Saturday, 5 November 2016

मुलायम ने होशियारी से शिवपाल और रामगोपाल को लगाया किनारे

मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी को उसकी स्थापना के बाद से ही यूपी की सबसे अहम पार्टियों में शुमार करा दिया। मुलायम की वजह से समाजवादी पार्टी ने 25 साल में चार बार मुख्यमंत्री दिए। पार्टी की स्थापना के 25 साल पूरे होने पर लखनऊ में समारोह मनाया जा रहा है। इस समारोह के जरिए राजनैतिक ताकत दिखाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे समय में मुलायम की राजनीति पर विमर्श किया जाना सामयिक भी है और लाजिमी भी है। आज भले ही लोग मुलायम सिंह की प्रशंसा करें, पर वह ही ऐसे शख्स हैं जिन्होंने पिछड़ी जाति के लोगों का समाज और राजनीति में सबसे अधिक नुकसान किया है। अब बड़ी होशियारी से अखिलेश यादव का राजनैतिक कद ऊंचा करने के लिए शिवपाल और रामगोपाल यादव को किनारे लगा दिया है। उनका जीवन हमेशा अवसरवादी राजनीति के रुप में जाना जाएगा। मुलायम सिंह का सक्रिय राजनीतिक करियर 1967 में शुरू हुआ जब वह पहली बार उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए चुने गए। बड़े स्तर पर मुलायम सिंह की सियासत का पहला अध्याय 1977 में शुरू होता है। यह कांग्रेस विरोध का दौर था तब उत्तर प्रदेश में संघियों और सोशलिस्टों की मिली-जुली सरकार थी। मुलायम सिंह यादव उस सरकार में सहकारिता मंत्री थे। उसी दौरान मुलायम जाने-माने समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्रा के संपर्क में आए। मुलायम सिंह यादव ने 1980 में तब के उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े समाजवादी नेता लोकबंधु राजनारायण का साथ छोड़कर चौधरी चरण सिंह का हाथ थाम लिया। लोकबंधु राजनारायण को धोखा देने के बाद मुलायम सिंह ने दूसरा शिकार उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के सबसे बड़े नेता रहे चौधरी चरण सिंह को बनाया। 1989 में जब उत्तर प्रदेश सरकार का गठन होने वाला था तब मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दो नेता थे मुलायम सिंह और चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह। अजित सिंह अमेरिका से लौटे थे। वी. पी. सिंह हर हाल में अजित सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। मुलायम सिंह को यह मंजूर नहीं था। मुख्यमंत्री का नाम तय करने के लिए गुजरात के समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को लखनऊ भेजा गया। वे उस समय उत्तर प्रदेश के जनता दल प्रभारी थे। वी. पी. सिंह का दबाव उनके ऊपर था कि अजित को फाइनल करें। यहां मुलायम सिंह यादव ने जबरदस्त राजनीतिक होशियारी दिखाई। चिमनभाई पटेल ने लखनऊ से लौटते ही मुलायम सिंह के नाम पर ठप्पा लगा दिया। मुलायम सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान अयोध्या मुद्दे से मिली। 1990 में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने विवादास्पद बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया था। इसके बाद मुलायम सिंह ने सभी सहयोगियों का साथ छोड़कर खुद अपनी पार्टी बनाने का निर्णय लिया। 4 नवंबर 1991 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी, तब से अबतक पार्टी एक लंबा सफर तय कर चुकी है। समाजवादी पार्टी के 25 साल के इतिहास में कई बड़ी कामयाबियां दर्ज हैं। इस पार्टी के दम पर ही मुलायम सिंह यादव तीन बार खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और महज 38 साल की उम्र में उनके बेटे अखिलेश यादव की भी सीएम के रूप में ताजपोशी हुई। समाजवादी पार्टी को देश की सबसे ताकतवर क्षेत्रीय पार्टियों में से एक बनाने में जिस शख्स ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई वो हैं 77 साल के मुलायम सिंह यादव।  1992 में बाबरी मस्जिद टूटने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति सांप्रदायिक आधार पर बंट गई और मुलायम सिंह को राज्य के मुस्लिमों का समर्थन हासिल हुआ। अल्पसंख्यकों के प्रति उनके रुझान को देखते हुए कहीं-कहीं उन पर ‘मौलाना मुलायम’ का ठप्पा भी लगा। मुलायम सिंह करीब दो दशक से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। मुलायम सिंह की उम्र 77 साल की हो गयी है। वर्ष 2012 में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने तो उनकी छवि शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव के केयरटेकर के रुप में उभर कर सामने आयी। मुलायम सिंह ने 2017 के आम चुनाव से पहले कुछ ऐसी चाल चली कि अखिलेश के आगे दोनों बौने नजर आने लगे हैं। यह बात भले ही शिवपाल और रामगोपाल और उनके समर्थक न मानें, पर सच्चाई यही है। पारिवारिक विवाद में जिस तरह से मुलायम सिंह ने अखिलेश और रामगोपाल को बेवकूफ बनाया, उससे इन दोनों का ही नुकसान हुआ और राजनैतिक रुप से हाशिए पर आ गए। अब पूरी तरह से आने वाले समय में समाजवादी पार्टी पर अखिलेश यादव का ही एकाधिकार नजर आएगा।