Sunday, 14 June 2015

भारतीय राजनीति और मोदी ‘योग’ के सूत्र

संयुक्त राष्ट्र सभा और संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाए जाने की मंजूरी दे दी है। अब 21 जून को विश्व के कई देशों खासकर अमेरिका, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसों देशों में एक साथ योग करने की तैयारी कर रखी है। इसके पीछे भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को श्रेय दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सभा में इसका प्रस्ताव रखा था। भारत में 21 जून को होने वाले योग को गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड में दर्ज कराए जाने की तैयारी चल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का खास फोकस इस बिन्दु पर है। देश के भाजपा शासित राज्यों में भी योग दिवस को ऐतिहासिक बनाने की तैयारी जोरों पर चल रही है। प्रधानमंत्री लगातार सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को योग के फायदे बताने की कोशिश कर रहे हैं। वह योग को सीधे शारीरिक स्वास्थ्य से जोड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री चाहे जितनी सफाई दें पर राजनीतिक विश्लेषक इस बहाने नरेन्द्र मोदी की जन-जन तक राजनीतिक पैठ बनाए जाने की दिशा में बढ़ता एक मजबूत कदम के रुप में देख रहे हैं। शायद इसी वजह से विपक्ष के नेताओं द्वारा इसकी कहीं-कहीं मुखालफत भी की जा रही है। मोदी के इस कदम को योग के जरिए भारतीय राजनीति में पकड़ मजबूत करने के एक सूत्र के रुप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना है कि भारतीय संस्कृति से जुड़ा व्यक्ति नरेन्द्र मोदी के इस कदम से कहीं न कहीं उनसे जरूर प्रभावित होगा। नरेन्द्र मोदी के इस कदम से देश के हर युवा में उनकी अपनी अलग तरह की छवि उभरकर सामने आएगी। या यूं सीधे कहा जाए तो देश के युवा वर्ग का एक बड़ा तबका सीधे योग के जरिए नरेन्द्र मोदी से जुड़ जाएगा। उनके इस कदम के परिणाम क्या होंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा, पर तात्कालिक तौर पर मोदी के इस कदम से राजनीति करने वाले विपक्षियों में बौखलाहट बढ़ी है। योग की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘युज’ से हुई है जिसका अर्थ जोड़ना है। योग शब्द के दो अर्थ हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। पहला है-जोड़ और दूसरा है समाधि। जब तक हम स्वयं से नहीं जुड़ते, समाधि तक पहुंचना असंभव होगा। योग का अर्थ परमात्मा से मिलन भी है। भारत के छह दर्शनों में से एक है योग। ये छह दर्शन हैं- 1.न्याय 2.वैशेषिक 3.मीमांसा 4.सांख्य 5.वेदांत और 6.योग। योग के माध्यम से शरीर, मन और मस्तिष्क को पूर्ण रूप से स्वस्थ्य किया जा सकता है। तीनो के स्वस्थ्य रहने से आत्मा स्वत: की स्वस्थ महसूस करती है। लंबी आयु, सिद्धि और समाधि के लिए योग किया जाता रहा है।
संघ के सामने दिखने लगा संकट
संघ के सामने का संकट दिखने लगा है कि योग और युवाओं के जरिये अगर बाबा रामदेव का विस्तार होता चला गया, तो संघ के स्वयंसेवक भी एक वक्त के बाद बाबा रामदेव के साथ चले जायेंगे। क्योंकि स्वाभिमान ट्रस्ट के साथ जुड़े युवाओं को रोजगार मिलता है, जबकि संघ के स्वयंसेवक के तौर पर सेवा करने के एवज में कोई सहूलियत संघ अभी भी नहीं दे पाता है। यही वजह है कि उत्तराखंड के कई युवा स्वयंसेवक बाबा रामदेव के साथ जुड़ गये। दरअसल, मोदी सरकार यह भी समझ रही है कि अगर देशभर के युवा एक छतरी तले आ जायें, तो फिर विकास की जिस अवधारणा को लेकर वह देश में नयी लकीर खींचना चाह रही है, उसे खींचने में भी आसानी होगी। उसके बाद विवेकानंद के साथ दीनदयाल उपाध्याय के बारे में भी देश भर के छात्र-छात्राएं जानें, इस दिशा में भी काम होगा।
रामदेव के शिष्य सत्यवान को मिला महत्व 
21 जून के अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए 35 पेज की जो पुस्तिका निकाली जा रही है, उसमें योग और भारतीय संस्कृति के उन्हीं बिंदुओं का जिक्र किया गया है, जिनका जिक्र बाबा रामदेव पतंजलि के तहत करते रहे हैं। इसीलिए 21 जून को बाबा रामदेव ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में जब अपने योग कार्यक्रम के लिए जगह मांगी, तो उन्हें यह कह कर जगह नहीं दी गयी कि सुरक्षा का संकट पैदा हो जायेगा। फिर इसी के समानांतर बाबा रामदेव के दूसरे शिष्य सत्यवान को महत्व देना शुरू कर दिया। अब आलम यह है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने रामदेव के शिष्य सत्यवान से पीएमओ में मुलाकात की और अब संघ समर्थित सुदर्शन चैनल पर भी सत्यवान के योग कार्यक्रम वैसे ही शुरू हो गये हैं, जैसे कभी बाबा रामदेव के शुरू हुए थे। यानी पहली बार संघ ही नहीं, सरकार भी इस सच को समझ रही है कि अगर देशभर के युवा, योग और भगत सिंह के नाम पर जुड़ते चले गये, तो फिर राजनीतिक तौर पर भी वैचारिक जमीन खुद-ब-खुद तैयार होती चली जायेगी।
योग सभी धर्मों का महत्वपूर्ण अंग 
योग सभी धर्मों का महत्वपूर्ण अंग है। यह बात अलग है कि हर धर्म में इसे अलग-अलग रूप से स्वीकार्य किया गया है। वेद, पुराण आदि ग्रन्थों में योग के अनेक प्रकार बताए गए हैं। भगवान कृष्ण ने योग के तीन प्रकार बताए हैं-ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग। जबकि योग प्रदीप में योग के दस प्रकार बताए गए हैं-1.राज योग, 2.अष्टांग योग, 3.हठ योग, 4.लय योग, 5.ध्यान योग, 6.भक्ति योग, 7.क्रिया योग, 8.मंत्र योग, 9.कर्म योग और 10.ज्ञान योग। इसके अलावा होते हैं-धर्म योग, तंत्र योग, नाद योग आदि।
आष्टांग योग का सर्वाधिक प्रचलन
आष्टांग योग अर्थात योग के आठ अंग। इसका सर्वाधिक प्रचलन और महत्व है। यह आठ अंग सभी धर्मों का सार है। उक्त आठ अंगों से बाहर धर्म, योग, दर्शन, मनोविज्ञान आदि तत्वों की कल्पना नहीं की जा सकती। यह आठ अंग हैं-(1)यम (2)नियम (3)आसन (4)प्राणायम (5)प्रत्याहार (6)धारणा (7)ध्यान और (8)समाधि। उक्त आठ अंगों के अपने-अपने उप अंग भी हैं। वर्तमान में योग के तीन ही अंग प्रचलन में हैं- आसन, प्राणायाम और ध्यान। योग को प्रथम यम से ही सिखना होता है।
यम- सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह।
नियम- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान।
आसन- आसनों के अनेक प्रकार हैं। आसन के संबंध में हठयोग प्रदीपिका, घरेण्ड संहिता तथा योगाशिखोपनिषद् में विस्तार से वर्णन मिलता है।
प्राणायाम- नाड़ी शोधन और जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायम के भी अनेकों प्रकार हैं।
प्रत्याहार- इंद्रियों को विषयों से हटाकर अंतरमुख करने का नाम ही प्रत्याहार है।
धारणा- चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।
ध्यान- ध्यान का अर्थ है सदा जाग्रत या साक्षी भाव में रहना अर्थात भूत और भविष्य की कल्पना तथा विचार से परे पूर्णत: वर्तमान में जीना।
समाधि- समाधि के दो प्रकार है- संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात। समाधि मोक्ष है। मोक्ष प्राप्त करने के लिए उपरोक्त सात कदम क्रमश: चलना होता है।
योग का संक्षिप्त इतिहास 
योग का उपदेश सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने सनकादिकों को, पश्चात विवस्वान (सूर्य) को दिया। बाद में यह दो शखाओं में विभक्त हो गया। एक ब्रह्मयोग और दूसरा कर्मयोग। ब्रह्मयोग की परम्परा सनक, सनन्दन, सनातन, कपिल, आसुरि, वोढु और पच्चंशिख नारद-शुकादिकों ने शुरू की थी। यह ब्रह्मयोग लोगों के बीच में ज्ञान, अध्यात्म और सांख्य योग नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरी कर्मयोग की परम्परा विवस्वान की है। विवस्वान ने मनु को, मनु ने इक्ष्वाकु को, इक्ष्वाकु ने राजर्षियों एवं प्रजाओं को योग का उपदेश दिया। उक्त सभी बातों का वेद और पुराणों में उल्लेख मिलता है। वेद को संसार की प्रथम पुस्तक माना जाता है जिसका उत्पत्ति काल लगभग 10000 वर्ष पूर्व का माना जाता है। पुरातत्ववेत्ताओं अनुसार योग की उत्पत्ति 5000 ई.पू. में हुई। गुरु-शिष्य परम्परा के द्वारा योग का ज्ञान परम्परागत तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलता रहा।
5000 वर्ष पहले भारत में हुई योग की उत्पत्ति
भारतीय योग जानकारों के अनुसार योग की उत्पत्ति भारत में लगभग 5000 वर्ष से भी अधिक समय पहले हुई थी। योग की सबसे आश्चर्यजनक खोज 1920 के शुरूआत में हुई। 1920 में पुरातत्व वैज्ञानिकों ने ‘सिंधु सरस्वती सभ्यता’ को खोजा था जिसमें प्राचीन हिंदू धर्म और योग की परंपरा होने के सबूत मिलते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता को 3300-1700 बी.सी.ई. पूराना माना जाता है। वेद, उपनिषद्, भगवद गीता, हठ योग प्रदीपिका, योग दर्शन, शिव संहिता और विभिन्न तंत्र ग्रंथों में योग विद्या का उल्लेख मिलता है। सभी को आधार बनाकर पतंजलि ने योग सूत्र लिखा। योग पर लिखा गया सर्वप्रथम सुव्यव्यवस्थित ग्रंथ है- योगसूत्र। योगसूत्र को पांतजलि ने 200 ई.पूर्व लिखा था। इस ग्रंथ पर अब तक हजारों भाष्य लिखे गए हैं, लेकिन कुछ खास भाष्यों का यहां उल्लेख लिखते हैं। व्यास भाष्य का रचना काल 200-400 ईसा पूर्व का माना जाता है। महर्षि पतंजलि का ग्रंथ योग सूत्र योग की सभी विद्याओं का ठीक-ठीक संग्रह माना जाता है। इसी रचना पर व्यासजी के ‘व्यास भाष्य’ को योग सूत्र पर लिखा प्रथम प्रामाणिक भाष्य माना जाता है। व्यास द्वारा महर्षि पतंजलि के योग सूत्र पर दी गई विस्तृत लेकिन सुव्यवस्थित व्याख्या। पतंजलि योगसूत्र के व्यास भाष्य के प्रामाणिक व्याख्याकार के रूप में वाचस्पति मिश्र का ‘तत्त्ववैशारदी’ प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। वाचस्पति मिश्र ने योगसूत्र एवं व्यास भाष्य दोनों पर ही अपनी व्याख्या दी है। तत्त्ववैशारदी का रचना काल 841 ईसा पश्चात माना जाता है। विज्ञानभिक्षु का समय विद्वानों के द्वारा 16वीं शताब्दी के मध्य में माना जाता है। योगसूत्र पर महत्वपूर्ण व्याख्या विज्ञानभिक्षु की प्राप्त होती है जिसका नाम ‘योगवार्तिक’ है। भोज के राज्य का समय 1075-1110 विक्रम संवत माना जाता है। धरेश्वर भोज के नाम से प्रसिद्ध व्यक्ति ने योग सूत्र पर जो भोजवृत्ति नामक ग्रंथ लिखा है वह भोजवृत्ति योगविद्वजनों के बीच समादरणीय एवं प्रसिद्ध माना जाता है। कुछ इतिहासकार इसे 16वीं सदी का ग्रंथ मानते हैं।

Tuesday, 2 June 2015

दिल्ली सरकार और जासूसी सेल

दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद जिसकी उम्मीद थी, हो वही रहा है। बल्कि यूं कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उम्मीद से भी अधिक हो रहा है। ज्यादातर लोगों को उम्मीद थी कि अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने के बाद काम कम करेंगे और सुर्खियों में रहने की कोशिश ज्यादा करेंगे क्योंकि यह उनके शगल में शामिल है। पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बाद भी आए दिन सुर्खियों में रहने के लिए तरह-तरह की नौटंकी करते रहते हैं। कभी बजट बनाने के लिए आम लोगों की राय लेने के नाम पर तो कभी खुले में कैबिनेट की बैठक करने के नाम पर आम जनमानस में भ्रम की बात छोड़ते रहते हैं। दिल्ली में ने बलात्कार की घटनाएं कम हो रही है, न बिजली पानी की समस्या दूर हो रही है और न ही करप्शन कम होने का नाम ले रहा है। दिल्ली सरकार के ऐंटी करप्शन ब्यूरो के लिए करोड़ों रुपये के उपकरण खरीदने का विवाद अभी थमा नहीं है कि सरकार ने एक और कदम आगे बढ़कर अपने सभी विभागों की ‘जासूसी’ कराने का निर्णय लिया है। इसके लिए एक स्पेशल सेल बनाई जा रही है, जिसमें करीब 25 टीमें विभिन्न विभागों के कार्यकलापों की ‘निगरानी’ करेंगी। इसके लिए करीब 25 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। दिल्ली सरकार के सूत्रों के अनुसार इस योजना के लिए गृह विभाग ने एक नोट तैयार कर लिया है, जिसे दिल्ली सरकार की आगामी कैबिनेट की बैठक में पेश किया जाएगा। विभाग ने जो नोट तैयार किया है उसमें दिल्ली सरकार के सभी विभागों के कार्यकलापों की जांच के लिए ‘निगरानी और मूल्यांकन सेल’ बनाने का निर्णय लिया है। ये सेल सभी विभागों के प्रॉजेक्ट, स्कीम, प्रोग्राम के अलावा उनके विभिन्न कार्यक्रमों की भी निगरानी करेगी। यह देखेगी कि इस मामले में कहां ढील बरती जा रही है और कहां सरकारी धनराशि का दुरुपयोग किया जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि इस सेल के अंतर्गत करीब 180 लोगों की टीम बनाने का निर्णय लिया गया है, जिसमें अलग-अलग 25 टीमें होंगी। हर टीम में सात अधिकारी होंगे, जिनमें से पांच को फील्ड स्टाफ के रूप में तैयार किया जाएगा। इस सेल में पांच डायरेक्टर होंगे और उसका मुखिया प्रॉजेक्ट डायरेक्टर होगा। इस सेल का बजट 20 करोड़ रुपये रखा गया है, जिसमें से उनकी स्टाफ की सैलरी पर करीब सात करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस बजट को बढ़ाया भी जा सकता है। सूत्र बताते हैं कि वैसे तो विभिन्न सरकारी विभागों के कामकाज की समीक्षा के लिए पहले से ही विजिलेंस, प्लानिंग, फाइनैंस व आॅडिट विभाग मौजूद हैं। लेकिन सरकार चाहती है कि उसके विभागों पर गंभीरता से निगरानी रखी जा सके, ताकि जन हित से जुड़ी योजनाओं आदि को समय पर पूरा किया जा सके।