Tuesday, 28 January 2014

विदेशी सरोकार, भावी सरकार

भारत में इस समय 80 करोड़ मतदाता हैं. जनवरी के पहले हफ्ते में मतदाताओं पर नजर रखने के वास्ते गूगल और चुनाव आयोग के बीच सहमति लगभग होनेवाली थी, लेकिन उसे सुरक्षा कारणों से टाल दिया गया है. फिर भी इसके टलने से हमें यह भ्रम नहीं पाल लेना चाहिए कि इस देश की जनता साइबर जासूसी के खतरे से सुरक्षित हो गयी है. इंटरनेट की सुविधाएं देनेवाली कंपनियों को पता है कि भारत में लगभग 42 प्रतिशत मतदाता ऑनलाइन हैं और उनके संदेशों पर नजर रखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके अंदर क्या चल रहा है और वे किस पार्टी को वोट देना चाहेंगे. गूगल कंपनी तो बल्कि मुफ्त में यह सेवा देने का प्रस्ताव चुनाव आयोग को दे चुकी थी. इस मुफ्त का चंदन घिसने में गूगल को तीस लाख रुपये महीने का खर्च आ रहा था. गूगल ने कहा कि हमारी भी ‘सामाजिक जिम्मेवारी’ बनती है, इसलिए कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी (सीएसआर) के तहत हम भारत सरकार से कोई फीस नहीं लेंगे. गूगल ने लगभग सौ देशों को इसी तरह का प्रस्ताव भेजा है. फिर भी, यदि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां, गूगल और याहू से सहयोग ले रही हैं, तो इन इंटरनेट सेवादाता कंपनियों का अर्थशास्त्र समझना और भी आसान हो जाता है. यह कुछ अजीब-सा लगता है कि एक ओर भारत सरकार गूगल से समझौता नहीं करने का अभिनय करती है, दूसरी ओर अक्तूबर, 2013 में गूगल और टीएनएस ने मिल कर इंटरनेट इस्तेमाल करनेवाले हरेक मतदाता की मंशा को समझने के लिए सर्वे किया था और उस आधार पर निष्कर्ष दिया था कि शहरी मतदाता किसे प्रधानमंत्री के रूप में पसंद करते हैं. गूगल इंडिया के प्रबंध निदेशक राजन आनंदन ने चार महीने पहले हुए इस सर्वे के दौरान कहा था कि भारत में 2013 बीतते-बीतते तकरीबन 20 करोड़ ‘इंटरनेट यूजर्स’ हो जायेंगे. इनसे अलग मोबाइल फोन और आइपॉड इस्तेमाल करनेवाले साढ़े अठारह करोड़ मतदाताओं की फौज है. वैसे इन्हें हम शुद्घ रूप से शहरी मतदाता नहीं कह सकते. ‘मोबाइल यूजर’ मतदाता गांव की गलियों से लेकर दिल्ली जैसे बड़े शहरों तक हैं, और इनकी मॉनीटरिंग विदेशी कंपनियां लगातार कर रही हैं. यह ठीक है कि चुनाव आयोग ने अपनी खाल बचाने के लिए गूगल को ऐसी कोई अनुमति नहीं दी है कि वह यहां के मतदाताओं पर निगाह रखे. लेकिन इसकी अनुमति के बगैर इस देश में वह सब कुछ हो रहा है, जिसके बारे में जानकारी लेना अमेरिकी और इजराइली खुफिया एजेंसियां चाह रही हैं. दुनिया भर की सरकारों की जासूसी करने के लिए कुख्यात हो चुकी अमेरिका की ‘नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी’ (एनएसए) से क्या भारत को सुरक्षित किया गया है? इस पर कोई भी पूरी जिम्मेवारी से कुछ भी कहने को तैयार नहीं है. पिछले साल अक्तूबर में खबर आयी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी ‘एनएसए’ का वेब सर्वर ‘एक्स की स्कोर’ भारत में लगाया गया है, और वह भी बिना किसी अनुमति के. वेब सर्वर ‘एक्स की स्कोर’ एक माह में 41 अरब संदेशों का पता करने और उन्हें रिकॉर्ड में रखने की क्षमता रखता है. कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री कार्यालय से बस इतना स्पष्टीकरण आया था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मोबाइल फोन तक का इस्तेमाल नहीं करते. मगर देश की राजनीति, सिर्फ मनमोहन सिंह के हुजरे तक सीमित नहीं है, बल्कि आज की तारीख में देश की बागडोर संभालनेवाले भावी नेता विदेशी एजेंसियों के लिए कुछ ज्यादा जिज्ञासा के विषय हैं. अमेरिकी खुफिया ‘नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी’ के कॉन्ट्रेक्टर (ठेके पर जासूसी करनेवाले) एडवर्ड स्नोडेन ने वाशिंगटन पोस्ट से एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि याहू और गूगल के डाटा सेंटर, मेरीलैंड के फोर्टमीडे स्थित ‘एनएसए’ मुख्यालय से समन्वय करते रहे हैं, और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों   के पास याहू और गूगल के ‘मेटाडाटा’ उपलब्ध हैं, जिनमें भेजने और प्राप्त करनेवाले इमेल संदेशों का ब्योरा रहता है. आज एडवर्ड स्नोडेन अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की बखिया उधेड़नेवाले ‘विसल ब्लोवर’ हो गये हैं.
पिछले 25 जनवरी को दावोस में विश्व आर्थिक फोरम की बैठक का समापन हुआ है. इस बार वहां हुई बहस, भारत की अर्थव्यवस्था से अधिक राजनीति पर केंद्रित थी. इससे हमें समझ लेना चाहिए कि विदेशी शक्तियां भारत में होनेवाले आम चुनाव के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करना चाहती हैं. पेट्रोलियम, इंफ्रास्ट्रक्चर, हेल्थकेयर से लेकर हथियार सप्लाई तक के लिए भारत यदि एक बड़ा बाजार बनने जा रहा है, तो बाहरी शक्तियां यह चाह रही हैं कि इस देश में एक टिकाऊ और उनके मन मुताबिक चलनेवाली सरकार हो. देश को चारों दिशाओं से जोड़नेवाले राजमार्ग, ‘नार्थ-साउथ, इस्ट-वेस्ट कॉरीडोर’ को इसलिए नहीं बनाया जा रहा है कि खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को रोका जाये. दावोस बैठक में वित्त मंत्री पी चिदंबरम एक अच्छे वकील की तरह बहस कर आये कि आपकी पूंजी और हमारे देश का भविष्य, एक युवा प्रधानमंत्री के हाथों सुरक्षित रहेगा. लेकिन उसका मार्ग प्रशस्त करने के लिए ‘धरना एंड अनशन स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ के ‘कुलपति’ अरविंद केजरीवाल का इस्तेमाल सत्तारूढ़ दल के नेता क्यों कर रहे हैं, यह बात भी दावोस में छिपी नहीं रही. इस बात को दुनिया भर की खुफिया बिरादरी स्वीकार करती है कि सीआइए ने कई देशों की सरकारों का खेल, चुनाव से पहले बिगाड़ा है. चिली, ईरान, ग्वाटेमाला, ब्राजील, ग्रीस, कांगो, भूटान जैसे बहुतेरे देश हैं, जहां की सरकारें व्हाइट हाउस की इच्छा के विपरीत जाते ही नप गयीं. न्यूजीलैंड में ‘एशलॉन’ साइबर जासूसी से सरकार हिल गयी थी, और 2006 में डॉन ब्राश को इस्तीफा देना पड़ा था. देवयानी खोबरागड़े विवाद अब घीरे-धीरे ठंडा पड़ गया है, लेकिन एक संदेश तो व्हाइट हाउस को गया था कि संप्रग-2 सरकार अमेरिका की कठपुतली नहीं बन सकती. क्या इसका खमियाजा किसी न किसी रूप में मनमोहन सिंह को भुगतना पड़ सकता है?

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