Thursday, 12 December 2013

आलाकमान की परीक्षा का वक्त

कांग्रेस की सियासी नैया में दरार आने की खबरों के साथ ही पार्टी में आत्ममंथन और बड़े बदलाव की मांग के स्वर तेज होने लगे हैं. मध्य प्रदेश से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी का कहना है कि पार्टी आलाकमान चाटुकारों से घिरा हुआ है. पार्टी में उन्हें ही प्रमुखता दी जाती है. खरी-खरी बातें करनेवालों को अनसुना किया जाता है. वरिष्ठ पार्टी नेता मणिशंकर अय्यर का मानना है कि अगर पार्टी में राजीव गांधी की संकल्पना के मुताबिक बदलाव नहीं किया गया, तो उसे आगे भी हार का मुंह देखना पड़ सकता है. कांग्रेस में जहां आलाकमान के खिलाफ कुछ बोलने या सार्वजनिक रूप से उसे कोई राय देने की परंपरा कम-से-कम हाल के वर्षो में नहीं देखी गयी है, पार्टी नेताओं के इन बयानों को एक नजर में गांधी परिवार के रुतबे में हुए क्षरण का पहला महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है. लेकिन सवाल सिर्फ एक परिवार के रुतबे का नहीं, इससे कहीं आगे का है. सवाल सवा सौ वर्ष पुरानी राजनीतिक पार्टी को पुनर्जीवित करने का है. सवाल है, जैसा कि सोनिया गांधी ने भी कहा, कि आखिर पार्टी जनता के मूड को समझने में नाकाम क्यों रही? पहले उत्तर प्रदेश और अब चार राज्यों में कांग्रेस की करारी शिकस्त ने दिखाया है कि पार्टी संगठन का प्रशासन जिस तरह से किया जा रहा है, वह न तो जनता में यकीन जगा पा रहा है, न ही कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार कर रहा है. पिछले काफी अरसे से जिस तरह से कांग्रेस को नेतृत्व दे रहा गांधी परिवार ‘जीत का सेहरा मेरे सिर, हार का ठीकरा तुम्हारे सिर’ के सिद्धांत पर चल रहा है, वह राजनीति की पहली जरूरत- जवाबदेही के खिलाफ जाता है. सामान्य समझदारी कहती है कि अगर यूपीए सरकार के खिलाफ लगे आरोपों और उसकी असफलताओं पर कांग्रेस आलाकमान ने उचित समय पर संज्ञान लिया होता, तो कांग्रेस की स्थिति शायद कुछ बेहतर होती. पर, आलाकमान पूरी दुनिया को दिख रहे सच से आंखें मूंदे रहा. पिछले वर्षो में कांग्रेस ने जो राजनीतिक जमीन गंवायी है, उसे पार्टी ढांचे में व्यापक सुधार करके ही हासिल किया जा सकता है. यह वक्त पार्टी संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव और हिम्मती फैसले लेने का है. इसकी शुरुआत शीर्ष नेतृत्व की जवाबदेही तय करने से हो सकती है.

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