Wednesday, 30 July 2014

किसान को लागत की तुलना में उत्पाद का लाभकारी मूल्य मिले

देश में जीविका के लिए खेती पर निर्भर आबादी अब भी 50 फीसदी से ज्यादा है, लेकिन सकल घरेलू उत्पादन में कृषि और उससे जुड़े उपक्षेत्रों का योगदान पिछले 25 सालों से लगातार घटते हुए दस फीसदी के आसपास रह गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि जीविका के लिए खेती पर निर्भर लोगों की आमदनी अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों की तुलना में नहीं बढ़ रही है। लिहाजा, खेती के विकास के लिए बनने वाले किसी भी रोडमैप का मूल्यांकन करते हुए यह देखा जाना चाहिए कि वह देश की खेतिहर आबादी की घटती आमदनी का समाधान किस सीमा तक कर पाता है। यानी कृषि के विकास का रोडमैप इस प्राथमिकता के साथ बनाया जाना चाहिए कि किसान को अपने लागत की तुलना में उत्पाद का लाभकारी मूल्य मिले। 16वीं लोकसभा के चुनाव-प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मैं किसानों की जेब हरे-हरे नोटों से भर देना चाहता हूं। जाहिर है, मोदी के पीएम बनने पर खेतिहर आबादी ने उनसे ऐसी ही उम्मीद बांधी होगी। लेकिन, नयी सरकार के गठन के दो महीने बाद खेती-बाड़ी के विकास के लिए नरेंद्र मोदी का जो रोडमैप सार्वजनिक रूप से सामने आया है, पहली नजर में वह पुरानी प्राथमिकताओं को ही एक नयी भाषा में प्रस्तुत करता जान पड़ता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के समारोह में प्रधानमंत्री ने कृषि-क्षेत्र के विकास के लिए जो विचार रखे हैं, उसमें पूर्ववर्ती सरकार की ही तरह उत्पादन बढ़ाने पर जोर है। यूपीए सरकार भी अपने आखिरी दिनों में कह रही थी कि देश की खेती को दूसरी हरित क्रांति की जरूरत है और इसी के अनुरूप खेती को वैज्ञानिक तरीके से समुन्नत तथा निर्यातोन्मुखी बनाना होगा। अब मोदी ने भी कमोबेश यही प्राथमिकता दोहरायी है। हमें ध्यान रखना होगा कि कृषि उत्पादन के मामले में भारत एक समुन्नत स्थिति में पहुंच चुका है। हाल के वर्षो में अनाज के गोदाम लगातार भरे रहे हैं। बड़ी जरूरत खेती के विविधीकरण, उत्पादों के उचित भंडारण, मूल्य-निर्धारण और संरक्षित बाजार तैयार करने की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मोदी सरकार की नजर कृषि अर्थव्यवस्था के इन उपेक्षित दायरों पर भी जायेगी और वह दूरगामी सोच के साथ एक समग्र नीति तैयार करेगी।

Sunday, 27 July 2014

यूपी में दंगों के पीछे कहीं सोची समझी साजिश तो नहीं

आखिर क्या बात है कि उत्तर प्रदेश बार-बार दंगों की चपेट में आ रहा है। जिस प्रदेश के लोगों ने अपना सबकुछ खोकर अमन का पैगाम दिया है, उसे प्रदेश के चुनिंदा शहरों में हो रहे दंगे क्या किसी सोची समझी साजिश का परिणाम नहीं दिखाई देते। आखिर राज्य सरकार इन दंगों पर काबू क्यों नहीं पा पाती। इन दंगों के बारे में राज्य सरकार की खुफिया इकाईयों को भनक तक नहीं लग पाती। ऐसा क्या हो गया है। अखिलेश सरकार की प्रशासनिक मशीनरी को। उत्तर प्रदेश के इतिहास में सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कार्यकाल अभी ढाई साल भी पूरा नहीं हुआ है। अगर हम कुछ प्रमुख घटनाओं पर नजर डालें तो अयोध्या, बरेली, शाहजहांपुर, मुजफ्फरनगर, गौतमबुद्धनगर, प्रतापगढ़, मुरादाबाद के बाद अब सहारनपुर में लोग साम्पद्रायिक दंगे की आग में झुलस रहे हैं। घटनाएं कब और कैसे घटीं, जरा इस पर भी नजर डालें। अयोध्या में दुर्गा पूजा की प्रतिमा विसर्जन के दौरान साम्प्रदायिक दंगा हुआ। बरेली में मंदिर में लाउडस्पीकर बजाने को लेकर दो समुदायों के बीच विवाद हुआ। मुजफ्फरनगर में बालिका से छेड़खानी की घटना को लेकर विवाद हुआ। शाहजहांपुर और प्रतापगढ़ में भी छेड़छाड़ की घटनाएं ही प्रमुख कारण रहीं। गौतमबुद्धनगर में धार्मिक स्थल के निर्माण को लेकर और मुरादाबाद में मंदिर में लाउडस्पीकर लगाने को लेकर विवाद होने की बात सामने आयी है। सहारनपुर में भी एक धार्मिक स्थल के निर्माण को लेकर साम्पद्रायिक दंगा होने का मामला सामने आया है। इन सभी घटनाओं की पृष्ठभूमि पर अवलोकन करें तो साफ है कि इन मामलों को समुदाय विशेष के लोगों से कोई खास वास्ता नहीं रहा। अगर प्रशासन निष्पक्ष और निर्भीक ढंग से दोषी लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई कर देता तो शायद समुदाय के लोगों की भावना न भड़कती। प्रशासनिक अधिकारी ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं। इसके पीछे दो ही तर्क है। या तो अधिकारी जिस पद पर हैं वह उसके योग्य नहीं हैं या फिर उनके ऊपर कोई राजनैतिक दबाव है जिसके कारण कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। सहारनपुर जहां साम्प्रदायिक दंगे की ताजा घटना हुई है, वह शहर दुनिया को कौमी एकता, अमर और चैन का संदेश देता है। इसी जिले में प्रख्यात इस्लामिक संस्था दारुल उलूम देवबंद है, जहां से समाज और देश हित में फतवे जारी हुआ करते हैं। सहारनपुर के साहित्यकारों माजिद देवबंदी, नवाज देवबंदी जैसी शख्सियतों ने कौमी एकता का तराना देश के कोने-कोने में गाया है। यही शहर आज साम्पद्रायिक दंगे के नाम पर कलंकित हो गया है। सोचिए जरा, सहारनपुर के अमनपसंद लोगों को यह कैसा लग रहा होगा। एक बात पर और भी गौर करना समीचीन होगा। उत्तर प्रदेश में जब भी समाजवादी पार्टी की सरकार होती है तो दंगे उसके केन्द्र में रहते हैं। लगता है कि समाजवादी पार्टी दंगों को ही आधर बनाकर वर्ष 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करना चाह रही है। एक मुद्दे पर आरोपों को झेल रही सरकार, उससे लोगों का ध्यान हटाने के लिए दूसरा बखेड़ा खड़ा करवा देती है। कुछ ऐसी बात इन घटनाओं से समझ में आती है। मसलन, लखनऊ में हुए रेप की घटना को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार विपक्ष के आरोपों को झेल रही थी। अब सहारनपुर की घटना ने लखनऊ की घटना को पीछे छोड़ दिया। इसी तरह इससे पहले बदायूं में दो दलित बालिकाओं की रेप के बाद हत्या की घटना को लेकर सरकार विपक्ष के आरोपों को झेल रही थी। उसी दौरान मुरादाबाद दंगे की घटना घट गयी। यह तो खैर इत्तेफाक भी हो सकता है। पर इन घटनाओं ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के राजनैतिक कॅरियर पर भी सवाल खड़ा कर दिया। यह घटनाएं सबसे दुखद उत्तर प्रदेश की राजनीति में उतरे युवाओं के लिए है। सहज अब लोगों युवाओं की राजनीति में सफलता पर यकीन नहीं कर सकेंगे। अगर बात आएगी तो उसके लिए अखिलेश यादव उदाहरण दिए जाएंगे। दूसरी तरफ एक और बात तय लगती है कि इन घटनाओं ने यह पटकथा भी लिख दी है कि अब उत्त्तर प्रदेश के इतिहास में अखिलेश यादव शायद ही दुबारा मुख्यमंत्री बन सकें। अखिलेश यादव के लिए अभी भी कुछ समय है कि वह इन दंगों की घटनाओं के पीछे का सच जानने की कोशिश करें और सुधारात्मक कदम उठाएं तो उनके राजनैतिक कॅरियर के लिए सुखद होगा।

Wednesday, 23 July 2014

इजराइली अत्याचार पर खामोशी क्यों

आतंकी संगठन हमास के शासन वाले गाजा पट्टी में इजरायली सेना के हमले जारी हैं। हमास की ओर से भी झुकने के कोई संकेत नहीं हैं और वह इजरायली इलाकों में रॉकेट हमले जारी रखे है। दोनों ओर से खेले जा रहे इस खूनी खेल में अब तक 604 फलस्तीनी और 29 इजरायली अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं। नागरिकों की मौतों के लिए इजरायली सेना ने हमास को जिम्मेदार ठहराया है। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका की ओर से किए जा रहे तमाम प्रयासों के बावजूद युद्धविराम के कोई संकेत नहीं हैं। कहा जाता है कि 70 साल पहले फिलीस्तीनियों द्वारा किया गया त्याग आज उन्हीं के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका है। हिटलर द्वारा भगाए गए हजारों शरणार्थियों को पनाह देने वाला फिलीस्तीन आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। बीते दिनों इजराइल ने गाजा में कई रॉकेट दागे, जिससे कई बेगुनाह बेमौत मारे गए। आश्चर्य यह है कि इजराइल के जुल्म को दुनिया चुपचाप देख रही है। खासतौर पर वे देश भी, जो पूरी दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाने का वादा करते हैं। मेरा सवाल उनसे है कि अगर उनके देश पर भी हमला होता, तो क्या वे चुप बैठते? घोर दुर्भाग्य है कि एक तरफ, दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष वातानुकूलित कमरों में बैठकर अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का हल करने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ, एक राष्ट्र बरबादी के कगार पर पहुंच चुका है, जिसे देखने वाला कोई नहीं! यह और भी दुखद है कि पवित्र रमजान में माह में महिलाओं-छोटे बच्चों का कत्लेआम किया जा रहा है और दुनियाभर में इस नरसंहार पर कोई भी देश अपना मुंह नहीं खोल रहा। मानवीयता को शर्मसार करने वाले इस अभियान को इजराइल ने और तेज करने के लिए कहा है तो समझा जाना चाहिए कि वहां हालात कितने भयावह होंगे। अत: किसी देश के ऐसे उन्मादी कृत्य पर चुप्पी साधने की बजाए सभी को सामूहिक तौर पर इसका प्रतिकार करना चाहिए। मानवीय मामलों का समन्वय करने वाले संयुक्त राष्ट्र के संगठन ओसीएचए की रिपोर्ट में 21 जुलाई की दोपहर तीन बजे से 22 जुलाई की दोपहर तीन बजे तक मारे गए बच्चों के आंकड़े दिए गए हैं। ओसीएचए के मुताबिक इस दौरान कुल 120 फलस्तीनी लोग मारे गए. इनमें 26 बच्चे और 15 महिलाएं थीं। संगठन के मुताबिक जुलाई के पहले हफ़्ते में गाजा में संघर्ष की शुरूआत होने के बाद से अब तक कुल 599 फलस्तीनी मारे गए हैं। इनमें से 443 आम लोग हैं। मरने वाले आम नागरिकों में 147 बच्चे और 74 महिलाएं शामिल हैं। इस संघर्ष में 28 इसराइली भी मारे गए हैं, जिनमें दो आम नागरिक और 26 सैनिक शामिल हैं। इस संघर्ष में 3504 फलस्तीनी घायल हुए हैं। इनमें 1,100 बच्चे और 1,153 महिलाएं शामिल हैं। इन आंकड़ों में उन मामलों को शामिल नहीं किया गया है, जिनकी पुष्टि नहीं हो पाई है।

Thursday, 10 July 2014

उम्मीदों से भरा मोदी सरकार का पहला बजट

मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को वित्तीय वर्ष 2014-15 का बजट पेश किया। इस बजट का देश को इंतजार था। एक आम नागरिक हमेशा यह चाहता है कि उस पर से टैक्स का बोझ कुछ घटे, इस नजरिये से देखें, तो इनकम टैक्स की सीमा दो लाख से 2.5 लाख करना कुछ राहत देने वाला है। साथ ही होम लोन सस्ता होना भी आम लोगों के लिए आकर्षक कदम है। आम जनता को कुछ और घोषणाएं भा रही हैं, मसलन देश में चार एम्स, पांच आईआईटी और पांच आईएमएम खोलने का प्रस्ताव। बजट में यह आश्वासन भी दिया गया है कि आने वाले पांच सालों में सरकार हर राज्य में एम्स की स्थापना करेगी। इसके अलावा सरकार ने बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ योजना की शुरूआत भी की है, इसके लिए सौ करोड़ के बजट का प्रस्ताव किया गया है। सौ नए शहरों के स्थापना की भी बात कही गयी है। बजट में किसानों को राहत देने के लिए काफी घोषणाएं की गयी हैं। बजट में यह कहा गया है कि  समय पर ऋण चुकाने वाले किसानों को ब्याज पर तीन प्रतिशत की छूट जारी रहेगी। इसके साथ ही किसानों की सहायता के लिए 1000 करोड़ रुपए की सिंचाई परियोजाना शुरू की गयी है। किसानों को मौसम की जानकारी देने और किसान मंडियों को प्रोत्साहित करने की भी योजना है। कहा जा सकता है कि बजट के केन्द्र में किसानों को रखा गया है, उनकी उपेक्षा नहीं की गयी है। बजट में यह प्रस्ताव किया गया है कि रक्षा क्षेत्र व बीमाक्षेत्र में 49 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी विदेश किया जाएगा। इसके साथ ही वित्तमंत्री ने बैंकों के शेयर बेचने का भी प्रस्ताव किया है। इन प्रस्तावों पर अगर ध्यान दें, तो हम पायेंगे कि इसका कारण सरकार के पास पैसों की कमी है। रक्षा उपकरणों की खरीद जब सरकार विदेश से करती है, तो इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ता है। यह बात जगजाहिर है कि रक्षा उपकरणों की खरीद हमें अमेरिकी डॉलर देकर करनी होती है, इसलिए सरकार ने इस बजट में यह प्रयास किया है कि विदेशी मुद्रा भंडार पर असर न पड़े। रक्षा क्षेत्र में 49 प्रतिशत एफडीआई और बीमा क्षेत्र में एफडीआई 26 से 49 प्रतिशत करने के पीछे भी यही उद्देश्य है। पैसे जुटाने के लिए वित्त मंत्री ने बैंकों के शेयर बेचने का भी प्रस्ताव किया है। यह सरकार के कुछ बड़े कदम हैं, जो देश की विदेशी मुद्रा को बुस्टअप करने के लिए उठाये गये हैं। यह कदम देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले हैं। देश में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए भी बजट में प्रस्ताव किया गया है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना की शुरूआत की गयी है। इसपर 100 सौ करोड़ का बजट दिया गया है। महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए सरकार ने बजट का प्रावधान किया है। कहा जा सकता है कि यह बजट उम्मीदों से भरा है। जो घोषणाएं की गयी हैं उन्हें अमल में लाना जरूरी है अन्यथा वे बेमानी हो जाएंगी।

Tuesday, 8 July 2014

गरीबों के लिए सुखद नहीं विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ाव

विश्व बैंक और मुद्रा कोष द्वारा विकासशील देशों पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वे विश्व अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ें। परंतु, वित्त मंत्री को जानना चाहिए कि विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ाव का आज तक परिणाम गरीबों के लिए सुखद नहीं रहा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली 10 जुलाई को अपना बजट पेश करनेवाले हैं। बजट में आगामी वर्ष की टैक्स की दरों की घोषणा की जाती है। हमारी अर्थव्यवस्था के विश्वअर्थव्यवस्था से जुड़ाव पर इन दरों का गहरा प्रभाव पड़ता है। मसलन, आयात कर न्यून होने से विदेशी माल का आयात बढ़ता है। इसके विपरीत आयात कर बढ़ाने से आयात कम होते हैं और घरेलू उद्योगों को खुला मैदान मिलता है। ध्यान रहे कि अर्थव्यवस्था का अंतिम लक्ष्य जनता है। अत: देखना चाहिए कि विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ाव का आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ता है। अधिकतर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हमें विश्व अर्थव्यवस्था से और अधिक गहराई से जुड़ना होगा। अपनी कंपनियों को दूसरे देशों में प्रवेश करने को प्रोत्साहन देना होगा। एफडीआइ को रिटेल जैसे चुनिंदा क्षेत्रों में छोड़ कर सभी क्षेत्रों में आकर्षित करना होगा। इससे उत्पादन व रोजगार बढ़ेगा। इस मॉडल को विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के साये में कई देशों ने लागू किया है, लेकिन परिणाम सुखद नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल लेबर आॅर्गनाइजेशन के मुताबिक, श्रमिकों की बढ़ती संख्या की तुलना में रोजगार नहीं बढ़ रहे हैं। वैश्विक बेरोजगारी की स्थिति आनेवाले समय में बिगड़ेगी। वैश्विक युवा बेरोजगारी दर 13.1 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच गयी है। इस संस्था के अनुसार भारत जैसे दक्षिण एशिया के देशों में बेरोजगारी की स्थिति इससे ज्यादा कठिन है। यहां मुख्यतया असंगठित रोजगार बढ़ रहे हैं। अपने देश में लोग येन-केन-प्रकारेण जीविका चला लेते हैं। जैसे किसी की नौकरी छूट जाए, तो वह सब्जी बेच कर गुजारा कर लेता है। वास्तव में वह बेरोजगार है, लेकिन आंकड़ों में सरोजगार गिना जाता है। बेरोजगारी की यह स्थिति इस विकास मॉडल का तार्किक परिणाम है। इसमें आॅटोमेटिक मशीनों के दौर में उत्पादन के लिए मुट्ठीभर उच्च तकनीकों को जाननेवालों की जरूरत पड़ती है। इन्हें भारी वेतन दिये जाते हैं, जैसे 1-2 लाख रुपए प्रति माह। इन चुनिंदा व्हाइट कॉलर कर्मचारियों द्वारा एक के स्थान पर तीन घरेलू नौकर रखे जाते हैं। इस प्रकार संगठित रोजगार संकुचित हो रहा है, जबकि असंगठित रोजगार बढ़ रहा है। यह कहना आसान है कि विदेशी निवेश को आकर्षित करने के साथ-साथ छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। यह उसी प्रकार है जैसे पहलवान को आमंत्रण देने के साथ-साथ गांव के कुपोषित बालक को प्रोत्साहन देना। पहलवान को आमंत्रित करेंगे, तो बालक बाहर हो ही जाएगा। लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ने के लाभ भी हैं। भारत तमाम सेवाओं को उपलब्ध कराने का वैश्विक केंद्र बनता जा रहा है। जैसे डिजाइन, कॉल सेंटर, ट्रांसलेशन, रिसर्च, क्लिनिकल ट्रायल इत्यादि में। निर्यात उद्योगों में रोजगार उत्पन्न होते हैं। लेकिन अंतिम सत्य यह है कि श्रम बाजार में प्रवेश करनेवाले 100 में से 1 को ही संगठित क्षेत्र में रोजगार मिला है। मेरी समझ से विश्व अर्थव्यवस्था के दायरे में इस समस्या का हल उपलब्ध नहीं है। आर्थिक सुधारों के पहले संगठित क्षेत्रों में रोजगार ज्यादा उत्पन्न हो रहे थे। सुधारों के बाद वे कम हुए हैं। मेरा मकसद अपने को विश्वअर्थव्यवस्था से अलग करने का नहीं है। बल्कि, ग्लोबलाइजेशन के अलग-अलग अंगों के लाभ-हानि का आकलन करके निर्णय लेना होगा कि उन्हें अपनाया जाये या छोड़ा जाए। जैसे हाइटेक उत्पादों के आयात को आसान बना देना चाहिए, लेकिन कपड़े के आयात पर प्रतिबंधित श्रेयस्कर हो सकता है। भले ही विदेशी कपड़ा एक रुपए मीटर सस्ता क्यों न हो, इससे देश के लाखों लोगों का रोजगार प्रभावित होता है, अत: इस पर प्रतिबंध हितकर होगा। तुलना में यदि विदेशी कंप्यूटर आधे दाम पर मिल रहा है और इसके आयात से 10-20 हजार श्रमिक ही प्रभावित हो रहे हें, तो इसे आने देना चाहिए। यही बात विदेशी निवेश पर भी लागू होती है। विदेशी निवेश के हर प्रस्ताव का श्रम तथा तकनीकी आॅडिट कराना चाहिए। इसमें परोक्ष रूप से रोजगार के हनन का आकलन भी करना चाहिए। जैसे खुदरा बिक्री से सीधे एक लाख रोजगार उत्पन्न हुए, परंतु किराना दुकानों के बंद होने से परोक्ष रूप से 10 लाख रोजगार का हनन हुआ। इन दोनों प्रभावों का समग्र रूप से आकलन करना चाहिए। इसके बाद प्रस्तावों को स्वीकार करेंगे, तो हम विश्वअर्थव्यवस्था से भी जुड़ेंगे और अपने नागरिकों को उच्च कोटि के रोजगार भी उपलब्घ करा सकेंगे। नयी सरकार को डब्ल्यूटीओ संधि से भी बाहर आने का साहस रखना चाहिए। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा विकासशील देशों पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वे विश्व अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ें। इन संस्थाओं के आका विकसित देश हैं। इनके दबाव में न आकर वित्त मंत्री को जानना चाहिए कि विश्वअर्थव्यवस्था से जुड़ाव का आज तक परिणाम गरीबों के लिए सुखद नहीं रहा है। नयी सरकार के आम बजट से लोगों को उम्मीद है कि इस बजट में गरीब केन्द्र में होंगे। गरीबों के हित को देखकर बजटीय प्रावधान किए जाएंगे।