Thursday, 15 May 2014

इतिहास परखेगा ‘मनमोहन का दशक’

नयी दिल्ली की रायसीना पहाड़ियों पर बनी परवर्ती औपनिवेशिक इमारतों और सत्ता के गलियारों में पिछले कई दशकों से डॉ मनमोहन सिंह की निरंतर उपस्थिति रही है. इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही है कि उनके व्यवहार में नाटकीयता नहीं है, जो वर्त्तमान राजनीति और राजनेताओं का स्थायी तत्व बन चुकी है. इस वर्ष जनवरी के शुरू में मीडिया से बातचीत में जब वे कह रहे थे कि इतिहास उनके प्रति नरम होगा, उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित भाव-शून्यता और स्थिरता थी. परंतु शिक्षा से आर्थिक नीति-निर्धारण और फिर राजनीति के क्षेत्र में आये डॉ सिंह से बेहतर यह कौन जान सकता है कि इतिहास बहुत निष्ठुर होता है और उसके आकलन के आधार बड़े कठोर होते हैं. वे यह भी जानते हैं कि देश में कुछ ऐसे प्रधानमंत्री भी हुए हैं, जिन्हें शायद इतिहास के फुटनोट में भी जगह नहीं मिलेगी. भविष्य में होनेवाला आकलन तो बाद की बात है, फिलहाल इतना तो निश्चित हो गया है कि वर्तमान ने उनके नेतृत्व को नकार दिया है और कांग्रेस अपने इतिहास की सबसे बड़ी पराजय की ओर बढ़ती दिख रही है. इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन इतना तो डॉ सिंह प्रति सहानुभूति रखनेवाले भी स्वीकार करेंगे कि उन्होंने एक ऐसी सरकार का नेतृत्व किया, जिसने घपलों-घोटालों के पिछले हर रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया. आमतौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में यही कहा गया कि वे त्वरित और ठोस निर्णय में सक्षम नहीं हैं तथा सरकार व मंत्रियों पर उनका नियंत्रण कमजोर है. गठबंधन की सरकार सफलतापूर्वक चलाने का दावा करनेवाले प्रधानमंत्री सहयोगी दलों के मंत्रियों पर समुचित लगाम लगा पाने में असफल रहे. जाते-जाते भी उनकी सरकार ने सेनाध्यक्ष की नियुक्ति कर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है. सही है कि यह नियुक्ति केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है, परंतु सत्ता से हटने के महज दो दिन पहले ऐसा निर्णय लेने की जल्दी कई सवालों को जन्म देती है. फिलहाल विदाई की इस वेला में डॉ सिंह वरिष्ठ भाजपा नेता व उनकी सरकार के मुखर आलोचक रहे अरुण जेटली के लेख से सांत्वना प्राप्त कर सकते हैं, जिसमें जेटली ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से ईमानदार और उनकी आर्थिक नीतियों को देश के लिए आवश्यक बताया है.

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