Saturday, 21 January 2017

अखिलेश के घोषणापत्र में पांच साल के ‘कारनामों’ को छिपाने की योजना

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रविवार को पार्टी का चुनाव घोषणापत्र जारी किया। इस घोषणा पत्र में पांच साल की सरकार में उत्तर प्रदेश में हुए लूट, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, दंगों की घटनाओं, ताबड़तोड़ हत्या की घटनाओं को छिपाने की शानदाय योजना तैयार की गई है।
अखिलेश यादव ने चुनाव घोषणापत्र 2017 को लोगों के बीच रखते हुए कहा कि सपा 2012 में बनाए घोषणापत्र को आगे बढ़ाने का काम कर रही है। उन्होंने कहा कि सपा सरकार ने संतुलित विकास करने का काम किया है। मेट्रो बनाई, एक्सप्रेस वे बनाया। 108 एंबुलेंस एक फोन पर आती है। यूपी का कोई जिला नहीं बचा, जहां बड़ा काम नहीं हुआ। पहले बिजली नहीं आती थी। आज गांवों में 16-18 घंटे बिजली है।
अब इनको कौन बताये कि उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां बिजली की आपूर्ति न हो पाने के कारण उद्योग बंद हो गए और कोई उद्यमी उत्तर प्रदेश में निवेश करने को तैयार नहीं। पांच साल की सरकार में प्रदेश के 35 जिलों में मुख्य चिकित्साधिकारी की तैनाती नहीं की जा सकी। प्रभारी बनाकर काम चलाया गया। थानों में जाति विशेष के लोगों को तैनात किया गया। सेतु निगम और उत्तर प्रदेश कारपोरेशन लिमिटेड जैसी संस्थाओं को पूरी तरह से लूट लिया गया। लोक निर्माण विभाग और सिंचाई विभाग के कार्यालयों में ठेके लेने के लिए दिनदहाड़े गोलियां चलती रहीं। इलाहाबाद न्यायालय में सरेआम अधिवक्ता की हत्या की गई, डॉक्टर की हत्या की गई। बेरोजगारी  भत्ता फ्लाप हो गया। युवाओं के लिए रोजगार का सृजन नहीं किया गया। पूरी सरकार में केवल घर परिवार और रिश्तेदारों को मलाई खिलाई जाती रही। अब इन बातों को छिपाने से कौन भूल सकेगा। अब तो समय आ गया है जब उत्तर प्रदेश की समझदार जनता इन ‘ना-समझ’ लोगों को सबक सिखाएगी।
घोषणा पत्र की बड़ी बातें
---गरीब महिलाओं को प्रेशर कुकर, अत्यंत गरीब को गेहूं और चावल दिए जाएंगे
---1 करोड़ लोगों को 1000 रुपए पेंशन
---रोडवेस बस में महिलाओं का आधा किराया
---ओल्ड एज होम वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनाए जाएंगे
---लैपटॉप के साथ समाजवादी स्मार्ट फोन योजना
---डेढ़ लाख सालाना वेतन वाले को मुफ्त इलाज
---यूपी के हर गांव को 24 घंटे बिजली मिलेगी
---वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर बनाने का काम करेंगे
----ट्रैफिक समस्या का स्थायी समाधान होगा

Saturday, 5 November 2016

मुलायम ने होशियारी से शिवपाल और रामगोपाल को लगाया किनारे

मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी को उसकी स्थापना के बाद से ही यूपी की सबसे अहम पार्टियों में शुमार करा दिया। मुलायम की वजह से समाजवादी पार्टी ने 25 साल में चार बार मुख्यमंत्री दिए। पार्टी की स्थापना के 25 साल पूरे होने पर लखनऊ में समारोह मनाया जा रहा है। इस समारोह के जरिए राजनैतिक ताकत दिखाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे समय में मुलायम की राजनीति पर विमर्श किया जाना सामयिक भी है और लाजिमी भी है। आज भले ही लोग मुलायम सिंह की प्रशंसा करें, पर वह ही ऐसे शख्स हैं जिन्होंने पिछड़ी जाति के लोगों का समाज और राजनीति में सबसे अधिक नुकसान किया है। अब बड़ी होशियारी से अखिलेश यादव का राजनैतिक कद ऊंचा करने के लिए शिवपाल और रामगोपाल यादव को किनारे लगा दिया है। उनका जीवन हमेशा अवसरवादी राजनीति के रुप में जाना जाएगा। मुलायम सिंह का सक्रिय राजनीतिक करियर 1967 में शुरू हुआ जब वह पहली बार उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए चुने गए। बड़े स्तर पर मुलायम सिंह की सियासत का पहला अध्याय 1977 में शुरू होता है। यह कांग्रेस विरोध का दौर था तब उत्तर प्रदेश में संघियों और सोशलिस्टों की मिली-जुली सरकार थी। मुलायम सिंह यादव उस सरकार में सहकारिता मंत्री थे। उसी दौरान मुलायम जाने-माने समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्रा के संपर्क में आए। मुलायम सिंह यादव ने 1980 में तब के उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े समाजवादी नेता लोकबंधु राजनारायण का साथ छोड़कर चौधरी चरण सिंह का हाथ थाम लिया। लोकबंधु राजनारायण को धोखा देने के बाद मुलायम सिंह ने दूसरा शिकार उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के सबसे बड़े नेता रहे चौधरी चरण सिंह को बनाया। 1989 में जब उत्तर प्रदेश सरकार का गठन होने वाला था तब मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दो नेता थे मुलायम सिंह और चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह। अजित सिंह अमेरिका से लौटे थे। वी. पी. सिंह हर हाल में अजित सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। मुलायम सिंह को यह मंजूर नहीं था। मुख्यमंत्री का नाम तय करने के लिए गुजरात के समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को लखनऊ भेजा गया। वे उस समय उत्तर प्रदेश के जनता दल प्रभारी थे। वी. पी. सिंह का दबाव उनके ऊपर था कि अजित को फाइनल करें। यहां मुलायम सिंह यादव ने जबरदस्त राजनीतिक होशियारी दिखाई। चिमनभाई पटेल ने लखनऊ से लौटते ही मुलायम सिंह के नाम पर ठप्पा लगा दिया। मुलायम सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान अयोध्या मुद्दे से मिली। 1990 में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने विवादास्पद बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया था। इसके बाद मुलायम सिंह ने सभी सहयोगियों का साथ छोड़कर खुद अपनी पार्टी बनाने का निर्णय लिया। 4 नवंबर 1991 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी, तब से अबतक पार्टी एक लंबा सफर तय कर चुकी है। समाजवादी पार्टी के 25 साल के इतिहास में कई बड़ी कामयाबियां दर्ज हैं। इस पार्टी के दम पर ही मुलायम सिंह यादव तीन बार खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और महज 38 साल की उम्र में उनके बेटे अखिलेश यादव की भी सीएम के रूप में ताजपोशी हुई। समाजवादी पार्टी को देश की सबसे ताकतवर क्षेत्रीय पार्टियों में से एक बनाने में जिस शख्स ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई वो हैं 77 साल के मुलायम सिंह यादव।  1992 में बाबरी मस्जिद टूटने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति सांप्रदायिक आधार पर बंट गई और मुलायम सिंह को राज्य के मुस्लिमों का समर्थन हासिल हुआ। अल्पसंख्यकों के प्रति उनके रुझान को देखते हुए कहीं-कहीं उन पर ‘मौलाना मुलायम’ का ठप्पा भी लगा। मुलायम सिंह करीब दो दशक से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। मुलायम सिंह की उम्र 77 साल की हो गयी है। वर्ष 2012 में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने तो उनकी छवि शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव के केयरटेकर के रुप में उभर कर सामने आयी। मुलायम सिंह ने 2017 के आम चुनाव से पहले कुछ ऐसी चाल चली कि अखिलेश के आगे दोनों बौने नजर आने लगे हैं। यह बात भले ही शिवपाल और रामगोपाल और उनके समर्थक न मानें, पर सच्चाई यही है। पारिवारिक विवाद में जिस तरह से मुलायम सिंह ने अखिलेश और रामगोपाल को बेवकूफ बनाया, उससे इन दोनों का ही नुकसान हुआ और राजनैतिक रुप से हाशिए पर आ गए। अब पूरी तरह से आने वाले समय में समाजवादी पार्टी पर अखिलेश यादव का ही एकाधिकार नजर आएगा। 

Monday, 22 August 2016

जिन बातों पर राजन नापसंद, उन्हीं पर पहली पसंद बने पटेल

रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया के नए गवर्नर उर्जित पटेल होंगे। उर्जित फिलहाल आरबीआई के डिप्टी गवर्नर हैं। खास बात ये है कि बीजेपी नेता सुब्रमणियन स्वामी जिन बातों को लेकर रघुरामराजन पर हमलावर थे, उर्जित में भी वही बातें हैं। लेकिन इस बार स्वामी विरोध नहीं बल्कि समर्थन कर रहे हैं। उर्जित पटेल को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का नया गवर्नर नियुक्त किया गया है। वह रघुराम राजन का स्थान लेंगे जो कि चार सितंबर को गवर्नर पद से मुक्त हो रहे हैं। उर्जित पटेल इस समय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर हैं। नए आरबीआई गवर्नर के तौर पर उर्जित पटेल की नियुक्ति को लगता है भाजपा नेता सुब्रहमण्यम स्वामी का समर्थन हासिल है। स्वामी ने निवर्तमान आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन पर कई हमले किए थे। कई रीट्वीट और अपने ट्विटर फॉलोवरों को जवाब देते हुए स्वामी ने कहा कि यह सोचना बेवकूफाना होगा कि वह पटेल की इस बात के लिए आलोचना करने की सोचेंगे कि उनका जन्म केन्या में हुआ। मुद्रास्फीति को रोकने के लिए ब्याज दर कम नहीं करने की राजन की नीति के स्वामी कटु आलोचक रहे हैं। स्वामी ने उम्मीद जताई कि पटेल वैसे आक्रामक नहीं होंगे। जब स्वामी के एक फॉलोवर ने केन्या का नागरिक होने के कारण पटेल की आलोचना की तो स्वामी ने कहा कि वह केन्या के नागरिक नहीं हैं, वह थे। आर 3 का जन्म भारत में हुआ और उन्होंने भारत में 2007 से रहने के बावजूद अपना ग्रीन कार्ड बरकरार रखना चुना। आर 3 रघुराम राजन का उल्लेख करने के लिए आदिवर्णिक शब्द है। इसका उन्होंने ब्याज दर ऊंची रखकर विकास को नुकसान पहुंचाने के लिए राजन पर हमला करने के दौरान कई बार इस्तेमाल किया। उनके ट्वीट की वजह से उनके फॉलोवरों ने दावा किया कि वह पटेल की नियुक्ति का समर्थन कर रहे हैं। स्वामी ने एक फॉलोवर की टिप्पणी को रीटवीट किया। इसमें कहा गया है, ऐसा लगता है कि स्वामी उर्जित पटेल की नियुक्ति को स्वीकति दे रहे हैं। जब एक ट्विटर पर मौजूद व्यक्ति ने कहा कि मैं सुनिश्चित हूं कि स्वामी इस नियुक्ति से खुश नहीं हैं तो भाजपा सांसद ने पलटकर कहा कि बकवास। स्वामी ने एक फॉलोवर के टवीट को रीट्वीट किया जिसमें कहा गया है, अलविदा रघुराम राजन। कोई और शौक चुनें। शुक्रिया। स्वागत उर्जित पटेल। स्वामी ने इससे पहले आरोप लगाया था कि राजन देश के लिए उपयुक्त नहीं हैं और उन्होंने कहा था कि राजन ने मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करने की आड़ में ब्याज दरों में वद्धि की जिससे देश को नुकसान हुआ। आश्चर्यजनक तरीके से राजन ने जून में आरबीआई कर्मियों को भेजे गए पत्र में घोषणा करते हुए कहा कि वह शिक्षण कार्य में लौटेंगे और दूसरा कार्यकाल नहीं लेंगे।

इन बातों पर हुआ था राजन का विरोध
1. विदेशी मानसिकता
भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी बोले- अमेरिका में पढ़े राजन ग्रीन कार्ड होल्डर हैं। दिमागी तौर पर पूरे भारतीय नहीं हैं।
हकीकत: पटेल की तो स्कूलिंग भी विदेश की है उर्जित मूल रूप से गुजरात के खेड़ा जिला के महुधा गांव के हैं। माता-पिता केन्या में रहते थे। जन्म नैरोबी में हुआ था। स्कूलिंग से पीएचडी तक लंदन और अमेरिका की।

2. सिर्फ महंगाई की चिंता, इंडस्ट्री की नहीं
राजन पर आरोप लगा कि उन्होंने स्माल इंडस्ट्रीज को नुकसान और अमेरिका को फायदा पहुंचाया।
हकीकत: राजन का यह फैसला उर्जित कमेटी की सिफारिश पर ही लिया गया था। उर्जित की अध्यक्षता वाली कमेटी ने सिफारिश की थी कि रिजर्व बैंक महंगाई रोकने पर ध्यान दे। और खुदरा महंगाई दर 4% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।

3. यूपीए के करीबी
कहा गया कि राजन की नियुक्ति यूपीए समय की है। वे अब भी चिदंबरम के करीबी बने हुए हैं।
हकीकत: उर्जित ने यूपीए का 100 डे प्लान बनाया। यूपीए सरकार ने ही उर्जित को आरबीआई का डिप्टी गवर्नर बनाया था। उस समय उन्होंने ही यूपीए-2 का 100 दिन का प्लान बनाया था। ये भी चिंदबरम के करीबी हैं।

अब यह कहा स्वामी ने?
-उर्जित पटेल को आरबीआई गवर्नर बनाए जाने के फैसले का स्वामी ने स्वागत किया। ट्विटर पर जब लोगों ने पटेल पर स्वामी का रिएक्शन जानना चाहा तो उन्होंने कहा-पटेल केन्या के नागरिक हैं नहीं बल्कि थे। राजन भारत में पैदा हुए, 2007 से यहीं रह रहे थे लेकिन ग्रीन कार्ड अमेरिका का रखे हुए थे।
- स्वामी ने ये भी कहा कि सिर्फ केन्या में जन्मे होने की वजह से पटेल को क्रिटिसाइज करना मूर्खता होगी। उम्मीद ये करनी चाहिए कि वो राजन की तरह तेज नहीं होंगे।

इसलिए बनी उर्जित के नाम पर सहमति
1. रघुराम राजन ने ही की पहली सिफारिश
- सबसे पहले रघुराम राजन ने उर्जित पटेल का नाम सुझाया था। उनका कहना था कि जो काम तीन साल में हुए, उनमें पटेल की अहम भूमिका।
2. उर्जित पटेल को हमेशा आगे रखा
- उर्जित सबसे अहम मॉनिटरी पॉलिसी डिवीजन के प्रमुख थे। पॉलिसी से जुड़े सवालों के दौरान राजन उन्हें ही जवाब देने के लिए आगे करते थे।
3. नॉन ब्यूरोक्रेसी बैंकग्राउंड होना
-आरबीआई में 5 डिप्टी गवर्नरों में एक अर्थशास्त्री होता है। पटेल ब्यूरोक्रेसी कैटेगरी से थे। इसका फायदा आरबीआई को आगे भी मिलेगा।

कौन हैं उर्जित पटेल?
- 52 साल के पटेल को इस साल जनवरी में तीन साल के लिए री-अप्वॉइंट किया गया था। वे 11 जनवरी 2013 को आरबीआई से जुड़े।
- रघुराम राजन के आने से पहले ही वे आरबीआई में आ गए थे।
- राजन और उर्जित में समानता ये है कि दोनों वाशिंगटन में आईआईएफ में साथ काम कर चुके थे।
- उर्जित कई फाइनेंशियल कमेटी के मेंबर रह चुके हैं। 2014 में देश में पहली बार महंगाई दर का लक्ष्य तय करने का फैसला भी पटेल की अगुआई वाली कमेटी की सिफारिशों के आधार पर ही हुआ था।
-पटेल ने कहा था कि खुदरा महंगाई का लक्ष्य 4% रखा जाना चाहिए और इसमें 2% कम-ज्यादा की गुंजाइश हो।
- आरबीआई में आने से पहले पटेल बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के एडवाइजर थे।

ये होंगी चुनौतियां
- आरबीआई के नए गवर्नर के पास सबसे बड़ी चुनौती महंगाई कंट्रोल करने की होगी।
- महंगाई को लेकर पटेल का रुख राजन के ही समान है। राजन भी ग्रोथ के बजाय महंगाई को ज्यादा तवज्जो देते रहे हैं।
- माना जा रहा है कि ब्याज दरों पर रिजर्व बैंक की सख्त नीति बरकरार रहेगी।
- साथ ही मोदी सरकार के कई अहम रिफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधे पर होगी।
- कहा जाता है कि राजन को बनाए रखने के लिए इंडस्ट्री से लेकर फाइनेंस मिनिस्ट्री तक की रजामंदी थी।
- ऐसे में नए सिरे से काम शुरू करते वक्त उर्जित पटेल को इसी तरह का सपोर्ट हासिल करना होगा।

उर्जित पटेल के बारे में 
केन्या में हुआ जन्म
उर्जित पटेल का जन्म केन्या में हुआ था। उनके दादा गुजरात से 20वीं शताब्दी में केन्या गए थे। उनके पिता की नौरोबी में स्पेयर पार्ट्स की दुकान थी।

विदेश मे हुई पढ़ाई
वहीं वह पढ़ाई के लिए यूके और यूएस में रहे। उन्होंने येल यूनिवर्सिटी से 1990 में अर्थशास्त्र में डाक्टरेट की और इससे पहले 1986 में आॅक्सफोर्ड से एम फिल किया। उन्होंने भारत में पोस्टिंग होने के बाद ही गुजराती और हिंदी सीखी थी।

पहले गुजराती गवर्नर के गांव से नाता
उनके दादाजी गुजरात के गांव पालना से थे। यह वही गांव है जहां से देश को फइक के पहले गुजराती गवर्नर मिले। वह थे आईजी पटेल।

मां के लिए छोटे घर में आए
पटेल के पिताजी की मौत के बाद से मां उनके साथ रहती है। कुछ महीने पहले उन्होंने मुंबई के एक छोटे से घर में शिफ्ट कर लिया क्योंकि आॅफिस से मिले चार रूम के बेडरूम वाले घर में उनकी मां का दिल नहीं लगता था।

मनमोहन सिंह ने बताया था ‘सबसे जरूरी’
 2013 में उर्जित ने आरबीआई का डिप्टी गवर्नर बनने के वक्त भारतीय पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया था। उनका पासपोर्ट बनाने की पैरवी खुद उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी। मनमोहन सिंह ने उन्हें देश के लिए बहुत जरूरी शख्स बताया था।

तीन बड़ी चुनौतियों से सामना करना होगा

1. सरकारी बैंकों का डूबता कर्ज कैसे बचाया जाए
पिछले एक साल में करीब 39 लिस्टेट बैंकों का कुल एनपीए 96% प्रतिशत तक बढ़ गया है। यानी कुल 6.3 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बैंकों का देनदारों के बीच फंसा है जो कि साल 2015 में 3.2 लाख करोड़ था। इसी साल जून में रिजर्व बैंक ने एक रिपोर्ट में कहा है कि अगले साल तक ये कुल कर्ज़ का 8.5 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। मौजूदा गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों को डूबते कर्ज़ को अपनी बैलेंसशीट से हटाने के लिए मार्च 2017 तक का समय दिया है। इस स्थिति से निपटना उर्जित के लिए पहली बड़ी चुनौती होगी।

2. मुद्रा नीति के लिए समिति
उर्जित ब्याज दरों को तय करने के लिए बनी समिति मोनेटरी पॉलिसी कमिटी के पहले अध्यक्ष होंगे। छह सदस्यीय इस समिति को ही ब्याज दरों पर निर्णय लेना है। अगर किसी मामले पर वोटिंग करना पड़ता है तो वहां गवर्नर के पास वीटो पावर नहीं बल्कि वोट करने का अधिकार दिया गया है। इसके अलावा खुदरा महंगाई दर अगले पांच साल के लिए 4% तय किया गया है। 2% इसके ऊपर या नीचे ही हो सकता है। नए गवर्नर के लिए ये भी एक बड़ी चुनौती होगी।

3. डॉलर कर्ज भुगतान
उर्जित पटेल को पहला बड़ा टास्क अगले ही महीने मिलेगा। भारत 2000 करोड़ डॉलर के बॉन्ड्स भुनाएगा। बैंकों ने पिछले कुछ वर्षों में विदेशी बाजारों से ये रकम वसूल की थी। इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत आज 67 रुपये के इर्दगिर्द चल रही है। इसे नियंत्रित करना भी उर्जित के लिए बड़ी चुनौती होगी।

Thursday, 28 April 2016

दारा सिंह की रिहाई के लिए उठी आवाज

श्री माता बाला सुंदरी देवा जी धाम करनाल में दारा सिंह जी की जेल रिहाई के लिए विशेष बैठक हुई, जिसमें साध्वी देवा ठाकुर जी ने तुरंत करवाई करते हुए गृहमंत्री  राजनाथ सिंह जी के पास फोन किया और उनसे दारा सिंह जी की रिहाई की माँग की। साघ्वी के मुताबिक गृहमंत्री  राजनाथ सिंह जी ने भी दारा सिंह की रिहाई का आश्वासन दिया। जल्द ही साध्वी देवा ठाकुर अपने समर्थकों के साथ जल्द ही गृहमंत्री  राजनाथ सिंह से मिलेंगी और दारा सिंह को जल्द से जल्द रिहा करवाने का हर संभव प्रयास करेंगी। इस बैठक में अरविंद सिंह जी (दारा सिंह के भाई), धर्मयोद्धा अनुपम बजरंगी, लकी ठाकुर,राजीव ठाकुर आदि लोग सम्मलित हुए। हिन्दू हित के लिए 17 साल पहले उड़ीसा में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले महाप्रतापी दारा सिंह के भाई अरविन्द लगातार दारा सिंह को रिहा कराने के अभियान में लगे हुए हैं। 

Wednesday, 27 April 2016

2 साल में 3 बार संसद पहुंचे मिथुन

मिथुन चक्रवर्ती के राज्यसभा की कार्यवाही में मौजूद रहने से छुट्टी मांगने पर सांसदों ने एतराज जताया है। टीएमसी सांसद ने बीमारी के चलते सदन में आने से छूट की एप्लिकेशन दी है। इस पर जेडीयू सांसद केसी त्यागी और सपा के नरेश अग्रवाल का अपर हाउस में ही गुस्सा फूट पड़ा। बता दें कि मिथुन को टीएमसी ने 2 साल पहले राज्यसभा भेजा था। इस दौरान वे महज तीन बार ही सदन में मौजूद रहे।  मिथुन ने मंगलवार को अपर हाउस की कार्यवाही में शामिल होने से छूट देने की एप्लिकेशन दी। जिस पर सांसदों ने एतराज जताया है। मिथुन ने अपनी लीव एप्लीकेशन के साथ मेडिकल सर्टिफिकेट भी दिया है।  उनके छुट्टी मांगने पर टीएमसी नेताओं ने हाउस को बताया-मिथुन को हेल्थ प्रॉब्लम्स हैं। वे बीमार भी हैं और उनकी आॅथोर्पेडिक सर्जरी भी हुई है। इस पर जेडीयू और सपा के सांसदों ने कहा-वह शख्स जो फिल्मों के अपने प्रोफेशनल वर्क में बिजी है, उसके पास हाउस की कार्यवाही में शामिल होने का टाइम कैसे नहीं है। टीएमसी नेताओं ने इन आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया कि मिथुन फिल्मों में बिजी हैं, लेकिन सदन में मौजूद होने के समय बीमार कैसे हो जाते हैं। बता दें कि 2 साल में तीन बार सदन पहुंचे मिथुन ने एक बार भी स्टेटमेंट नहीं दिया है।

Wednesday, 13 April 2016

अकेले अंबेडकर को संविधान का भगवान मानना गलत

बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर भारत देश ही नहीं अपितु दुनिया के अमूल्य धरोहर हैं। अस्पृश्यता के विरुद्ध उनके द्वारा चलाए गए आन्दोलन वरेण्य हैं।  इस देश की माटी का कण-कण उनका अभिनंदन करता है। किन्तु यह अत्यंत निन्दनीय है कि अकेले अंबेडकर को भारतीय संविधान का भगवान बताकर आने वाली पीढ़ी को इतिहास की सच्चाई से भटकाने की घृणित कोशिश की जा रही है।

ऐसे हुआ भारतीय संविधान का निर्माण

--संविधान सभा की प्रेरणा का स्रोत 17वीं और 18वीं शताब्दी की लोकतांत्रिक क्रांतियां हैं। इन क्रांतियों ने इस विचार को जन्म दिया कि शासन के मूलभूत कानूनों का निर्माण नागरिकों की एक विशिष्ट प्रतिनिधि सभा द्वारा किया जाना चाहिए।

--भारत की संविधान सभा का निश्चित उल्लेख भारत शासन अधिनियम, 1919 के लागू होने के पश्चात 1922 में महात्मा गांधी ने किया था।

--जनवरी 1925 में दिल्ली में हुए सर्वदलीय सम्मेलन के समक्ष कॉमनवेल्थ आॅफ इण्डिया बिल को प्रस्तुत किया गया, जिसकी अध्यक्षता महात्मा गाँधी ने की थी। भारत के लिए एक संवैधानिक प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत करने का यह प्रथम प्रमुख प्रयास था।
---19 मई, 1928 को बंबई में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन में भारत के संविधान के सिद्धांत निर्धारित करने के लिए मोतीलाल नेहरु के सभापतित्व में एक समिति गठित की गई। 10 अगस्त, 1928 को प्रस्तुत की गई इस समिति की रिपोर्ट की नेहरू रिपोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। इसे लगभग ज्यों-का-त्यों 21 वर्ष बाद 20 नवंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत स्वाधीन भारत के संविधान में समाविष्ट कर लिया गया।

---जून 1934 में कांग्रेस कार्यकारिणी ने घोषणा की कि श्वेत-पत्र का एकमात्र विकल्प यह है कि वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित संविधान सभा द्वारा एक संविधान तैयार किया जाए। यह पहला अवसर था जब संविधान सभा के लिए औपचारिक रूप से एक निश्चित मांग प्रस्तुत की गयी।
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1940 के अगस्त प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार ने संविधान सभा की मांग को पहली बार अधिकारिक रूप से स्वीकार किया, भले ही स्वीकृति अप्रत्यक्ष तथा महत्वपूर्ण शर्तो के साथ थी। यद्यपि 1942 का क्रिप्स मिशन पूर्णत: असफल सिद्ध हुआ, फिर भी उसमें संविधान सभा बनाने की बात को स्वीकार कर लिया गया था।
---अंतत: कैबिनेट मिशन, 1946 द्वारा संविधान निर्माण के लिए एक बुनियादी ढांचे का प्रारूप प्रस्तुत किया गया।
--- निर्धारित फॉर्मूले के अनुसार संविधान सभा में प्रांतों के अधिक-से-अधिक 296 सदस्य हो सकते थे और देशी राज्यों के 93।

--संविधान सभा में अंतिम रूप से प्रांतों के केवल 285 और देशी रियासतों के 78 प्रतिनिधि थे तथा संविधान के अंतिम मूल मसौदे पर इन्हीं 808 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए गए।
---संविधान सभा के सर्वाधिक प्रभावशाली सदस्य थे- डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, जवाहरलाल नेहरु, वल्लभ भाई पटेल, डॉ. अम्बेडकर, गोविंद वल्लभ पंत, एन.जी.आयंगर, कृष्णास्वामी अय्यर, के. एम. मुंशी, आचार्य कृपलानी तथा श्यामाप्रसाद मुखर्जी।

--- तेजबहादुर सपू और जयप्रकाश नारायण को भी संविधान सभा की सदस्यता के लिए आमंत्रित किया गया था, किन्तु सप्रू स्वास्थ्य संबंधी कारणों के आधार पर इसे स्वीकार न कर सके और जयप्रकाश नारायण ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

---संविधान को सफलतापूर्वक निर्मित करने के उद्देश्य हेतु संविधान सभा ने कुल 22 समितियों का गठन किया, जिसमें 10 कार्यविधिक मामलों संबंधी एवं 12 तात्विक मामलों की समितियां थीं।

प्रारूप समिति (अध्यक्ष-बी.आर. अम्बेडकर)
प्रारूप समीक्षा समिति (अध्यक्ष-सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर)
समझौता समिति (अध्यक्ष-राजेंद्र प्रसाद)
संघ संविधान समिति (अध्यक्ष-जवाहरलाल नेहरू)
प्रांतीय संविधान समिति (अध्यक्ष-सरदार वल्लभ भाई पटेल)
मुख्य आयुक्त (प्रांत) समिति मूल अधिकार एवं अल्पसंख्यक समिति (अध्यक्ष-सरदार वल्लभ भाई पटेल)
भाषायी प्रांत समिति संघ शक्ति समिति (अध्यक्ष- जवाहरलाल नेहरू)

--संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर, 1946 को संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में संपन्न हुआ। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को सर्वसम्मति से संविधान सभा का अस्थायी अध्यक्ष चुन लिया गया। इसके पश्चात् 11 दिसम्बर, 1946 को कांग्रेस के नेता डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित किए गए। 13 दिसम्बर, 1946 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा उद्देश्य-प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्ताव में भारत के भावी प्रभुसत्तासंपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की रुपरेखा प्रस्तुत की गई थी।

---सम्पूर्ण संविधान निर्माण में 2 वर्ष, 11 मास और 18 दिन लगे। इस कार्य पर लगभग 64 लाख रुपये व्यय हुए। संविधान के प्रारूप पर 114 दिन तक चर्चा चली। अंतिम रूप में संविधान में 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां कायम की गईं।

---नागरिकता, निर्बचन, अंतरिम संसद, अल्पकालिक एवं परवर्ती उपबंध जैसे संविधान के कुछ अनुच्छेद संविधान की स्वीकृति के तुरन्त पश्चात अर्थात 26 नवम्बर, 1946 से ही लागू कर दिए गए थे, जबकि शेष संविधान 26 जनवरी, 1950 से संपूर्ण देश में लागू हुआ। 

Tuesday, 12 April 2016

महाराष्ट्र के 15 हजार गांव में गंभीर जलसंकट

 सूखे से जूझ रहे महाराष्ट्र के लातूर जिले के लिए पानी लेकर पहली ट्रेन मंगलवार सुबह यहां पहुंच गई। इस ट्रेन ने 350 किलोमीटर की दूरी 18 घंटे में तय की। हालांकि लोगों तक इसका पानी काफी देर से पहुंच पाएगा। पहले इस पानी को फिल्टर किया जाएगा। ट्रेन से कुल पांच लाख लीटर पानी भेजा गया है। लातूर में धारा 144 लागू है। इस बीच नेताओं में क्रेडिट लेने को होड़ मच गई है। मौजूदा समय में राज्य में करीब 15,000 गांव गंभीर जलसंकट से जूझ रहे हैं, जिनमें से अधिकांश गांव लातूर, बीड और उस्मानाबाद जिले में आते हैं।

कुछ ऐसी है महाराष्ट्र की हालत
- महाराष्ट्र में साल 2016 में हर महीने करीब 90 किसानों ने सुसाइड किया।
- कई तालाबों और नदियों में पानी 4% से भी कम बचा है।
- लगातार चौथी बार महाराष्ट्र सूखे का सामना कर रहा है।
- सबसे ज्यादा असर औरंगाबाद, लातूर और विदर्भ के जिलों में देखने को मिल रहा है।

कहां-कहां हैं सूखे जैसे हालात?
- महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में नदी और डैम पूरी तरह से सूख चुके हैं।
- आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी बेहाल।
- यूपी और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में बंदूकों के सहारे पानी की निगरानी की जा रही है।

सामान्य से ज्यादा बारिश की उम्मीद
 पिछले दो साल बरसात में कमी और सूखे जैसी स्थिति के बाद सरकार ने सोमवार को कहा कि इस वर्ष मानसून के सामान्य रहने की उम्मीद है। उसने तथा राज्यों को निर्देश दिया कि वे जून से शुर होने वाली खरीफ सत्र में फसल का रकबा और उत्पादन बढ़ाने की योजना तैयार करे। कृषि सचिव शोभना के पटनायक ने वर्ष 2016.17 के लिए खरीफ अभियान को शुरू करने के लिए एक रारष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, अल नीनो (समुद्री सतह के तामान में बदलवा की घटना) के प्रभाव में गिरावट आ रही है। ऐसी उम्मीद है कि इसके बाद ‘ला नीना’ की स्थिति आयेगी और जिससे इस वर्ष मानसून बेहतर हो सकता है।