Monday, 11 April 2016

‘नीट’ के जरिये ही होंगे निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश

 अपने एक फैसले को वापस लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निजी मेडिकल कालेजों में दाखिले राष्ट्रीय योग्यता प्रवेश परीक्षा (नीट) के आधार पर होंगे। संविधान पीठ ने सोमवार को दिए अपने आदेश में कहा कि यह फैसला उचित नहीं था इस फैसले में न तो बहुमत के दृष्टिकोण पर विचार किया गया और न ही पीठ के सदस्यों के साथ विमर्श किया गया। इसलिए इस निर्णय पर पुनर्विचार का आदेश दिया जाता है और इसे वापस लिया जाता है।
इस आदेश का देशभर के 600 मेडिकल कालेजों पर असर होगा जो अपने टेस्ट के आधार पर मेडिकल कोर्सों में प्रवेश देते हैं। पूर्व के आदेश में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने कहा था कि निजी मेडिकल कालेजों में प्रवेश नीट के जरिये करने की जरूरत नहीं है। इस पीठ में जस्टिस एआर दवे भी थे। ये कालेज ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सों में प्रवेश अपने टेस्ट के आधार पर कर सकते हैं। पीठ का कहना था कि मेडिकल कौंसिल को नीट कराने का अधिकार नहीं है, यह सिर्फ मेडिकल शिक्षा का विनियमन ही कर सकती है। सोमवार को जस्टिस एआर दवे की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने 18 जुलाई 2013 का फैसला वापस लेते हुए कहा कि इस मामले में दोबारा से सुनवाई होगी। इस आदेश में निजी मेडिकल कालेजों को नीट के दायरे से बाहर कर दिया गया था। संविधान पीठ ने कहा कि पूर्व के फैसले में खामियां थी और इसमें बहुमत के दृष्टिकोण पर विचार नहीं किया गया और न ही स्थापित तथा बाध्यकारी नजीरों पर विचार हुआ। इसलिए हम इस फैसले पर पुनर्विचार करने की याचिका को स्वीकार करते हैं और 18 जुलाई 2013 को सुनाए गए फैसले को वापस लेते हें। साथ ही मामले का नए सिरे से सुनने के आदेश देते हैं। इस फैसले के खिलाफ मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया ने पुनर्विचार के लिए याचिका दायर की थी। उसने कहा था कि टेस्ट कराने का मकसद मेरिट को जांचना है क्योंकि एमबीबीएस करने वाले छात्र डाक्टर बनते हैं जो लोगों को इलाज करते हैं।



Sunday, 10 April 2016

भारत में अब भी सिर्फ 27 फीसदी महिला कर्मचारी

खेल हो या राजनीति, विज्ञान हो या तकनीक, महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। हालांकि भारत के कार्य बल में उनकी हिस्सेदारी अब भी बेहद कम है। देश के कुल कामकाजी लोगों में सिर्फ 27 फीसदी महिलाएं हैं। इंडिया स्पेंड की ओर से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत में पिछले 10 सालों में 2.5 करोड़ महिलाओं ने नौकरी छोड़ी है। कार्य बल में महिलाओं की हिस्सेदारी के मामले में हम बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे हैं। भारत के कामकाजी लोगों में महिलाओं की संख्या बेहद कम है। इस मामले में हमारा देश दक्षिण एशिया में सिर्फ पाकिस्तान से ही बेहतर स्थिति में है। इंडिया स्पेंड की ओर से जुटाए आंकड़ों के मुताबिक स्वास्थ्य और शिक्षा के लिहाज से महिलाओं की स्थिति पहले से काफी बेहतर हुई। बावजूद इसके कार्य क्षेत्र और पेशेवर जगत में उनकी भागीदारी बढ़ने के बजाय घटती जा रही है।

शिक्षा में स्थिति बेहतर हुई पर काम में नहीं
इंडिया स्पेंड के आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2005 में सेकेंडरी एजुकेशन से जुड़े कोर्स में जहां 49.5 फीसदी महिलाएं शामिल थीं वहीं 2012 में इनकी हिस्सेदारी बढ़कर 69.4 फीसदी हो गई। इसी तरह स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उनकी स्थिति में सुधार हुआ है। साल 2005 में जहां जन्म के समय महिलाओं की औसतन जीवन प्रत्याशा 65.4 साल थी, वहीं साल 2012 में यह बढ़कर 68.7 साल हो गई। स्वास्थ्य और शिक्षा में स्थिति सुधरने के बावजूद कार्य बल में महिलाओं की भागीदारी कम हुई है। साल 2005 में देश के कुल कामकाजी लोगों में जहां 36.9 फीसदी महिलाएं थीं, वहीं साल 2012 में उनकी हिस्सेदारी घटकर 26.9 फीसदी पर पहुंच गई।

Friday, 1 April 2016

50 लाख से अधिक आमदनी वालों पर कड़ी नजर

 आयकर विभाग ने आकलन वर्ष 2016-17 के लिए नए आयकर रिटर्न (आईटीआर) फार्म अधिसूचित किए हैं जिसके तहत 50 लाख रुपये सालाना आमदनी और याच, विमान और बहुमूल्य जेवरात का शौक पूरा करने में समर्थ लोगों को इन महंगी परिसंपत्तियों का खुलासा करना होगा. नए फार्म का उपयोग आज से शुरू हो रहे नए वित्त वर्ष से होगा. वित्त मंत्रालय ने इस संबंध में 30 मार्च को राजपत्रित आदेश प्रकाशित किया और करदाता 31 जुलाई तक अपने आयकर रिटर्न भर सकते हैं. विभाग ने नए आईटीआर (आइटीआर-2 और 2ए) फार्म में नया प्रावधान ह्यसाल के अंत तक परिसंपत्ति एवं देनदारी' किया है जो ऐसे मामलों में लागू होगा जिनमें कुल आय 50 लाख रुपये से अधिक है. इस आयवर्ग में आने वाले व्यक्तियों और इकाइयों को ऐसी परिसंपत्तियों की कुल लागत का भी उल्लेख करना होगा.इसलिए नयी आईटीआर प्रणाली के तहत जमीन और मकान जैसी अचल परिसंपत्तियों, नकदी, जेवरात, सरार्फा, वाहन, याच, नाव और विमान जैसी चल परिसंपत्तियों की भी जानकारी कर अधिकारियों को देनी होगी. इन उच्च मूल्य वाली परिसंपत्तियों की जानकारी देने वालों को इस सामान से जुड़े उत्तरदायित्व का खुलासा करना होगा.एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ह्यह्य50 लाख रुपये सालाना से अधिक आमदनी दर्ज करने वालों के लिए नयी खुलासा प्रणाली उच्च निवल मूल्य वाले लोगों और इकाइयों द्वारा की जाने वाली कर चोरी पर लगाम लगाने के लिए बनायी गयी है. उनका आयकर रिटर्न अब तक एक ही फार्म में शामिल होता था लेकिन अब कर अधिकारियों को सूचित करने के लिए नए विशिष्ट कॉलम आवश्यक है.' पहली बार आईटीआर को सरकार की स्टार्टअप कारोबार को बढवा देने के प्रमुख एजेंडे को ध्यान में रखकर इस क्षेत्र से आय अर्जित करने वालों के लिए एक अलग कॉलम लाया गया है. आईटीआर-2ए, ऐसे लोग या एचयूएफ दाखिल करेंगे जिनकी आय न कारोबार, प्रोफेशन या पूंजी लाभ के जरिए होती है और न ही उनके पास विदेशी परिसंपत्ति है. इस में एक नया कॉलम पास थ्रू इनकम (पीटीआई) है और इसके तहत आयकर अधिनियम उद्यम पूंजी कंपनी में किए गए निवेश कारोबार न्यास या निवेश कोष का ब्योरा मांगा गया है जो उभरती कंपनियों या स्टार्टअप कंपनियों से जुड़ा है.
 वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2016-17 के बजट में घोषणा की थी कि स्टार्टअप को तीन साल के लिए 100 प्रतिशत छूट मिलेगी. इस साल के लिए संबंधित फार्म आठ पन्ने (परिशिष्ट समेत) का हो गया है जो पिछले वित्त वर्ष में सात पन्ने का था. आईटीआर-2 का उपयोग भी उसकी प्रकार की इकाइयां करती हैं पर उनके पास विदेशी परिसंपत्तियां होती हैं. इस फार्म में नया पीटीआई कॉलम शामिल है. कुल नौ आईटीआर अधिसूचित किए गए हैं. इनमें सहज आईटीआर-1, आईटीआर-2, आईटीआर-2ए, आईटीआर-3, सुगम (आईटीआर-4एस), आईटीआर-4, आईटीआर-5, आईटीआर-6, आईटीआर-7 और एक पावती फार्म आटीआर-वी शामिल हैं. सबसे आसान आईटीआर-1 (सहज) उन लोगों के लिए है जो वेतन भोगी हैं, एक घर है या अन्य स्रोत हैं. इसमें अब एक-एक अतिरिक्त कॉलम होगा, जिसमें कर संग्रह स्रोत (टीसीएस) का होगा और इस फार्म में अब सात पन्ने होंगे जो पहले पांच पन्नों का होता था. विभाग ने ऐसे कॉलम में कोई बदलाव नहीं किया है जिसमें व्यक्तियों या इकाइयों से विदेशी परिसंपत्तियों के खुलासे की मांग की गयी हो इसके अलावा आधार संख्या, व्यक्तिगत मोबाइल फोन नंबर और ईमेल आईडी जैसी विशिष्ट जानकारियों की अनिवार्यता यथावत रखी गयी है. पासपोर्ट की जानकारियां इस बार भी अनिवार्य की गयी है. व्यक्तियों और इकाइयों को पिछले वर्ष अपने नाम के बचत और चालू बैंक खातों की संख्या का विवरण देने की अनिवार्यता इस भी बनाए रखी गयी है. इसमें निष्क्रिय खातों की जानकारी देने की जरूरत नहीं है.

Saturday, 26 March 2016

छलावे की राजनीति से तौबा करना चाहता है उत्तर प्रदेश का नौजवान

उत्तर प्रदेश का नौजवान कशमकश में है। पिछले दो दशक से यहां का नौजवान छलावे की राजनीति का शिकार होता आ रहा है। कभी वह बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के छलावे में फंसा तो कभी सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के झांसे में आकर अपने जीवन के कीमती समय को गवांया। बदले में कुछ भी हासिल नहीं हुआ, सिवाय बेबसी और बेकारी के। 2017 में एक बार फिर निर्णय लेने का समय आ गया है। नौजवानों पर एक बार फिर डोरे डालने शुरू हो गए हैं। कोई राजगार को प्रलोभन दे रहा है तो कोई बेरोजागरी भत्ते की बात कहकर फिर बहकाना चाहता है। वर्ष 2007 में मायवती के छलावे में आकर नौजवानों ने बसपा की सरकार बनाई तो मायावती ने इसे अपनी कूबत समझ ली और प्रदेश में जमकर लूट व भ्रष्ट्राचार को बढ़ावा दिया। एनआरएचएम घोटाला, मनरेगा घोटाला जैसे कारनामे इसी सरकार के देन रहे। 2012 में नौजवान एक बार फिर मुलायम सिंह के बहकावे में आ बैठे और अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया तो फिर वही देखने को मिला। अखिलेश यादव खुद कठपुतली मुख्यमंत्री साबित हुए। वह अपने मंत्रियों को मनाने में ही पांच साल का समय गवां बैठे। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस भी चुपचाप बैठी रही और लोगों को लुटते देखती रही। अब तो सयम आ गया है जब उत्तर प्रदेश के नौजवान दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ईमानदार और स्वच्छ छवि  के उम्मीदवारों को चुनाव जिताना चाह रहे हैं, भले ही वह स्वतंत्र उम्मीदवार क्यों न हो। 

Friday, 25 March 2016

बदला लेने के लिए लश्कर ए तैयबा से हेडली ने मिलाया था हाथ

मुंबई। आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली ने मुंबई कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि उसने भारत से बदला लेने के लिए लश्कर ए तैयबा संगठन से हाथ मिलाया था। हेडली ने कहा कि 1971 में पाकिस्तान स्थित उसके स्कूल को भारतीय प्लेनों ने बम से उड़ा दिया था जिसके बाद बचपन से ही उसके मन में भारत और भारतीयों के खिलाफ नफरत पैदा हो गई थी। यही वजह थी कि वह भारत को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाना चाहता था। गौरतलब है कि 2008 में हुए 26/11 मुंबई हमले में अपने कथित रोल के लिए फिलहाल हेडली अमेरिका में 35 साल की सजा काट रहा है।
इसलिए करता था भारत से नफरत
मुंबई कोर्ट में क्रॉस एक्जाम के दौरान हेडली ने कहा कि मैं भारत से इसलिए नफरत करता था क्योंकि 1971 में भारतीय हवाई जहाजों ने मेरे स्कूल को उड़ा दिया था, जो लोग वहां काम करते थे वह सब मारे गए थे।' हेडली यहां 3 - 16 दिसंबर 1971 तक हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध का जिÞक्र कर रहा था। उस वक्त हेडली की उम्र 11 साल थी। पाकिस्तानी पिता और अमेरिकी मां के बेटे हेडली ने 16 साल की उम्र तक पाकिस्तान में पढ़ाई की जिसके बाद वह अमेरिका चला गया। मुबंई कोर्ट को उसने बताया कि 2002 में उसने लश्कर से हाथ मिलाया था। मुबंई पर 2008 में हमला करने से पहले हेडली ने अपनी कई यात्राओं के दौरान शहर का जायजा लिया था।

यूसुफ रजा गिलानी उसके घर आए थे
हेडली ने अपने बयान में एक नया मोड़ लाते हुए मुंबई अदालत को बताया कि 26/11 आतंकी हमलों के कुछ हफ्ते बाद ही पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी उसके घर आए थे। हेडली ने सत्र अदालत के विशेष न्यायाधीश जी ए सनाप को बताया कि यह कहना सही नहीं होगा कि पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने 26/11 हमले के एक महीने के बाद मेरे पिता के अंतिम संस्कार में शिरकत की थी। दरअसल, वह (गिलानी) इसके कुछ सप्ताह बाद हमारे पाकिस्तान स्थित घर आए थे। हेडली ने कहा कि उसके पिता पाकिस्तान रेडियो में महानिदेशक थे और वह लश्कर के साथ उसके संबंधों के बारे में जानते थे। हेडली ने कहा कि मेरे पिता लश्कर-ए-तैयबा के साथ मेरे जुड़ाव के बारे में जानते थे और वह इससे खुश नहीं थे। हेडली से जब पूछा गया कि क्या यह सच है कि उसका सौतेला भाई डेनियल उसके लश्कर से संबंध के बारे में जानता था, तो हेडली ने सिर्फ इतना ही कहा कि डेनियल पाकिस्तान में नहीं रह रहा था।

हां मैं बुरा आदमी हूं..
2009 में हेडली को अमेरिका में गिरफ्तार कर लिया गया था और गारंटी दी गई थी कि अगर वह लश्कर के बारे में खुलासे करेगा तो उसे फांसी की सजा नहीं दी जाएगी। फरवरी में अमेरिका की एक अज्ञात जगह से वीडियो लिंक के जरिए कई दिनों तक चली गवाही के बाद अब मुबंई कोर्ट में उसे क्रॉस एक्जाम किया जा रहा है। हेडली ने क्रोस एग्जामिनेशन यह भी बताया कि वह अमेरिका में  शिवसेना के लिए फण्ड रेजिंग प्रोग्राम करना चाहता था। इसके लिए वह राजाराम रेघे से संपर्क में था। हेडली वहां शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को भी ले जाना चाहता था  लेकिन वहां उन पर हमले का कोई प्लान नहीं था। जब हेडली से एफबीआई और उसके बीच हुई डील से जुड़ा सवाल पूछा गया तो हेडली ने हिंदी में कहा हां मैं बहुत खराब आदमी हूँ  मैंने मान लिया। आप कहेंगे तो फिर से मान लेता हूं लेकिन इससे आप साबित क्या करना चाहते हैं?


Tuesday, 22 March 2016

नक्सलवाद खत्म करने के लिए आदिवासियों की राय से विकास योजनाएं बनानी होगी

रायपुर। विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के बुलावे पर छत्तीसगढ़ विधानसभा परिसर में आयोजित होली मिलन समारोह में शामिल होने आए कवि कुमार विश्वास की नक्सलवाद पर राय जुदा है। कुमार विश्वास आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय नेता भी है। उन्होंने सोमवार की रात संस्कृति भवन के गढकलेवा में कुछ पल पत्रकारों के साथ बिताए। यहां उन्होंने हर पहलू पर खुलकर चर्चा की। नक्सलवाद पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जब तक आदिवासियों को विकास योजनाए तैयार करने में भागीदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक इस समस्या का समाधान हो पाना संभव नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि उद्यमियों को सरकार आखिर भूमि क्यों मुहैया कराती है। उद्यमी जिस तरह से कारोबार से जुड़ी हर सामग्री को एकत्र करता है, उसी तरह से उसे भूमि का प्रबंध करने के लिए भी आदिवासियों के बीच जाना चाहिए, किन्तु दुखद पहलू यह है कि उद्यमी भूमि लेने के लिए सरकार के पास आता है और सरकार उसे भूमि मुहैय्या कराती है। इस पहलू पर विचार करना होगा। उन्होंने नक्सलियों द्वारा चलाई जा रही समानान्तर सरकार को लोकतंत्र का शर्मनाक पहलू बताया और कहा कि लोकतांत्रिक देश में ऐसा किसी भी हालत में संभव नहीं हो सकता।

राहुल गांधी पर साधा निशाना
आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधा और चुटकी ली। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी में नेता बनने की न तो सोच है और न ही नेतृत्व करने का कोई गुण है, पर उन्हें पार्टी द्वारा जबरिया नेता का ताज पहनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी चाहे जो कर ले, वह राहुल गांधी को नेता नहीं बना पाएगी।

छत्तीसगढ़ पर ‘आप’की नजर
आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने इस बात का संकेत किया कि पार्टी की नजर छत्तीसगढ़ पर है। पार्टी इस बात का अध्ययन कर रही है कि किस तरह से यहां के स्थानीय नेताओं की भागीदारी को बढ़ाकर संगठन को गांव स्तर तक मजबूत किया जा सके। पांच राज्यों में चुनाव हो जाने के बाद पार्टी छत्तीसगढ़ की ओर रूख कर सकती है।

Saturday, 19 March 2016

साध्वी प्रज्ञा निर्दोष और न्यायिक आतंकवाद की शिकार

अखिल भारतीय संत परिषद के राष्ट्रीय संयोजक व हिन्दू संसद के प्रणेता यति बाबा नरसिंहानंद सरस्वती जी महाराज और हिन्दू स्वाभिमान के राष्ट्रीय कार्यवाहक अध्यक्ष बाबा परमेन्द्र आर्य ने भोपाल के अपने साथियो के साथ  एक प्रेस वार्ता को सम्बोधित किया जिसमे उन्होंने साध्वी प्रज्ञा को निर्दोष और न्यायिक आतंकवाद की शिकार बताया।
प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुये यति बाबा नरसिंहानंद सरस्वती जी ने कहा की भारतीय लोकतन्त्र को नेताओ ने धर्म निरपेक्षता के नाम पर बर्बाद करके रख दिया है।एक विदेशी महिला के इशारे पर चलने वाली कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार ने भगवा आतंकवाद शब्द गढ़ने के लिये बिलकुल गैर संवैधानिक तरीके से निर्दोष साध्वी प्रज्ञा और उनके साथियो को जेल में डाला और अब केवल हिन्दुओ की ताकत पर बनी मोदी सरकार उन्हें इसलिये नहीं छोड़ रही है की कहीं मुसलमान नाराज न हो जाए।इसके लिये जिस तरह से संविधान को कुचला गया है,ये एक सभ्य लोकतन्त्र के लिये शर्मनाक है। उन्होंने बताया की जिस तरह भूमापीठाधीश्वर स्वामी अच्युतानंद तीर्थ जी महाराज ने अर्धकुंभ में धर्म संसद आयोजित करके साध्वी प्रज्ञा के मुद्दे को पुरे संत समाज में उठा दिया था,उसी प्रकार अब कुम्भ में भी ये मुद्दा सन्यासियों के बीच सबसे प्रमुख मुद्दा होगा और संत समाज 14 और 15 मई 2016 को कुम्भ में हिन्दू हितो की रक्षा के लिये हिन्दू संसद का आयोजन करेगा जिसमे साध्वी प्रज्ञा और निर्दोष हिन्दू कार्यकर्ताओ की रिहाई सबसे प्रमुख मुद्दा बनेगी।भूमापीठाधीश्वर स्वामी अच्युतानंद तीर्थ जी महाराज के मार्गदर्शन और जूना अखाडा के अंतर्राष्ट्रीय मंत्री दूधेश्वरनाथपीठाधीश्वर स्वामी नारायण गिरी महाराज की अध्यक्षता में आयोजित होने वाले इस आयोजन में देश के सभी वरिष्ठ संत और 100 से अधिक संगठनो के प्रतिनिधियों के भाग लेने की सम्भावना है।
प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुये हिन्दू स्वाभिमान के राष्ट्रीय कार्यवाहक अध्यक्ष बाबा परमेन्द्र आर्य ने कहा की जिस तरह से देश में हिन्दुओ की जनसंख्या का अनुपात घट रहा है वो न केवल भारतवर्ष बल्कि पुरे विश्व के लिये एक अशुभ संकेत है।ये देश केवल हिन्दू बाहुल्य होने के कारण लोकतान्त्रिक देश है।यदि ये देश हिन्दू बाहुल्य नहीं रहा तो लोकतान्त्रिक भी नहीं रहेगा। उन्होंने कहा की जिस तरह से आई एस आई एस ने भारत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है,ये बहुत ही चिंताजनक बात है।आज हमारे सामने रामजन्मभूमि से बड़ा मुद्दा इस्लामिक जिहाद से हिन्दू के अस्तित्व की रक्षा है।इस बार कुम्भ में इस मुद्दे पर भी गहन चिंतन होगा की यदि भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हो गया तो बचेगा कैसे?जिस तरह से सभी राजनैतिक दल मुस्लिम वोट बैंक के लालच में हिन्दू हितो पर कुठाराघात कर रही हैं इससे संत समाज बहुत चिंतित और खिन्न है।संत समाज हिन्दू संसद के माध्यम से अपनी चिंताओं पर खुल कर मन्थन करेगा। प्रेस वार्ता में श्री दिनेश श्रुति जी,मनदीप चौहान,संजय जी भी उपस्थित थे।

Friday, 18 March 2016

खेती और सहकारिता के समन्वय से किसान बनेंगे खुशहाल

 केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री मोहन भाई कुण्डारिया ने कहा है कि खेती और सहकारिता के समन्वय से ही किसानों को समृद्ध और खुशहाल बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बेहतर कार्य हो रहे हैं और खेती के लिए केन्द्रीय बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। श्री कुण्डारिया ने इस सिलसिले में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और नई फसल बीमा योजना और ई-मण्डी योजना का भी उदाहरण दिया। श्री कुण्डारिया इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में ‘मेक-इन-इंडिया में सहकारिता की भूमिका-ग्रामीण विकास के संदर्भ में’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला के समापन सत्र को सम्बोधित कर रहे थे। मुख्य अतिथि की आसंदी से श्री कुण्डारिया ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य में उन्नत खेती को बढ़ावा देने और किसानों की बेहतरी के लिए लगातार किए जा रहे प्रयासों की भी प्रशंसा की।
लागत कम करने का सुझाव
श्री कुण्डारिया ने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकार दोनों का यह प्रयास है कि उन्नत खेती ऐसी तकनीकों का विकास किया जाए, जिससे किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन मिल सके। उन्होंने इस मौके पर कृषि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय परिसर में रबी अरहर फसल प्रदर्शन, संरक्षित खेती, टिशूकल्चर प्रयोग शाला और जैव नियंत्रण प्रयोगशाला सहित डॉ. आर.एच. रिछारिया के नाम पर स्थापित अनुसंधान प्रयोगशाला का भी अवलोकन किया।

Tuesday, 15 March 2016

प्रतापगढ़ में दिनदहाड़े अधिवक्ता की दुस्साहसिक अंदाज में हत्या

बेखौफ बदमाशों ने 15 मार्च 2016 को उत्तर प्रदेश की सत्तारुढ समाजवादी पार्टी की सरकार के चौथी वर्षगांठ पर प्रतापगढ़ में दिनदहाड़े अधिवक्ता की दुस्साहसिक अंदाज में हत्या कर दी। सुबह बाइक से कचहरी आ रहे जवाहर लाल मिश्र (50) पर ओझा का पुरवा के पास कई गोली मारी गईं। घटना से गुस्साए अधिवक्ताओं शव लेकर जिला जज के चैंबर के सामने रख दिया और धरने पर बैठ गए। देर शाम तक धरना जारी था। मुख्यमंत्री ने अधिवक्ता के आश्रितों को दस लाख रुपये दिये जाने की घोषणा की है। लालगंज कोतवाली क्षेत्र के लीलापुर पंडित का पुरवा खरगपुर गांव निवासी जवाहरलाल मिश्र (55) जिला मुख्यालय पर वकालत करते थे। मंगलवार सुबह वह बाइक से कचहरी आ रहे थे। करीब साढे़ 11 बजे वह शहर के करीब नगर कोतवाली के पूरे ओझा गांव स्थित चंद्रशेखर आजाद बाल शिक्षा निकेतन के पास पहुंचे बाइक सवार दो युवकों ने उन्हें रोका और उनके हेलमेट में पिस्टल डालकर कई गोलियां सिर में उतार दी। हेलमेट उनके सिर से नहीं निकला और वह जमीन पर गिर पड़े। करीब आधे घंटे बाद पहुंची पुलिस ने उन्हें मैजिक से जिला अस्पताल भेजा, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। वकील की हत्या की खबर पर जिला प्रशासन को पहले ही बवाल की आशंका हो गई थी और जिला अस्पताल को छावनी बना दिया गया था। हालांकि तब तक भारी संख्या में वकील पहुंचे और पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों को धक्का देकर शव लेकर चले आए। पहले उनका शव पुलिस लाइंस गेट पर रखकर चक्काजाम किया गया लेकिन जैसे ही पता चला कि पुलिस लाइंस में सरकारी कार्यक्रम में आए जनपद प्रभारी मंत्री सुरेंद्र सिंह पटेल यहां से जा चुके हैं तो लोग शव लेकर पहले कचहरी, फिर जिलाजज कार्यालय पहुंच गए। यहां शव बरफ पर रखकर हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग करने लगे। वकीलों का कहना था कि पंचायत चुनाव के दौरान उनके बेटे को गोली मारी गई थी। यही नहीं उनके परिवार वालों पर पिछले सप्ताह भी हमला किया गया था लेकिन उपयुक्त कार्रवाई न करने के कारण उनकी भी हत्या कर दी गई। 

Tuesday, 8 March 2016

रानी लक्ष्मीबाई वीरता पुरस्कार से नवाजी गई शिक्षाविद् डा. भारती गाँधी

लखनऊ सिटी मोन्टेसरी स्कूल की संस्थापिका-निदेशिका एवं प्रख्यात शिक्षाविद् डा. (श्रीमती) भारती गाँधी एवं 85 अन्य महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान हेतु आज मुख्यमंत्री  अखिलेश यादव ने ‘रानी लक्ष्मीबाई वीरता पुरस्कार’ प्रदान कर सम्मानित किया। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित एक समारोह में सभी पुरस्कार विजेता महिलाओं को एक-एक लाख रूपये नगद पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। सी.एम.एस. संस्थापिका-निदेशिका एवं प्रख्यात शिक्षाविद् डा. (श्रीमती) भारती गाँधी को यह पुरस्कार महिला सशक्तीकरण की दिशा में उनके उल्लेखनीय योगदान हेतु प्रदान किया गया। उक्त जानकारी सी.एम.एस. के मुख्य जन-सम्पर्क अधिकारी हरि ओम शर्मा ने दी है। श्री शर्मा ने बताया कि पुरस्कार समारोह के उपरान्त एक अनौपचारिक वार्ता में डा. गाँधी ने कहा कि नारी को सशक्त, समझदार व समाज में रचनात्मक योगदान हेतु प्रेरित करना ही मेरे जीवन का ध्येय है। वर्तमान आधुनिक समाज में भी महिलाओं से जुड़े कई गंभीर मुद्दे हैं जिन पर जागरूकता व रचनात्मक सोच की जरूरत है।

Saturday, 5 March 2016

कन्हैया को भारत में कैसी आजादी चाहिए?

हमारे युग की कला क्या है? न्याय की घोषणा, समाज का विश्लेषण, परिमाणत: आलोचना। विचारतत्व अब कलातत्व तक में समा गया है। यदि कोई कलाकृति केवल चित्रण के लिए ही जीवन का चित्रण करती है, यदि उसमें वह आत्मगत शक्तिशाली प्रेरणा नहीं है जो युग में व्याप्त भावना से नि:सृत होती है, यदि वह पीड़ित ह्रदय से निकली कराह या चरम उल्लसित ह्रदय से फूटा गीत नहीं, यदि वह कोई सवाल नहीं या किसी सवाल का जवाब नहीं तो वह निर्जीव है।
बेलिंस्की (19वीं शताब्दी में रूस के जनवादी कवि)
दिल्ली के जवाहरलाल यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पहले गिरफ्तारी और अब तिहाड़ जेल से रिहाई के बाद दिया गया भाषण देश में राजनीति का केन्द्र बन गया है। यह देश के लिए दुर्भाग्य की बात तो है ही लेकिन सबसे अधिक दुर्भाग्य की बात भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टी के नेताओं के लिए है। देश के दोनों शीर्षस्थ दलों को यह समझना चाहिए ‘ये पब्लिक है सब जानती है’। न भाजपा के कहने से कोई देशद्रोही हो जाएगा और न ही कांग्रेस के कहने से कोई राष्ट्रभक्त। इस लेख के माध्यम से हम इस तथ्य को देश के आम नागरिकों तक पहुंचाना चाहते हैं कि किस तरह से एक सोची-समझी रणनीति बनाकर राजनीतिक दलों द्वारा लोगों को मूल विषय से भटकाने की कोशिश की जा रही है। घटना के मूल को देखें तो जो रिपोर्ट सामने आयी है उसके अनुसार 9 फरवरी 2016 को जेएनयू में डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन की तरफ से अफजल गुरु की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। सांस्कृतिक संध्या के नाम पर आयोजित कार्यक्रम में कश्मीर की आजादी पर चर्चा होनी थी और अफजल गुरु से जुड़ी एक फिल्म भी दिखाई जानी थी। सांस्कृतिक संध्या के लिए के लिए पहले यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इजाजत दी थी लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से बीस मिनट पहले उसे रद्द कर दिया गया। बावजूद इसके डीएसयू के उमर खालिद की अगुवाई में कार्यक्रम हुआ और उसमें देश विरोधी नारे लगे। वहां मौजूद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोगों ने इसका विरोध किया और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन के खिलाफ नारेबाजी की। कार्यक्रम के दौरान वहां पुलिस मौजूद थी लेकिन वो मूकदर्शक बनी रही। अखिल भारतीय विद्याथी परिषद ने अगले दिन थाने में शिकायत दर्ज करवाई और यूनिवर्सिटी कैंपस में विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। ग्यारह फरवरी को बीजेपी सांसद महेश गिरी ने वसंतकुंज थाने जाकर एफआईआर दर्ज करवाई। पुलिस ने अज्ञात लोगों पर धारा 124 अ के तहत केस दर्ज किया। बारह फरवरी को जांच के लिए पुलिस जेएनयू पहुंची और छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लिया। कन्हैया के अलावा पुलिस की डायरी में कार्यक्रम के आयोजक उमर खालिद समेत पांच और लोगों के नाम हैं। दिल्ली पुलिस का दावा है कि उसके पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि कन्हैया ने भी देश विरोधी नारे लगाए थे। 15 फरवरी को पटियाला हाउस कोर्ट में कन्हैया की पेशी के दौरान वकीलों ने पत्रकारों और कोर्ट में मौजूद जेएनयू के छात्रों के साथ मारपीट की। कोर्ट में कन्हैया की पेशी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशा निर्देश के बावजूद 17 फरवरी को पटियाला हाउस कोर्ट में फिर हंगामा हुआ। वकीलों ने पेशी के दौरान कन्हैया पर हमला किया। पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी हुई। पूरे घटनाक्रम से नजर डालने पर दूध का दूध और पानी का पानी साफ हो जाता है कि न तो जेएनयू में आयोजित कार्यक्रम को देश का आम नागरिक सही ठहराएगा और न ही उसके बाद कोर्ट परिसर में तथाकथित वकीलों द्वारा कई गई मारपीट को सही ठहराया जाएगा। इन सारे मामलों में संविधान में प्रदत्त कानून के तहत कार्रवाई की जानी ही चाहिए। पर ऐसा नहीं हो रहा है। लोग अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में लग गए हैं। दूसरी तरफ देखें तो  जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के परिवार का कहना है कि ‘गरीब का बेटा होने की वजह से उन्हें फंसाया जा रहा है’। कन्हैया का संबंध बिहार के बेगूसराय जिÞले से है और उनका परिवार जिÞले के बरौनी प्रखंड के बीहट में रहता है। उनके पिता जयशंकर सिंह लकवा ग्रस्त हैं जबकि उनकी मां आंगनबाड़ी सेविका हैं। देशद्रोह के मामले में गिरफ़्तारी के बाद जमानत पर रिहा हुए जेएनयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने 3 मार्च 2016 की रात जेएनयू परिसर में छात्रों को संबोधित किया।
उनके संबोधन के कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं-
-- इस देश में जनविरोधी सरकार है। उस सरकार के खिलाफ बोलेंगे तो इनका साइबर सेल डॉक्टर्ड वीडियो दिखाएगा।
-- हमें एबीवीपी से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि हम सही मायनों में गणतांत्रिक लोग हैं। हम भारतीय संविधान में विश्वास करते हैं।
--दोस्तों मैं तुम्हारा यानी एबीवीपी का विच-हंटिंग नहीं करूंगा क्योंकि शिकार उसका किया जाता है जो शिकार करने लायक है। हम एबीवीपी को एक शत्रु की तरह नहीं बल्कि विरोधी के तौर पर देखते हैं।
-- प्रधानमंत्री जी ने ट्वीट किया है और कहा है सत्यमेव जयते। प्रधानमंत्री जी आपसे भारी वैचारिक मतभेद है लेकिन क्योंकि सत्यमेव जयते आपका नहीं इस देश का संविधान का है, मैं भी कहता हूं सत्यमेव जयते।
-- जेएनयू पर हमला एक योजना के तहत है क्योंकि वे यूजीसी के विरोध में प्रदर्शन को खत्म करना चाहते हैं और रोहित वेमुला के लिए न्याय की लड़ाई को धीमा करना चाहते हैं। इस देश की सत्ता ने जब जब अत्याचार किया है, जेएनयू से बुंलद आवाज आई है, आप हमारी लड़ाई को धीमा नहीं कर सकते।
-- भारत से नहीं भाइयों, भारत में आजादी मांग रहे हैं। ‘से’ और ‘में’ में फर्क होता है। कुछ को तो आपने हर-हर कहकर झक लिया, आजकल अरहर से परेशान हैं।
-- आज आप छात्र और हम यहां है क्योंकि आपको लगता है कि आप पर हमला हुआ है। लेकिन यह हमला कुछ समय पहले ‘स्वामी’ ने किया था।
-- ये लंबी लड़ाई है। बिना झुके, बिना रुके हमें लड़ना है। रोहित वेमुला ने जो लड़ाई शुरू की, आप और देश के शांतिप्रिय लोग इस लड़ाई को आगे ले जाएंगे और हम इस लड़ाई में जीतेंगे।
-- भारत से नहीं भारत को लूटने वालों से आजादी चाहते हैं। हमें भूख, भ्रष्टाचार, जातिवाद और प्रांतवाद से आजादी चाहिए।

कन्हैया कुमार के भाषण के अंशों को पढ़कर आप समझ गए होंगे कि सबका असली मकसद क्या हैं। कन्हैया कुमार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य है। वह जिस देश में आजादी मांग रहे हैं, उन्हें यह महसूस करने की जरूरत है कि शायद अगर इस देश में आजादी न होती तो वह एक गरीब परिवार से निकलर दिल्ली में जेएनयू जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ के अध्यक्ष न बन पाते। जिस देश में वह भूख, भ्रष्टाचार, जातिवाद और प्रांतवाद से आजादी चाहते हैं, इसकी शुरूआत उन्हें जेएनयू कैम्पस से ही करनी चाहिए। कन्हैया की मांगों में आतंकवाद, उग्रवाद और माओवाद से आजादी पाने की चाहत नहीं झलक रही है। उन्हें देश के प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने से पहले इन समस्याओं पर भी जिक्र करना चाहिए था। देश में माओवाद की बढ़ती घटनाओं पर चिंता करने के बजाय इसी जेएनयू यूनिवर्सिटी से आदिवासियों और वंचित वर्ग के हितैशी बनने का चोला ओढ़कर तमाम विचारकों, साहित्यकारों के छद्मवेश में लोगों के चेहरे आए दिन सामने आते रहते हैं। क्या ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। अगर देश में माओवाद , आतंकवाद और उग्रवाद की बढ़ती घटनाओं पर चुप रहना देशभक्ति है तो कन्हैया कुमार सहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो देश के संविधान में प्रदत्त कानून के तहत कार्रवाई होनी ही चाहिए। सबसे दुखद पहलू यह है कि देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर केन्द्रित न होकर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जैसे नेता अपने भाषणों में जेएनयू मामले को केन्द्रित कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे देश में उनका वोट बढ़ जाएगा। कांग्रेस के राहुल गांधी भी कन्हैया के पक्ष में बोल रहे हैं। पर दोनों शीर्ष राजनैतिक दल इस तथ्य को भलीभांति जान लें कि देश का नागरिक एक-एक घटनाओं का बारीकी से अध्ययन कर रहा है। सच क्या है वह आने वाले समय में बता देगा।
रमेश पाण्डेय
वरिष्ठ पत्रकार

Monday, 1 February 2016

गांधी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि राजव्यवस्था का शोकगीत

गांधी जी के अनुसार, 'भू-मण्डल पर हमारा देश सबसे अधिक गरीब है और आजाद भारत के जन-प्रतिनिधि ऐसे ढंग और तौर-तरीकों से रहने का साहस नहीं कर सकते जो उनके निर्वाचकों के रहन-सहन से मेल ना खाता हो।' इन सबसे परे राजनेता विदेश में गुप्त रूप से छुट्टी मनाने जाते हैं और गांवों में रात्रिवास का मीडियानामा पढ़ा जाता है। बुन्देलखण्ड में बदहाल गांवों वाले उत्तर प्रदेश में सरकार द्वारा सैफई में सैकड़ो करोड़ रुपये खर्च कर हवाई जहाज के लिए रनवे का निर्माण किया गया जिस पर अब नाईट लैण्डिंग की भी सुविधा की जा रही है। लाखों गांवों की बदहाली की अनदेखी कर स्मार्ट सिटी के रनवे की रौनक में उड़ान भरने वाले जनप्रतिनिधियों का गांधी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दरअसल राजव्यवस्था का शोकगीत है। गांधीजी की पुण्यतिथि पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस का स्मरण स्वाभाविक है, जिन्होंने जुलाई 1944 में रेडियो रंगून से गांधी को राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित किया था। अब आज़ादी के नायक सुभाष, बंगाल में सत्ता की राजनीति के मोहरे ही बन गए हैं। आजादी के दिन 15 अगस्त 1947 को बंगाल के मन्त्रियों से मिलने पर गांधीजी ने कहा था कि 'सत्ता पाने पर वे वैभव के जाल में ना फंसे क्योंकि उन्हें गांवों और गरीबों का उद्धार करना है।' आजादी के 68 वर्ष पश्चात् देश के 1 फीसदी अमीरों का 53 फीसदी सम्पत्ति के साथ उद्धार हुआ है और हाशिए के 50 फीसदी लोग 4.1 फीसदी सम्पत्ति के साथ लाचारी की जिन्दगी जी रहे हैं। सांसद लोग गांव और गरीब की तस्वीर भले ही ना बदल सके हों, पर 2004 से 2009 के पांच साल के दौरान 304 सांसदों की सम्पत्ति में 300 फीसदी का इजाफा ज़रूर हो गया। गांधीजी ने कहा था, 'मंत्री पद तो सेवा का द्वार है और नेताओं को एक-एक पाई बचाना चाहिए।' आज के भारत में गांधी के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं के लिए चार्टर्ड विमानों का बेड़ा तथा सुरक्षा के नाम पर हजारों करोड़ खर्च किये जा रहे हैं। गांधी के अहिंसा के सिद्धांतों की अनदेखी कर विधानसभा-संसद में हिंसा करने वाले जनप्रतिनिधि जनता की अपेक्षाओं पर विफल होने पर भी अपने वेतन और भत्तों में बेइंतहा इजाफा कर रहे हैं। आईआईएम द्वारा वर्ष 2014 में किये गये अध्ययन के अनुसार पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल देश में सर्वाधिक वेतन पाने वाले मुख्यमंत्री हैं। आम जनता की भलाई के नाम पर दिल्ली में सरकार बनाने वाली 'आप' सरकार ने विधायकों के वेतन भत्तों में चार गुना तक वृद्धि का प्रस्ताव पारित किया है जिससे वे देश में सबसे अधिक वेतन पाने वाले विधायक हो जायेंगे। 88,500 रुपये सालाना प्रति व्यक्ति आय वाले देश में, दिल्ली के विधायक लगभग 3.2 लाख रुपये का मासिक वेतन और भत्ते लेंगे और उस दौड़ में अब संसद सदस्य भी शामिल हो गए हैं। गांधी के नाम पर सरकार बनाने वाले राजनेता जनता की सेवा में विफल होने के बावजूद आजीवन भारी भरकम पेंशन का इंतजाम करके राजनीतिक सत्ता का लाभ लेते रहते हैं। बाहुबलियों का तंत्र जो सत्ता-संस्थानों में शीर्ष पर काबिज है, वही पंचायती राज के नाम पर संसाधनों को अपने कब्जे में लेने की कोशिश में जुट गया है। इससे गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है जिसका मर्सिया स्मार्ट सिटी में लिखे जाने की प्रस्तावना बन रही है।

Sunday, 8 November 2015

देश का मूड समझें मोदी

 2014 में जब देश में लोकसभा का चुनाव चल रहा था, हर ओर लोगों के दिलो दिमाग पर एक ही नेता के नाम की धूम थी। वह नाम था गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी का। देश के मतदाताओं ने किसी की बात नहीं सुनी, नरेन्द्र मोदी की बात पर भरोसा किया और उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए प्रचंड बहुमत से चुना। शायद लोगों को इस बात का विश्वास था कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में आमूलचूल परिवर्तन हो जाएगा। पर प्रधानमंत्री बनने के 18 माह बाद भी देश में कोई परिवर्तन नहीं नजर आया। न गुड गवर्नेंस दिखा, न ही महंगाई कम हुई, न ही भ्रष्ट्राचार कम हुआ और न ही देश में बलात्कार जैसी अपराध की घटनाएं कम हुर्इं। उल्टे देश को कुछ नई घटनाओं का सामना करना पड़ा। मसलन ‘लव जिहाद’, ‘घर वापसी’, आरक्षण खत्म करने की वकालत जैसे नए मुद्दे गढ़े जाने लगे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेन्द्र मोदी के तेवर विपक्षी नेता जैसा ही दिखता रहा। पूरे देश में भाजपा के शीर्ष नेताओं पर भी एकाधिकार कायम करने की कोशिश शुरू हो गयी। हर मुद्दे पर अपनी अलग राय रखने में महारत हासिल करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन समस्याओं का समाधान ढूंढने के बजाय विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए उस पर एक नई तोहमत लगानी शुरू कर दी। दिल्ली में चुनाव आया तो उन्होंने अरविन्द केजरीवाल को निशाने पर ले लिया और उनके गोत्र पर सवाल खड़ा दिया। बिहार का चुनाव आया तो उन्होंने नीतीश कुमार के डीएनए पर सवाल खड़ा कर दिया। दिल्ली की तरह बिहार के चुनाव में भी पूरा प्रचार अभियान खुद पर केन्द्रित कर लिया। नतीजा यह निकला कि पब्लिक का मूड बदल गया। जो पब्लिक लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नाम की माला जप रही थी, उसी पब्लिक ने दूसरा विकल्प ढूंढना शुरू कर दिया। दिल्ली में भारी परायज मिलने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता का मूड नहीं समझा और बिहार के चुनाव में फिर वही राग अलापना शुरू कर दिया। अब बिहार के परिणाम सामने हैं। यहां भी मोदी के गठबंधन को महा हार का सामना करना पड़ा है। प्रधानमंत्री को यह समझना चाहिए कि देश की जनता कभी किसी के पीछे चलने की आदी नहीं है। उसे विकास के साथ ही भरपूर स्नेह, प्यार और आपसी भाईचारे की भावना भी चाहिए। उसे बगैर स्नेह, प्यार और भाईचारे के कोरा विकास की बात सहज मंजूर नहीं है। 

Thursday, 6 August 2015

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री दिखाएं नैतिकता


शिक्षक समाज का दर्पण होता है। शिक्षक छात्र को जिस सांचे में ढालता है, वैसे ही उस समाज का निर्माण होता है। किसी समाज के उत्थान और पतन का इतिहास उस समाज के शिक्षक ही तय किया करते हैं। अगर शिक्षक नैतिक विहीन हो जाए तो वह समाज कैसा होगा? शायद इसीलिए हमेशा से महापुरुषों ने नैतिकता को बनाए रखने पर विशेष जोर दिया है। अहम सवाल है कि शिक्षकों  का   नेतृत्व करने वाला शिक्षा मंत्री ही अगर नैतिक विहीन आचरण करे तो समाज की क्या दशा होगी। नयी पीढ़ी को आदर्शवान बनाने वाले शिक्षक की मनोदशा पर क्या प्रभाव पड़ेगा? आदि जैसे कई सवाल खड़े होंगे। इन सारे सवालों को इसलिए उठा रहा हूं कि छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप को अपनी पत्नी के कारण नैतिकता की अग्निपरीक्षा में उतरना होगा। अगर वह इससे दूर भागते हैं तो समाज और राजनीति की नजरों में हमेशा के लिए गिर जाएंगे और नैतिकता के मानदंड पर खरे उतरते हैं तो हमेशा के लिए उदाहरण बन जाएंगे और उनका प्रकरण एक नजीर के रूप में पेश किया जाएगा। आइए हम उस पूरी घटना का जिक्र करते हैं, जिसके कारण छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप की नैतिकता पर सवाल खड़ा हो गया है। केदार कश्यप बस्तर टाइगर के रुप में प्रसिद्ध रहे आदिवासी नेता बलीराम कश्यप के दूसरे बेटे हैं। बलीराम बस्तर क्षेत्र के आधा दर्जन से अधिक बार लोकसभा के सदस्य निर्वाचित रहे हैं। उनके निधन के बाद उस सीट पर वर्तमान में बलीराम के बड़े बेटे दिनेश कश्यप सांसद हैं। दिनेश के ही छोटे भाई केदार कश्यप छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री है। कश्यप बंधुओं का छत्तीसगढ़ सरकार में खासा प्रभाव है। केदार कश्यप की पत्नी शांति कश्यप पं. सुंदरलाल शर्मा ओपन यूनिवर्सिटी की एमए (अंग्रेजी) फाइनल ईयर की छात्रा हैं। वह जगदलपुर जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित लोहंडीगुडा में बने परीक्षा केन्द्र पर परीक्षार्थिनी के रूप में शामिल हैं। 4 अगस्त 2015 को द्वितीय पाली में (2 से 5 बजे) अंग्रेजी विषय का अंतिम प्रश्नपत्र की परीक्षा थी। केदार कश्यप की पत्नी के रोल नंबर 66863 को कंक्ष क्रमांक 10 में सीट आवंटित हुई थी। परीक्षा के दौरान इस सीट पर किरण मौर्य नाम की महिला परीक्षा देती पायी गयी। किरण मौर्य के पास से शांति कश्यप के नाम से जारी प्रवेश पत्र पाया गया। इस प्रवेश पत्र पर शांति कश्यप की फोटो लगी थी। इतना ही नहीं किरण मौर्य पूछताछ में खुद को यह सबित करने की कोशिश कर रही थीं कि वह ही केदार कश्यप की पत्नी हैं। पर जांच पड़ताल में मामला खुलकर सामने आ गया। स्पष्ट रूप से कहा जाय तो सच यह है कि शिक्षा मंत्री की पत्नी होने का लाभ उठाकर शांति कश्यप ने अपने स्थान पर दूसरी महिला को परीक्षा देने के लिए बैठा रखा था। इस कार्य में निश्चित रुप से परीक्षा संचालन सामिति और केन्द्र व्यवस्थापक का भी सह प्राप्त है। अगर ऐसा न होता तो शिक्षा मंत्री की पत्नी के स्थान पर कोई दूसरी महिला परीक्षा देने कैसे बैठ जाती है। पं. सुंदरलाल शर्मा ओपन यूनिवर्सिटी के कुलपति वंश गोपाल सिंह ने शांति कश्यप को परीक्षा के लिए अपात्र घोषित कर दिया है। इसके बाद शिक्षा मंत्री केदार कश्यप का बयान आया कि उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं है कि उनकी पत्नी परीक्षा दे रही हैं। ऐसा कैसे संभव है। साफ है कि प्रकरण उजागर होने के बाद शिक्षा मंत्री अपना बचाव कर रहे हैं। क्या शिक्षा मंत्री जैसे महत्पूर्ण पद पर बैठे लोगों का आचरण ऐसा होना चाहिए। केन्द्र में यूपीए-1 की सरकार थी। उस समय तत्कालीन केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री रहे शशि थरुर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था, उनके ऊपर सिर्फ यह आरोप लगा था कि उनकी पत्नी सुनंद पुष्कर ने आईपीएल फ्रेंचाइजी के शेयरों में अनुचित लाभ प्राप्त किया है। यूपीए-1 में ही कानून मंत्री रहे सलमान खुर्शीद की पत्नी लुइस खुर्शीद पर आरोप लगा था कि उनके एनजीओ को विकलांगों के नाम पर मिले सरकारी धन में हेराफेरी की गई है। इस आरोप के बाद सलमान खुर्शीद को कानून मंत्रालय से हटाकर विदेश मंत्रालय का मंत्री बना दिया गया था। अब चाहे छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री यह जानते हों कि उनकी पत्नी परीक्षा दे रही थी या फिर इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। यह कहने से कोई फायदा नहीं है। अब तो उन्हें अपनी नैतिकता का प्रदर्शन करना चाहिए। इस बात का निर्णय केदार कश्यप स्वयं करे कि ऐसी दशा में समाज के सामने उन्हें क्या सफाई देनी है और खुद को कैसे दंडित करना है। अंत में सिर्फ इतना और बात खत्म-
मै ही खुद ही गुनहगार हूँ
अपनी बरबादियों का
न मै मोहब्बत करता न वो बेवफा होती

Sunday, 14 June 2015

भारतीय राजनीति और मोदी ‘योग’ के सूत्र

संयुक्त राष्ट्र सभा और संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाए जाने की मंजूरी दे दी है। अब 21 जून को विश्व के कई देशों खासकर अमेरिका, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसों देशों में एक साथ योग करने की तैयारी कर रखी है। इसके पीछे भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को श्रेय दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सभा में इसका प्रस्ताव रखा था। भारत में 21 जून को होने वाले योग को गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड में दर्ज कराए जाने की तैयारी चल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का खास फोकस इस बिन्दु पर है। देश के भाजपा शासित राज्यों में भी योग दिवस को ऐतिहासिक बनाने की तैयारी जोरों पर चल रही है। प्रधानमंत्री लगातार सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को योग के फायदे बताने की कोशिश कर रहे हैं। वह योग को सीधे शारीरिक स्वास्थ्य से जोड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री चाहे जितनी सफाई दें पर राजनीतिक विश्लेषक इस बहाने नरेन्द्र मोदी की जन-जन तक राजनीतिक पैठ बनाए जाने की दिशा में बढ़ता एक मजबूत कदम के रुप में देख रहे हैं। शायद इसी वजह से विपक्ष के नेताओं द्वारा इसकी कहीं-कहीं मुखालफत भी की जा रही है। मोदी के इस कदम को योग के जरिए भारतीय राजनीति में पकड़ मजबूत करने के एक सूत्र के रुप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना है कि भारतीय संस्कृति से जुड़ा व्यक्ति नरेन्द्र मोदी के इस कदम से कहीं न कहीं उनसे जरूर प्रभावित होगा। नरेन्द्र मोदी के इस कदम से देश के हर युवा में उनकी अपनी अलग तरह की छवि उभरकर सामने आएगी। या यूं सीधे कहा जाए तो देश के युवा वर्ग का एक बड़ा तबका सीधे योग के जरिए नरेन्द्र मोदी से जुड़ जाएगा। उनके इस कदम के परिणाम क्या होंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा, पर तात्कालिक तौर पर मोदी के इस कदम से राजनीति करने वाले विपक्षियों में बौखलाहट बढ़ी है। योग की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘युज’ से हुई है जिसका अर्थ जोड़ना है। योग शब्द के दो अर्थ हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। पहला है-जोड़ और दूसरा है समाधि। जब तक हम स्वयं से नहीं जुड़ते, समाधि तक पहुंचना असंभव होगा। योग का अर्थ परमात्मा से मिलन भी है। भारत के छह दर्शनों में से एक है योग। ये छह दर्शन हैं- 1.न्याय 2.वैशेषिक 3.मीमांसा 4.सांख्य 5.वेदांत और 6.योग। योग के माध्यम से शरीर, मन और मस्तिष्क को पूर्ण रूप से स्वस्थ्य किया जा सकता है। तीनो के स्वस्थ्य रहने से आत्मा स्वत: की स्वस्थ महसूस करती है। लंबी आयु, सिद्धि और समाधि के लिए योग किया जाता रहा है।
संघ के सामने दिखने लगा संकट
संघ के सामने का संकट दिखने लगा है कि योग और युवाओं के जरिये अगर बाबा रामदेव का विस्तार होता चला गया, तो संघ के स्वयंसेवक भी एक वक्त के बाद बाबा रामदेव के साथ चले जायेंगे। क्योंकि स्वाभिमान ट्रस्ट के साथ जुड़े युवाओं को रोजगार मिलता है, जबकि संघ के स्वयंसेवक के तौर पर सेवा करने के एवज में कोई सहूलियत संघ अभी भी नहीं दे पाता है। यही वजह है कि उत्तराखंड के कई युवा स्वयंसेवक बाबा रामदेव के साथ जुड़ गये। दरअसल, मोदी सरकार यह भी समझ रही है कि अगर देशभर के युवा एक छतरी तले आ जायें, तो फिर विकास की जिस अवधारणा को लेकर वह देश में नयी लकीर खींचना चाह रही है, उसे खींचने में भी आसानी होगी। उसके बाद विवेकानंद के साथ दीनदयाल उपाध्याय के बारे में भी देश भर के छात्र-छात्राएं जानें, इस दिशा में भी काम होगा।
रामदेव के शिष्य सत्यवान को मिला महत्व 
21 जून के अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए 35 पेज की जो पुस्तिका निकाली जा रही है, उसमें योग और भारतीय संस्कृति के उन्हीं बिंदुओं का जिक्र किया गया है, जिनका जिक्र बाबा रामदेव पतंजलि के तहत करते रहे हैं। इसीलिए 21 जून को बाबा रामदेव ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में जब अपने योग कार्यक्रम के लिए जगह मांगी, तो उन्हें यह कह कर जगह नहीं दी गयी कि सुरक्षा का संकट पैदा हो जायेगा। फिर इसी के समानांतर बाबा रामदेव के दूसरे शिष्य सत्यवान को महत्व देना शुरू कर दिया। अब आलम यह है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने रामदेव के शिष्य सत्यवान से पीएमओ में मुलाकात की और अब संघ समर्थित सुदर्शन चैनल पर भी सत्यवान के योग कार्यक्रम वैसे ही शुरू हो गये हैं, जैसे कभी बाबा रामदेव के शुरू हुए थे। यानी पहली बार संघ ही नहीं, सरकार भी इस सच को समझ रही है कि अगर देशभर के युवा, योग और भगत सिंह के नाम पर जुड़ते चले गये, तो फिर राजनीतिक तौर पर भी वैचारिक जमीन खुद-ब-खुद तैयार होती चली जायेगी।
योग सभी धर्मों का महत्वपूर्ण अंग 
योग सभी धर्मों का महत्वपूर्ण अंग है। यह बात अलग है कि हर धर्म में इसे अलग-अलग रूप से स्वीकार्य किया गया है। वेद, पुराण आदि ग्रन्थों में योग के अनेक प्रकार बताए गए हैं। भगवान कृष्ण ने योग के तीन प्रकार बताए हैं-ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग। जबकि योग प्रदीप में योग के दस प्रकार बताए गए हैं-1.राज योग, 2.अष्टांग योग, 3.हठ योग, 4.लय योग, 5.ध्यान योग, 6.भक्ति योग, 7.क्रिया योग, 8.मंत्र योग, 9.कर्म योग और 10.ज्ञान योग। इसके अलावा होते हैं-धर्म योग, तंत्र योग, नाद योग आदि।
आष्टांग योग का सर्वाधिक प्रचलन
आष्टांग योग अर्थात योग के आठ अंग। इसका सर्वाधिक प्रचलन और महत्व है। यह आठ अंग सभी धर्मों का सार है। उक्त आठ अंगों से बाहर धर्म, योग, दर्शन, मनोविज्ञान आदि तत्वों की कल्पना नहीं की जा सकती। यह आठ अंग हैं-(1)यम (2)नियम (3)आसन (4)प्राणायम (5)प्रत्याहार (6)धारणा (7)ध्यान और (8)समाधि। उक्त आठ अंगों के अपने-अपने उप अंग भी हैं। वर्तमान में योग के तीन ही अंग प्रचलन में हैं- आसन, प्राणायाम और ध्यान। योग को प्रथम यम से ही सिखना होता है।
यम- सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह।
नियम- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान।
आसन- आसनों के अनेक प्रकार हैं। आसन के संबंध में हठयोग प्रदीपिका, घरेण्ड संहिता तथा योगाशिखोपनिषद् में विस्तार से वर्णन मिलता है।
प्राणायाम- नाड़ी शोधन और जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायम के भी अनेकों प्रकार हैं।
प्रत्याहार- इंद्रियों को विषयों से हटाकर अंतरमुख करने का नाम ही प्रत्याहार है।
धारणा- चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।
ध्यान- ध्यान का अर्थ है सदा जाग्रत या साक्षी भाव में रहना अर्थात भूत और भविष्य की कल्पना तथा विचार से परे पूर्णत: वर्तमान में जीना।
समाधि- समाधि के दो प्रकार है- संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात। समाधि मोक्ष है। मोक्ष प्राप्त करने के लिए उपरोक्त सात कदम क्रमश: चलना होता है।
योग का संक्षिप्त इतिहास 
योग का उपदेश सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने सनकादिकों को, पश्चात विवस्वान (सूर्य) को दिया। बाद में यह दो शखाओं में विभक्त हो गया। एक ब्रह्मयोग और दूसरा कर्मयोग। ब्रह्मयोग की परम्परा सनक, सनन्दन, सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु और पच्चंशिख नारद-शुकादिकों ने शुरू की थी। यह ब्रह्मयोग लोगों के बीच में ज्ञान, अध्यात्म और सांख्य योग नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरी कर्मयोग की परम्परा विवस्वान की है। विवस्वान ने मनु को, मनु ने इक्ष्वाकु को, इक्ष्वाकु ने राजर्षियों एवं प्रजाओं को योग का उपदेश दिया। उक्त सभी बातों का वेद और पुराणों में उल्लेख मिलता है। वेद को संसार की प्रथम पुस्तक माना जाता है जिसका उत्पत्ति काल लगभग 10000 वर्ष पूर्व का माना जाता है। पुरातत्ववेत्ताओं अनुसार योग की उत्पत्ति 5000 ई.पू. में हुई। गुरु-शिष्य परम्परा के द्वारा योग का ज्ञान परम्परागत तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलता रहा।
5000 वर्ष पहले भारत में हुई योग की उत्पत्ति
भारतीय योग जानकारों के अनुसार योग की उत्पत्ति भारत में लगभग 5000 वर्ष से भी अधिक समय पहले हुई थी। योग की सबसे आश्चर्यजनक खोज 1920 के शुरूआत में हुई। 1920 में पुरातत्व वैज्ञानिकों ने ‘सिंधु सरस्वती सभ्यता’ को खोजा था जिसमें प्राचीन हिंदू धर्म और योग की परंपरा होने के सबूत मिलते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता को 3300-1700 बी.सी.ई. पूराना माना जाता है। वेद, उपनिषद्, भगवद गीता, हठ योग प्रदीपिका, योग दर्शन, शिव संहिता और विभिन्न तंत्र ग्रंथों में योग विद्या का उल्लेख मिलता है। सभी को आधार बनाकर पतंजलि ने योग सूत्र लिखा। योग पर लिखा गया सर्वप्रथम सुव्यव्यवस्थित ग्रंथ है- योगसूत्र। योगसूत्र को पांतजलि ने 200 ई.पूर्व लिखा था। इस ग्रंथ पर अब तक हजारों भाष्य लिखे गए हैं, लेकिन कुछ खास भाष्यों का यहां उल्लेख लिखते हैं। व्यास भाष्य का रचना काल 200-400 ईसा पूर्व का माना जाता है। महर्षि पतंजलि का ग्रंथ योग सूत्र योग की सभी विद्याओं का ठीक-ठीक संग्रह माना जाता है। इसी रचना पर व्यासजी के ‘व्यास भाष्य’ को योग सूत्र पर लिखा प्रथम प्रामाणिक भाष्य माना जाता है। व्यास द्वारा महर्षि पतंजलि के योग सूत्र पर दी गई विस्तृत लेकिन सुव्यवस्थित व्याख्या। पतंजलि योगसूत्र के व्यास भाष्य के प्रामाणिक व्याख्याकार के रूप में वाचस्पति मिश्र का ‘तत्त्ववैशारदी’ प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। वाचस्पति मिश्र ने योगसूत्र एवं व्यास भाष्य दोनों पर ही अपनी व्याख्या दी है। तत्त्ववैशारदी का रचना काल 841 ईसा पश्चात माना जाता है। विज्ञानभिक्षु का समय विद्वानों के द्वारा 16वीं शताब्दी के मध्य में माना जाता है। योगसूत्र पर महत्वपूर्ण व्याख्या विज्ञानभिक्षु की प्राप्त होती है जिसका नाम ‘योगवार्तिक’ है। भोज के राज्य का समय 1075-1110 विक्रम संवत माना जाता है। धरेश्वर भोज के नाम से प्रसिद्ध व्यक्ति ने योग सूत्र पर जो भोजवृत्ति नामक ग्रंथ लिखा है वह भोजवृत्ति योगविद्वजनों के बीच समादरणीय एवं प्रसिद्ध माना जाता है। कुछ इतिहासकार इसे 16वीं सदी का ग्रंथ मानते हैं।

Tuesday, 2 June 2015

दिल्ली सरकार और जासूसी सेल

दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद जिसकी उम्मीद थी, हो वही रहा है। बल्कि यूं कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उम्मीद से भी अधिक हो रहा है। ज्यादातर लोगों को उम्मीद थी कि अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने के बाद काम कम करेंगे और सुर्खियों में रहने की कोशिश ज्यादा करेंगे क्योंकि यह उनके शगल में शामिल है। पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बाद भी आए दिन सुर्खियों में रहने के लिए तरह-तरह की नौटंकी करते रहते हैं। कभी बजट बनाने के लिए आम लोगों की राय लेने के नाम पर तो कभी खुले में कैबिनेट की बैठक करने के नाम पर आम जनमानस में भ्रम की बात छोड़ते रहते हैं। दिल्ली में ने बलात्कार की घटनाएं कम हो रही है, न बिजली पानी की समस्या दूर हो रही है और न ही करप्शन कम होने का नाम ले रहा है। दिल्ली सरकार के ऐंटी करप्शन ब्यूरो के लिए करोड़ों रुपये के उपकरण खरीदने का विवाद अभी थमा नहीं है कि सरकार ने एक और कदम आगे बढ़कर अपने सभी विभागों की ‘जासूसी’ कराने का निर्णय लिया है। इसके लिए एक स्पेशल सेल बनाई जा रही है, जिसमें करीब 25 टीमें विभिन्न विभागों के कार्यकलापों की ‘निगरानी’ करेंगी। इसके लिए करीब 25 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। दिल्ली सरकार के सूत्रों के अनुसार इस योजना के लिए गृह विभाग ने एक नोट तैयार कर लिया है, जिसे दिल्ली सरकार की आगामी कैबिनेट की बैठक में पेश किया जाएगा। विभाग ने जो नोट तैयार किया है उसमें दिल्ली सरकार के सभी विभागों के कार्यकलापों की जांच के लिए ‘निगरानी और मूल्यांकन सेल’ बनाने का निर्णय लिया है। ये सेल सभी विभागों के प्रॉजेक्ट, स्कीम, प्रोग्राम के अलावा उनके विभिन्न कार्यक्रमों की भी निगरानी करेगी। यह देखेगी कि इस मामले में कहां ढील बरती जा रही है और कहां सरकारी धनराशि का दुरुपयोग किया जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि इस सेल के अंतर्गत करीब 180 लोगों की टीम बनाने का निर्णय लिया गया है, जिसमें अलग-अलग 25 टीमें होंगी। हर टीम में सात अधिकारी होंगे, जिनमें से पांच को फील्ड स्टाफ के रूप में तैयार किया जाएगा। इस सेल में पांच डायरेक्टर होंगे और उसका मुखिया प्रॉजेक्ट डायरेक्टर होगा। इस सेल का बजट 20 करोड़ रुपये रखा गया है, जिसमें से उनकी स्टाफ की सैलरी पर करीब सात करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस बजट को बढ़ाया भी जा सकता है। सूत्र बताते हैं कि वैसे तो विभिन्न सरकारी विभागों के कामकाज की समीक्षा के लिए पहले से ही विजिलेंस, प्लानिंग, फाइनैंस व आॅडिट विभाग मौजूद हैं। लेकिन सरकार चाहती है कि उसके विभागों पर गंभीरता से निगरानी रखी जा सके, ताकि जन हित से जुड़ी योजनाओं आदि को समय पर पूरा किया जा सके।

Wednesday, 29 April 2015

नेपाल की त्रासदी से सबक लेना जरूरी

नेपाल में भूकंप की त्रासदी विभीषिका का एक भयानक दृश्य ही नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी भी है। प्राकृतिक आपदाओं पर मनुष्य का वश नहीं है, पर संभावित तबाही के असर को कम किया जा सकता है। समूचा भारत भूकंप-संभावित क्षेत्र है, करीब 60 फीसदी अधिक खतरे के दायरे में आता है, जिसमें देश के 38 शहर शामिल हैं। 2006 में गृह मंत्रलय के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैयार रिपोर्ट के अनुसार, इन शहरों में ज्यादातर निर्माण भूकंप-रोधी नहीं हैं, इसलिए भूकंप की स्थिति में ये भवन किसी भयावह बर्बादी का शिकार बन सकते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि दिल्ली में 80 फीसदी भवन तीव्र भूकंप का झटका बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे। जब देश की राजधानी में हालात ऐसे हैं, तो अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है कि अन्य शहरों की दशा क्या है। दिल्ली के अलावा श्रीनगर, गुवाहाटी, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे प्रमुख शहर भी संभावित खतरे वाले जोन में हैं। देश में शहरीकरण की तेज रफ्तार और विकास की अंधी दौड़ ने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। महानगरों से कस्बों तक आबादी का घनत्व तेजी से बढ़ रहा है। इस वजह से तंग गलियों में भी रिहायशी और व्यावसायिक बहुमंजिली इमारतें धड़ल्ले से बन रही हैं, जहां  से आपदा के वक्त निकलना संभव नहीं। भारतीय मानक ब्यूरो ने 1962 में पहली बार भूकंप-रोधी निर्माण का दिशा-निर्देश जारी किया था, जिसे आखिरी बार 2005 में संशोधित किया था। लेकिन इन निर्देशों के बारे में जागरूकता न के बराबर है तथा निर्माण में संलग्न संस्थाएं इसके प्रति बेपरवाह हैं। अनधिकृत कॉलोनियों को छोड़ दें, सरकार और निजी कंपनियों द्वारा बनाये भवनों में भी ब्यूरो के निर्देशों की अवहेलना की जाती है। प्रशासन की लापरवाही और  भ्रष्टाचार के कारण निर्माण कंपनियां सुरक्षा मानदंडों की खुलेआम अनदेखी करती हैं। मोटी कमाई के लालच में बिल्डर न सिर्फ भूकंप-रोधी मानदंडों को नजरअंदाज करते हैं, बल्कि अन्य सुरक्षा तैयारियों को लेकर भी बेपरवाह होते हैं। लाखों नागरिको की जान जोखिम में डालने वाले इस आपराधिक कृत्य में अधिकारी और राजनेता बराबर के शरीक हैं। जरूरी है कि बहुमंजिली इमारतों की कड़ाई से जांच की जाये और सुरक्षा मानदंडों की अनदेखी करनेवालों पर ठोस कार्रवाई हो।

Sunday, 26 April 2015

भूकंप क्यों आते हैं, कैसे इस खतरे से बचें!

देश में जब भूकंप आने की खबरें आती हैं तो मन में एक सवाल कौंध जाता है कि आखिर क्यों आता है भूकंप? इसका उत्तर जानने के लिए हमें पृथ्वी की संरचना को समझना होगा। पूरी धरती 12 टैक्टोनिक प्लेटों पर स्थित है। इसके नीचे तरल पदार्थ लावा है। ये प्लेटें इसी लावे पर तैर रही हैं और इनके टकराने से ऊर्जा निकलती है जिसे भूकंप कहते हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर ये प्लेटें क्यों टकराती हैं? दरअसल ये प्लेंटे बेहद धीरे-धीरे घूमती रहती हैं। इस प्रकार ये हर साल 4-5 मिमी अपने स्थान से खिसक जाती हैं। कोई प्लेट दूसरी प्लेट के निकट जाती है तो कोई दूर हो जाती है। ऐसे में कभी-कभी ये टकरा भी जाती हैं। ये प्लेटें सतह से करीब 30-50 किमी तक नीचे हैं। भूकंप का केंद्र वह स्थान होता है जिसके ठीक नीचे प्लेटों में हलचल से भूगर्भीय ऊर्जा निकलती है। इस स्थान पर भूकंप का कंपन ज्यादा होता है। कंपन की आवृत्ति ज्यों-ज्यों दूर होती जाती हैं, इसका प्रभाव कम होता जाता है। फिर भी यदि रिक्टर स्केल पर 7 या इससे अधिक की तीव्रता वाला भूकंप है तो आसपास के 40 किमी के दायरे में झटका तेज होता है। लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि भूकंपीय आवृत्ति ऊपर की तरफ है या दायरे में। यदि कंपन की आवृत्ति ऊपर को है तो कम क्षेत्र प्रभावित होगा। मतलब साफ है कि हलचल कितनी गहराई पर हुई है। भूकंप की गहराई जितनी ज्यादा होगी सतह पर उसकी तीव्रता उतनी ही कम महसूस होगी। मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत को भूकंप का सर्वाधिक खतरा है? इसके जवाब में हम पाते हैं कि इंडियन प्लेट हिमालय से लेकर अंटार्कटिक तक फैली है। यह पाकिस्तान बार्डर से सिर्फ टच करती है। यह हिमालय के दक्षिण में है। जबकि यूरेशियन प्लेट हिमालय के उत्तर में है। इंडियन प्लेट उत्तर-पूर्व दिशा में यूरेशियन प्लेट जिसमें चीन आदि बसे हैं कि तरफ बढ़ रही है। यदि ये प्लेट टकराती हैं तो भूकंप का केंद्र भारत में होगा। भूंकप के खतरे के हिसाब से भारत को चार जोन में विभाजित किया गया है। जोन दो-दक्षिण भारतीय क्षेत्र जो सबसे कम खतरे वाले हैं। जोन तीन-मध्य भारत, जोन चार-दिल्ली समेत उत्तर भारत का तराई क्षेत्र, जोन पांच-हिमालय क्षेत्र और पूर्वोत्तर क्षेत्र तथा कच्छ। जोन पांच सबसे ज्यादा खतरे वाले हैं। देश में भूकंप माइक्रोजोनिंग का कार्य शुरू किया गया है। इसमें क्षेत्रवार जमीन की संरचना आदि के हिसाब से जोनों के भीतर भी क्षेत्रों को भूकंप के खतरों के हिसाब से तीन माइक्रोजोन में विभाजित किया जाता है। दिल्ली, बेंगलूर समेत कई शहरों की ऐसी माइक्रोजोनिंग हो चुकी है। कम खतरे वाले क्षेत्र-दिल्ली रिज क्षेत्र, मध्यम खतरे वाले क्षेत्र-दक्षिण पश्चिम, उत्तर पश्चिम और पश्चिमी इलाका, ज्यादा खतरे वाले-उत्तर, उत्तर पूर्व, पूर्वी क्षेत्र। भूंकप की जांच रिक्टर स्केल से होती है। भूकंप के दौरान धरती के भीतर से जो ऊर्जा निकलती है, उसकी तीव्रता को इससे मापा जाता है। इसी तीव्रता से भूकंप के झटके की भयावहता का अंदाजा होता है। रिक्टर स्केल पर 5 से कम तीव्रता वाले भूकंपों को हल्का माना जाता है। साल में करीब 6000 ऐसे भूकंप आते हैं। जबकि 2 या इससे कम तीव्रता वाले भूकंपों को रिकार्ड करना भी मुश्किल होता है तथा उनके झटके महसूस भी नहीं किए जाते हैं। ऐसे भूकंप साल में 8000 से भी ज्यादा आते हैं। रिक्टर स्केल पर 5-5.9 के भूकंप मध्यम दर्जे के होते हैं तथा प्रतिवर्ष 800 झटके लगते हैं। जबकि 6-6.9 तीव्रता के तक के भूकंप बड़े माने जाते हैं तथा साल में 120 बार आते हैं। 7-7.9 तीव्रता के भूकंप साल में 18 आते हैं। जबकि 8-8.9 तीव्रता के भूकंप साल में एक आ सकता है। इससे बड़े भूकंप 20 साल में एक बार आने की आशंका रहती है। रिक्टर स्केल पर आमतौर पर 5 तक की तीव्रता वाले भूकंप खतरनाक नहीं होते हैं। लेकिन यह क्षेत्र की संरचना पर निर्भर करता है। यदि भूकंप का केंद्र नदी का तट पर हो और वहां भूकंपरोधी तकनीक के बगैर ऊंची इमारतें बनी हों तो 5 की तीव्रता वाला भूकंप भी खतरनाक हो सकता है। 8.5 वाला भूकंप 7.5 वाले भूकंप से करीब 30 गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है। भूकंप के खतरे से कैसे बचा जा सकता है। इस पर विचार करना जरुरी है। हमें यह निर्धारित करना होगा कि नए घरों को भूकंप रोधी बनाएं। जिस स्थान पर घर बना रहे हैं उसकी जांच करा लें कि वहां जमीन की संरचना भूकंप के लिहाज से मजबूत है या नहीं।

Tuesday, 7 April 2015

उनकी मौत भी हमारे ‘जिल्ले इलाही’ को जगा नहीं पा रही

खुदा तो सिर्फ जीवन देता है, पालन-पोषण तो किसान करता है। दुनिया को पालने वाले किसान मौत को गले लगा रहे हैं और हम डिनर पर टीवी के सामने बैठकर क्रिकेट के छक्कों पर ताली बजा रहे हैं। हम टीवी फोड़ देते हैं, बरतन तोड़ देते हैं, सोशल साइट्स पर अनसोशल हो जाते हैं, हमारी देशभक्ति जोर मारने लगती जब हमारी टीम हार जाती है। लेकिन हमारा खून नहीं खौलता जब हमें डिनर कराने वाला जिन्दगी की जंग हार जाता है। हमारा अन्नदाता जब फांसी के फंदे को अपने गले का हार बना लेता है, हम चुप रहते हैं, फिर भी हम संवेदनशील कहे जाते हैं, कथित सभ्य भी। जिसने सबको बनाया और जो मौत और तकदीर पर नियंत्रण रखता है, उस खुदा को भी उस वक्त खून के आंसू निकल आते होंगे जब अन्नदाता काल के गाल में समा जाता है। भारत कृषि प्रधान देश है, किसान हमारे अन्नदाता हैं। इन सारे जुमलों को सुनकर अब हंसी छूट जाती है। गुस्सा आता है। खून खौलता है। सियासत से अदब की दोस्ती बेमेल लगती है, कभी देखा है पत्थर पे भी कोई बेल लगती है। कोई भी अंदरूनी गंदगी बाहर नहीं होती, हमें इस हुकूमत की भी किडनी फेल लगती है। सरकार में राज्य से लेकर केंद्र तक को देखें, इसे अलहदा ना समझें क्योंकि सत्ता का स्वरूप एक ही होता है। बेमौसम हुई बारिश के बाद जम्हूरियत की आंखें उम्मीदबर हैं और दिल बेचैन। जुबां खामोश हैं, पर जेहन में सवालों का शोर। बेमौसम बारिश और ओलों से यूपी से लेकर एमपी तक में किसान मौत को गले लगा रहे हैं लेकिन उनकी मौत भी हमारे ‘जिल्ले इलाही’ को जगा नहीं पा रही है। किसानों का इरादा जख्मों पर मरहम लगाने का है, लोग भी हर तरह ‘साहेब’ के मुंह से इमदाद सुनने को बेसब्र हैं। अपने उघड़े जख्मों पर मरहम लगाने की उम्मीद लगा रहे हैं, दवा तो नसीब नहीं हुई लेकिन मध्य प्रदेश के कलेक्टर साहेब ने उस पर नमक जरूर रगड़ दिया। डीएम साहेब आॅडियो स्टिंग में कह रहे हैं, हम तो तंग आ गए हैं रोज-रोज की.....जो मरेगा इसी की वजह से मरेगा क्या... इतने बच्चे पैदा किए तो टेंशन से प्राण तो निकलेंगे ही...पांच-पांच, छह-छह छोरा-छोरी पैदा कर लेते हैं...और आत्महत्या कर हमको बदनाम करते हैं..। ये टेक्नोलॉजी है कि साहेब पकड़े गए। वैसे कमोबेश हम सूबे के साहेब की यही सोच है। मन की बात के जरिए जम्हूरियत से सीधे संवाद कर रहे हैं हमारे जिल्ले इलाही लेकिन उनतक हमारे मन की बात को कौन बताए। जब बीच वाले साहेब की सोच यही है। प्रधानमंत्री ने कॉरपोरेट को सुरक्षा देने के लिए अपनी पूरी ‘स्किल’ लगा दी है। पूंजीपतियों ने इसे अपने ‘स्केल’ पर खूब सराहा है। किसानों के मरने की ‘स्पीड’ वैसे ही बनी हुई है। किसान मरता है तो मरने दो। बस गाय बचा लो। गाय धर्म है, वोट है, फिर सत्ता में आने का जरिया है। किसानों की मौत से संसद का सीना ‘दु:ख और दर्द से छलनी हो जाय’ यह हादसा क्यों नहीं होता! किसानों के जज्बात को, इज्जत से जिन्दा रहने की जिद को नए रास्ते क्यों नहीं मिलते, अभी तक मैं समझ नहीं पाया। मेरे बाबा जी अक्सर कहा करते थे कि उत्तम खेती, मध्यम बान, निखिद चाकरी भीख निदान. पूर्वांचल के लोग इस कहावत को अच्छी तरह से समझ जाएंगे। फिर ऐसा क्या हुआ कि सबका ‘दाता’ भिखारी बनता गया। मुल्क के हुक्मरानों को न केवल इस गहराती गई त्रासदी का पता था बल्कि काफी हद तक वे ही इसके लिए जिम्मेदार भी थे। इतनी बड़ी आबादी के खेती पर निर्भर होने के बावजूद किसानों को लेकर केवल राजनीतिक रोटियां सेंकी गईं, क्योंकि परिणाम नीति और नीयत की पोल खोल देते हैं। मुझे घिन आती है उस देश की व्यवस्था पर जिसके गोदामों में अरबों का अनाज सड़ जाता है पर सरकार भुखमरी के शिकार लोगों में वितरित नहीं करती? साहेब कोई किसान यूं ही नहीं मरता। उसे मरने पर मजबूर करती है आपकी व्यवस्था, उसे मारता है बेटी की डोली न उठ पाने का दर्द, उसे मारता है अपने बच्चे को रोटी नहीं दे पाने की कसक, उसे मारती है अपने दुधमुंहे बच्चे को दूध देने के लिए बनिये की दुकान पर मंगलसूत्र रखने को मां की मजबूरी, उसे मारती है हमारी और आपकी चुप्पी।

Thursday, 2 April 2015

सोनिया पर गिरिराज की टिप्पणी अकारण नहीं

1 अप्रैल 2015 को बिहार के हाजीपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में बीजेपी के नेता व मोदी कैबिनेट के मंत्री गिरिराज सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर नस्ली टिप्पणी की। गिरिराज का टिप्पणी क्या करना, देश की राजनीति गरमा गई। कांग्रेस और मोदी सरकार के विपक्षी अन्य सभी दलों के नेताओं ने मोदी सरकार पर हमला बोलना तेज कर दिया। बात इतनी बढ़ गयी कि गिरिराज सिंह को माफी मांगना पड़ा और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने दूरभाष पर फटकार भी लगाई। यह घटना बेंगलुरु में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने से ठीक दो दिन पहले की है। ऐसे में यह सोचना समीचीन है कि आखिर गिरिराज सिंह ने सोनिया पर ऐसी टिप्पणी क्यों की। सोनिया पर भाजपा की ओर से इस तरह की टिप्पणी पहली बार  नहीं बल्कि समय-समय पर की जाती रहती है। ऐसे में यह दिखता है कि गिरिराज ने यह टिप्पणी अकारण नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत की है। 20 अप्रैल से मोदी सरकार बजट सत्र शुरु होने जा रहा है। भूमि अधिग्रहण विधेयक को पारित कराना मोदी सरकार ने अपनी प्रतिष्ठा बना लिया है। पिछली बार राज्यसभा में भूमि अधिग्रहण विधेयक पारित नहीं हो सका तो कैबिनेट की बैठक में फिर नौ संशोधनों के साथ नए भूमि अधिग्रहण विधेयक को हरी झंडी दे दी गई है। लोकसभा में यह विधेयक पास हो जाएगा, पर राज्यसभा में फिर दिक्कत आएगी। इस मुद्दे को लेकर कुछ किसान संगठन, अन्ना हजारे और कांग्रेस ने आन्दोलन छेड़ रखा है। जनता का ध्यान भी कमोवेश इसी मुद्दे पर केन्द्रित हो रहा था, क्योंकि वर्तमान में इसके अलावा कोई अन्य मुद्दा चर्चा में नहीं रहा। अब अचानक गिरिराज सिंह ने ऐसा नया मुद्दा कांग्रेस के हाथ में पकड़ा दिया है कि कुछ दिनों तक कांग्रेसी अब इसी मुद्दे पर केन्दित रहेंगे। ऐसे में देश की जनता का मूड भी इस मुद्दे से दूसरे मुद्दे की ओर चला गया।