किया जाता है जो शिकार करने लायक है। हम एबीवीपी को एक शत्रु की तरह नहीं बल्कि विरोधी के तौर पर देखते हैं।
-- प्रधानमंत्री जी ने ट्वीट किया है और कहा है सत्यमेव जयते। प्रधानमंत्री जी आपसे भारी वैचारिक मतभेद है लेकिन क्योंकि सत्यमेव जयते आपका नहीं इस देश का संविधान का है, मैं भी कहता हूं सत्यमेव जयते।
-- जेएनयू पर हमला एक योजना के तहत है क्योंकि वे यूजीसी के विरोध में प्रदर्शन को खत्म करना चाहते हैं और रोहित वेमुला के लिए न्याय की लड़ाई को धीमा करना चाहते हैं। इस देश की सत्ता ने जब जब अत्याचार किया है, जेएनयू से बुंलद आवाज आई है, आप हमारी लड़ाई को धीमा नहीं कर सकते।
-- भारत से नहीं भाइयों, भारत में आजादी मांग रहे हैं। ‘से’ और ‘में’ में फर्क होता है। कुछ को तो आपने हर-हर कहकर झक लिया, आजकल अरहर से परेशान हैं।
-- आज आप छात्र और हम यहां है क्योंकि आपको लगता है कि आप पर हमला हुआ है। लेकिन यह हमला कुछ समय पहले ‘स्वामी’ ने किया था।
-- ये लंबी लड़ाई है। बिना झुके, बिना रुके हमें लड़ना है। रोहित वेमुला ने जो लड़ाई शुरू की, आप और देश के शांतिप्रिय लोग इस लड़ाई को आगे ले जाएंगे और हम इस लड़ाई में जीतेंगे।
-- भारत से नहीं भारत को लूटने वालों से आजादी चाहते हैं। हमें भूख, भ्रष्टाचार, जातिवाद और प्रांतवाद से आजादी चाहिए।

कन्हैया कुमार के भाषण के अंशों को पढ़कर आप समझ गए होंगे कि सबका असली मकसद क्या हैं। कन्हैया कुमार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य है। वह जिस देश में आजादी मांग रहे हैं, उन्हें यह महसूस करने की जरूरत है कि शायद अगर इस देश में आजादी न होती तो वह एक गरीब परिवार से निकलर दिल्ली में जेएनयू जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ के अध्यक्ष न बन पाते। जिस देश में वह भूख, भ्रष्टाचार, जातिवाद और प्रांतवाद से आजादी चाहते हैं, इसकी शुरूआत उन्हें जेएनयू कैम्पस से ही करनी चाहिए। कन्हैया की मांगों में आतंकवाद, उग्रवाद और माओवाद से आजादी पाने की चाहत नहीं झलक रही है। उन्हें देश के प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने से पहले इन समस्याओं पर भी जिक्र करना चाहिए था। देश में माओवाद की बढ़ती घटनाओं पर चिंता करने के बजाय इसी जेएनयू यूनिवर्सिटी से आदिवासियों और वंचित वर्ग के हितैशी बनने का चोला ओढ़कर तमाम विचारकों, साहित्यकारों के छद्मवेश में लोगों के चेहरे आए दिन सामने आते रहते हैं। क्या ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। अगर देश में माओवाद , आतंकवाद और उग्रवाद की बढ़ती घटनाओं पर चुप रहना देशभक्ति है तो कन्हैया कुमार सहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो देश के संविधान में प्रदत्त कानून के तहत कार्रवाई होनी ही चाहिए। सबसे दुखद पहलू यह है कि देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर केन्द्रित न होकर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जैसे नेता अपने भाषणों में जेएनयू मामले को केन्द्रित कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे देश में उनका वोट बढ़ जाएगा। कांग्रेस के राहुल गांधी भी कन्हैया के पक्ष में बोल रहे हैं। पर दोनों शीर्ष राजनैतिक दल इस तथ्य को भलीभांति जान लें कि देश का नागरिक एक-एक घटनाओं का बारीकी से अध्ययन कर रहा है। सच क्या है वह आने वाले समय में बता देगा।
रमेश पाण्डेय
वरिष्ठ पत्रकार

Monday, 1 February 2016

गांधी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि राजव्यवस्था का शोकगीत

गांधी जी के अनुसार, 'भू-मण्डल पर हमारा देश सबसे अधिक गरीब है और आजाद भारत के जन-प्रतिनिधि ऐसे ढंग और तौर-तरीकों से रहने का साहस नहीं कर सकते जो उनके निर्वाचकों के रहन-सहन से मेल ना खाता हो।' इन सबसे परे राजनेता विदेश में गुप्त रूप से छुट्टी मनाने जाते हैं और गांवों में रात्रिवास का मीडियानामा पढ़ा जाता है। बुन्देलखण्ड में बदहाल गांवों वाले उत्तर प्रदेश में सरकार द्वारा सैफई में सैकड़ो करोड़ रुपये खर्च कर हवाई जहाज के लिए रनवे का निर्माण किया गया जिस पर अब नाईट लैण्डिंग की भी सुविधा की जा रही है। लाखों गांवों की बदहाली की अनदेखी कर स्मार्ट सिटी के रनवे की रौनक में उड़ान भरने वाले जनप्रतिनिधियों का गांधी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दरअसल राजव्यवस्था का शोकगीत है। गांधीजी की पुण्यतिथि पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस का स्मरण स्वाभाविक है, जिन्होंने जुलाई 1944 में रेडियो रंगून से गांधी को राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित किया था। अब आज़ादी के नायक सुभाष, बंगाल में सत्ता की राजनीति के मोहरे ही बन गए हैं। आजादी के दिन 15 अगस्त 1947 को बंगाल के मन्त्रियों से मिलने पर गांधीजी ने कहा था कि 'सत्ता पाने पर वे वैभव के जाल में ना फंसे क्योंकि उन्हें गांवों और गरीबों का उद्धार करना है।' आजादी के 68 वर्ष पश्चात् देश के 1 फीसदी अमीरों का 53 फीसदी सम्पत्ति के साथ उद्धार हुआ है और हाशिए के 50 फीसदी लोग 4.1 फीसदी सम्पत्ति के साथ लाचारी की जिन्दगी जी रहे हैं। सांसद लोग गांव और गरीब की तस्वीर भले ही ना बदल सके हों, पर 2004 से 2009 के पांच साल के दौरान 304 सांसदों की सम्पत्ति में 300 फीसदी का इजाफा ज़रूर हो गया। गांधीजी ने कहा था, 'मंत्री पद तो सेवा का द्वार है और नेताओं को एक-एक पाई बचाना चाहिए।' आज के भारत में गांधी के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं के लिए चार्टर्ड विमानों का बेड़ा तथा सुरक्षा के नाम पर हजारों करोड़ खर्च किये जा रहे हैं। गांधी के अहिंसा के सिद्धांतों की अनदेखी कर विधानसभा-संसद में हिंसा करने वाले जनप्रतिनिधि जनता की अपेक्षाओं पर विफल होने पर भी अपने वेतन और भत्तों में बेइंतहा इजाफा कर रहे हैं। आईआईएम द्वारा वर्ष 2014 में किये गये अध्ययन के अनुसार पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल देश में सर्वाधिक वेतन पाने वाले मुख्यमंत्री हैं। आम जनता की भलाई के नाम पर दिल्ली में सरकार बनाने वाली 'आप' सरकार ने विधायकों के वेतन भत्तों में चार गुना तक वृद्धि का प्रस्ताव पारित किया है जिससे वे देश में सबसे अधिक वेतन पाने वाले विधायक हो जायेंगे। 88,500 रुपये सालाना प्रति व्यक्ति आय वाले देश में, दिल्ली के विधायक लगभग 3.2 लाख रुपये का मासिक वेतन और भत्ते लेंगे और उस दौड़ में अब संसद सदस्य भी शामिल हो गए हैं। गांधी के नाम पर सरकार बनाने वाले राजनेता जनता की सेवा में विफल होने के बावजूद आजीवन भारी भरकम पेंशन का इंतजाम करके राजनीतिक सत्ता का लाभ लेते रहते हैं। बाहुबलियों का तंत्र जो सत्ता-संस्थानों में शीर्ष पर काबिज है, वही पंचायती राज के नाम पर संसाधनों को अपने कब्जे में लेने की कोशिश में जुट गया है। इससे गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है जिसका मर्सिया स्मार्ट सिटी में लिखे जाने की प्रस्तावना बन रही है।