Monday, 28 April 2014

यह वोट बैंक की राजनीति नहीं तो और क्या?

लोकसभा के चुनाव जब अंतिम चरणों से गुजर रहे हैं ऐसे में ही मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा अचानक क्यों उछला! कांग्रेस के घोषणा पत्र में इस बार भले ही यह मुद्दा न हो लेकिन 2009 के  उसके चुनाव घोषणा पत्र में वह था। फिर यह न्यायालय में अटक गया। यही वजह है कि कांग्रेस ने इस बार इसे घोषणा पत्र में जगह नहीं दी। इसके बावजूद अब जब चुनाव अंतिम चरणों से गुजर रहे हैं यकायक यह मुद्दा उछला है। ऐसे में तो इसका कारण मतों के धु्रवीकरण का प्रयास ही है। चुनाव के इस दौर में जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, प. बंगाल प्रमुख हैं। इन राज्यों में मुस्लिम आबादी अधिक होने के कारण यह सवाल उछला है। तुष्टीकरण हो या बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक मतों के ध्रुवीकरण की राजनीति, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। संविधान की व्यवस्था में धर्म या आर्थिक दोनों को आरक्षण का आधार नहीं माना गया है। सामाजिक पिछड़ापन ही इसका आधार है। मुसलमानों में पिछड़ी जातियों को ओबीसी में आरक्षण प्राप्त है। तब मुस्लिम आरक्षण की अलग से मांग का क्या अर्थ है! यहां संघर्ष ओबीसी आरक्षण में कोटे में कोटे के बिंदु पर है। अजा-अजजा आरक्षण और ओबीसी आरक्षण में यहां फर्क है। इस्लाम में छुआछूत या जाति प्रथा को धार्मिक मान्यता नहीं है। इसके बावजूद मुसलमानों में भी व्यवहारतया जाति प्रथा घर कर गई है। हिंदुओं में जाति भेद से व्यथित अजा-अजजा समाज के जो लोग  बौद्घ धर्म में धर्मांतरित हुए हैं, उन्हें आरक्षण की सुविधाओं से महरूम नहीं किया गया है। इसका कारण है कि संविधान में बौद्घ और जैन धर्म को हिंदू धर्म का ही अंग माना गया है। लेकिन इन समुदायों में से इस्लाम कबूलने वालों को अजा-अजजा आरक्षण से बाहर माना जाता है। सामाजिक पिछड़ेपन के कारण वे ओबीसी आरक्षण के अधिकारी तो हो सकते हैं लेकिन अजा-अजजा आरक्षण के अधिकारी नहीं हो सकते। कांग्रेस कोटे में कोटे का जो प्रावधान विकसित करने की कोशिश कर रही है वहां आधार धर्म हो जाता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कांग्रेस के इन प्रयासों को नामंजूर कर दिया है और मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। तब लोकसभा चुनाव में यकायक यह सवाल क्योंकर उठाया जा रहा है! यह वोट बैंक की राजनीति के अलावा कुछ नहीं है।
 

Sunday, 27 April 2014

तीन सवालों के जवाब चाहिए

सोचिए कि 1991 से 1995 के हीरो डॉ मनमोहन सिंह 2014 में विलेन क्यों बन गये? वर्ष 2000 में भविष्य को लेकर जबरदस्त उत्साहवाले भारत के लोग आज हताशा में क्यों पहुंच गये? वर्ष 2002 में देश में बहुत ही खराब छविवाला व्यक्ति आज प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य व्यक्ति क्यों माना जाने लगा (जबकि उस समय उसकी अपनी पार्टी के बड़े नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उसे राजधर्म का पालन करने में विफल करार दिया था)? सोचिए, इन सवालों पर गंभीरता से. तार्किक और तथ्यसंगत जवाब तक यदि आप पहुंच जाते हैं, तो यह समझने में कोई दिक्कत नहीं होगी कि इस चुनाव के बाद देश की दिशा क्या होने वाली है.
1991 में पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी, तब अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब थी. राव ने रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे डॉ मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया. उनको अर्थव्यवस्था को खोलने की पूरी छूट दी गयी. डॉ मनमोहन सिंह 1972 से 1976 तक वित्त मंत्रलय में मुख्य आर्थिक सलाहकार थे और 1976 में वह वित्त मंत्रलय में सचिव बने. 1982 में इंदिरा गांधी ने उन्हें रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया और फिर 1985 में राजीव गांधी ने उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया. यानी नियंत्रित अर्थव्यवस्था के दौर में भी वह भारतीय अर्थव्यवस्था को दिशा देने वाले प्रमुख पदों पर रहे. इसके बाद वह 1991 से 1995 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को खोलने में पूरी शिद्दत से जुट गये. उनकी छवि जबरदस्त बनी. उस दौरान लगभग हर विपक्षी नेता (लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, चंद्रशेखर, वीपी सिंह, देवीलाल, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, रामकृष्ण हेगड़े, एनटी रामाराव आदि) और दल उदारीकरण के विरोध में था, लेकिन डॉ मनमोहन सिंह की छवि इतनी मजबूत थी कि सभी आंदोलन धराशायी रहे और जब 1996 में जनता दल की सरकार बनी तो डॉ मनमोहन सिंह के शिष्य पी चिदंबरम को वित्त मंत्री बनाया गया जिससे अर्थव्यवस्था डॉ सिंह द्वारा निर्धारित राह पर ही चलती रहे. भाजपा की सरकार आयी तो यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह ने वित्त मंत्रलय संभाला क्योंकि ये लोग भी उदार अर्थव्यवस्था के हिमायती थे. 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार बनी और सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया. लेकिन 1991 से 1995 के बीच अर्थव्यवस्था को उदारीकरण की राह पर डाल कर सर्वत्र प्रशंसा हासिल करने वाले डॉ मनमोहन प्रधानमंत्री के रूप में न सिर्फ सबसे कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में सामने आये, बल्किअर्थव्यवस्था को कुव्यवस्था और लूट का शिकार बनाने के कलंक का टीका भी उनके माथे पर लगा.
अभी जान इलियट की भारत पर एक किताब आयी है. इस किताब का नाम है 'इम्प्लोजन - इंडियाज ट्रिस्ट विद रीयलिटी'. जान 80 के दशक में फाइनेंशियल टाइम्स के लिए दिल्ली से रिपोर्टिग करते थे. 1988 से 1995 के बीच वह हांगकांग में रहे और फिर दिल्ली आ गये. ऊपर दिये गये सवालों का जवाब तलाशने में उनकी यह किताब काफी मदद कर सकती है. वह लिखते हैं कि अस्सी के दशक में जब मैं दिल्ली में था तब भ्रष्टाचार कम था और 1995 में जब मैं दिल्ली आया तो मुङो उम्मीद थी कि उदारीकरण के बाद भारत की आर्थिक संभावनाएं जबरदस्त रूप से बढ़ चुकी होंगी, लेकिन मैंने भारत में एक ऐसा समाज और सरकार देखी जो आर्थिक उदारीकरण की राजनीतिक संभाव्यता और फायदों को लेकर आश्वस्त नहीं थी. हर स्तर पर नेता देश की संपत्ति के दोहन के नये तरीके पा चुके थे और उनके साथ थे लालची विदेशी और बड़ी-बड़ी भारतीय कंपनियां व बैंक. ये लोग अनुबंध, अनुमति और लाइसेंस पाने के लिए नेताओं की जेबें भरने को आतुर दिख रहे थे. जान लिखते हैं कि अस्सी के दशक में जहां भ्रष्टाचार के पक्ष में गॉसिप करने का रिवाज नहीं था, अब यह चीज आम थी. कुछ मंत्रलयों के वरिष्ठ अधिकारियों का नाम प्रमुख परियोजनाओं और वित्तीय अनुमतियों के साथ जोड़ा जा रहा था. भारत एक ऐसी जगह के रूप में उभर रहा था जहां हर सौदे के पीछे गैरकानूनी लेन-देन है, जहां नेता और ब्यूरोक्रेट देश की संपत्ति लूटने के लिए उद्यमियों के साथ गंठजोड़ कर रहे हैं, जहां कल्याण के बजट को गरीबों से दूर रखा जा रहा है, जहां जमीन से लेकर कोयला व जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर डाका डालने का काम चल रहा है जिससे ये लोग अपनी आनेवाली पीढ़यिों का भविष्य पारिवारिक राजनीतिक साम्राज्यों के जरिये सुरिक्षत रख सकें. जान ने जो लिखा है, इसे शायद ही कोई नकारे. याद करिए कि केंद्र में जब पहली भाजपा सरकार बनी थी तो प्रमोद महाजन ने मंत्री बनने के तुरंत बाद क्या किया था? देवेगौड़ा सरकार में सीएम इब्राहिम ने क्या किया था? बाद की सरकारों में क्या-क्या होता रहा, यह तो सबको याद ही है. किसी भी देश या समाज को विफल करने के कारकों में भ्रष्टाचार सबसे अहम होता है. सरकारी और निजी, दोनों ही सेक्टर मानने लगते हैं कि पैसे के दम पर ठेका तो हासिल कर ही सकते हैं और यदि कोई दिक्कत आयी तो उससे भी बाहर निकल सकते हैं. यह माहौल उद्यमियों, राजनीतिकों व नौकरशाहों की गाड़ी की ग्रीजिंग करता रहा. इसने देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर 2011 के पहले के आर्थिक बूम को जन्म दिया जो कृत्रिम था. इस माहौल ने अक्षमता और कमजोर प्रदर्शन की गाड़ी में भी तेल भरा. लेकिन 2011 में यह भांडा बड़े स्तर पर फूटना शुरू हुआ. नीरा राडिया, 2जी और कोयला घोटाले जैसे लाखों करोड़ के खेल सामने आये. सारा उत्साह ध्वस्त हो गया मिडिल क्लास का. कुछ नये लोग सामने आये इसके खिलाफ और साथ ही कुछ अतिबुद्धिमान लोग जो इस खेल में शामिल थे. वे बहुत ही महीन तरीके से इस पूरे माहौल के खिलाफ माहौल बनाने में लग गये. कारपोरेट्स व प्रोफेशनल्स की मदद से वे माहौल बनाने में न सिर्फ कामयाब रहे, बल्कि अपने को विकल्प के तौर पर भी दिखाने लगे. 

Wednesday, 23 April 2014

कब आएगी खां साहब को सदबुद्धि!

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के एक नेता है खां साहब। उनकी हालत है कि काम के न काज के, मन भर अनाज के। मतलब साफ है कि खां साहब जब से राजनीति में है, उनके नाम पर कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है, जिसके लिए उन्हें याद किया जाए। रामपुर में उन्होंने जौहर विश्वविद्यालय नेताजी (मुलायम सिंह यादव) की कृपा से स्थापित कर रखा है, जिसे लेकर वह आए दिन इतराते रहते हैं। 16वीं लोकसभा के चुनाव में वह एक बार फिर सुर्खियों में है। वैसे उत्तर प्रदेश में वह सेकुलर होने का दंभ भरते हैं, पर आम आदमी के बीच वह कम्यूनल राजनीति के लिए ही पहचाने जाते हैं। मुजफ्फरनगर के दंगे को ले तो अभी भी वह भयवश वहां नही जा रहे हैं और इसके पीछे वह लंबी तकरीर किया करते हैं। देश के निर्वाचन आयोग द्वारा बार-बार उन्हें टोंका जा रहा है, पर वह मानने को तैयार नहीं हैं। वह खुद को आयोग से भी ऊपर मानते हैं। यह देश की राजनीति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूण नेताजी के लिए है। अभी उन्हें खां साहब की यह आदतें भले ही अच्छी लग रही हों, पर आने वाले दिनों में उनके लिए खतरनाक साबित होंगी। शायद इसका भान नेताजी को अभी नहीं हैं। हों भी क्यो? इस समय उनके बेटे अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद आजम खान के खिलाफ जारी किए गए इस कारण बताओ नोटिस के कुछ ही दिन पहले उनकी विवादास्पद टिप्पणियों के लिए आयोग ने उन पर उत्तर प्रदेश में प्रचार करने पर प्रतिबंध लगाया था। आयोग ने आजम खान से शुक्रवार शाम तक जवाब दाखिल करने को कहा है। अन्यथा आयोग आगे उनसे जिक्र किए बगैर निर्णय लेगा। इस बात की चेतावनी भी जारी की है। आयोग ने कहा कि उसने गहरी चिंता के साथ यह गौर किया कि प्रतिबंध के बावजूद आजम खान ने दुराग्रहपूर्वक, लगातार और जानबूझकर चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया है। नोटिस के मुताबिक खान ने संभल, रामपुर और बिजनौर में नौ और दस अप्रैल को भड़काऊ भाषण दिए जो समाज के विभिन्न समुदायों के बीच मौजूदा मतभेदों को बढ़ा सकते हैं और वैमनस्य पैदा कर सकते हैं। नोटिस में कहा गया है कि आयोग को ऐसी खबरें, शिकायतें मिली हैं कि चुनाव आयोग के 11 अप्रैल के आदेश का उसकी सही भावना के अनुरुप पालन करने की बजाय उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू के दौरान उक्त आदेश में दिए गए निर्देशों में गतिरोध पैदा करने का प्रयास किया। आयोग ने कहा कि खान ने चुनाव आयोग के खिलाफ बिलकुल निराधार और अभद्र आरोप लगाए हैं। उन्होंने प्रथम दृष्टया चुनाव आचार संहिता के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन किया है। आयोग ने इस महीने की शुरुआत में नरेन्द्र मोदी के करीबी सहयोगी अमित शाह और सपा नेता आजम खान के भड़काऊ भाषणों को लेकर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए उन पर उत्तर प्रदेश में चुनावी सभा करने, प्रदर्शन करने या रोड शो करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। साथ ही अधिकारियों को उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने का निर्देश दिया था। आयोग ने बाद में अमित शाह के खिलाफ लगे प्रतिबंध को शाह द्वारा दाखिल किए गए इस आश्वासन के बाद उठा लिया था कि वह ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे चुनावी माहौल बिगड़े। आजम खान ने यह आरोप लगाकर विवाद पैदा कर दिया था कि 1999 का कारगिल युद्ध मुसलमान सैनिको ने लड़ा था और जीता था। उन्होंने हाल में गाजियाबाद की एक चुनावी सभा में कहा था कि कारगिल की पहाडि़यों को फतह करने वाले सैनिक हिन्दू नहीं बल्कि मुसलमान थे। अब खां साहब अपने इन बयानों पर गौर नहीं कर रहे हैं। उलट आयोग पर दोषारोपण कर रहे हैं। हंसी तो तब आती है, जब समाजवादी पार्टी भी उनके इसी सुर में सुर मिलाती है। समझ में नहीं आता कि इन खां साहब को सद्बुद्धि कब आएगी।

Saturday, 12 April 2014

तुक्के पर नहीं सधा मुलायम सिंह का तीर!

 समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव भले ही डाक्टर राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश जी को अपना आदर्श पुरूष बताते है पर सच यह है कि उनके विचारों पर वह कभी एक कदम भी नहीं चलते। हो सकता कि इन महान पुरूषों के विचारों से उनका कोई लेना देना भी न हो। राजनैतिक फायदे के लिए एक बैनर लगा रखा है। मुलायम सिंह की राजनीतिक उंचाई में एक बात झलकती है वह है तीर तुक्के की राजनीति। हर समय उन्होंने परिस्थियों को देखकर तीर चलाया। तीर सही तुक्के पर बैठ गया तो राजनीति चमक गयी। सही कहा जाए तो समाजवादी पार्टी इसी तरह की राजनीति की उपज है। वैसे  भी हम सभी लोग यह बात भली-भांति जानतेे है कि इस समय देश में 16वी लोकसभा के गठन के लिए चुनाव हो रहे है। तमाम राजनीतिक दल और उनके प्रत्याशी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए चुनाव मैदान में है। सरकार किसकी बनेगी और प्रधानमंत्री कौन होगा यह 16 मई को आने वाले परिणाम केे बाद ही पता चलेगां। चुनाव जीतने के लिए तमाम तरह के हथंकडे अपनाने पड़ते है, झूठ-सच बोलना पड़ता है, गड़े मुर्दे उखाड़ने होते है ताकि मतदाताओं की नजर में अपनी और पार्टी की छबि बनाई जा सके तथा सत्ता प्राप्त की जा सके। इस समय चुनाव मैदान में एक-दूसरे को नीचा दिखाने और मेरी कमीज उसकी उसकी कमीज से ज्यादा साफ साबित करने के लिए नित नये स्वांग रचे जा रहे है जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं। लोकतन्त्र में पक्ष के साथ ही विपक्ष का भी होना निहायत ही जरूरी होता है वरना सत्तारूढ़ दल मनमानी पर उतर आता है और लोकतंात्रिक मूल्यों का ह्रास होने लगता है। कहा जाता है कि ‘एवरी थिंग इस फेयर इन लव एण्ड वार‘ इसी कहावत को हमारे स्टार प्रचारक और नेता सच साबित करने में लगे है। ये सारे नाटक, सारे आरोप, प्रत्यारोप, एक दूसरे के विरूद्ध अनर्गल बयानबाजी तथा व्यक्तिगत, जाति एवं धार्मिक हमले 16 मई आते-आते पूरी तरह से समाप्त हो जायेगे। यह बात हम सभी जानते है क्योंकि हर पांच साल बाद ये ‘री टेक‘ होता है। चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं के द्वारा एक दूसरे के विरूद्ध की गयी टिप्पणियों को नेतागण कतई दिल पर नहीं लेते है क्योंकि वे जानते है कि कब किससे और कहां हांथ मिलाना पड़ जाये। यही अपेक्षा पार्टी प्रमुख तथा चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी अपने मतदाताओं से भी करते है लेकिन चुनाव के दौरान मतदाता की बुद्धि और विवेक चूकि लच्छेदार भाषणो के जरिये कुन्द हो जाती है इसलिए उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आता है और वे मरने-मारने पर उतारू हो जाते है जबकि नेतागण चुनाव प्रचार का जब हेलीकाप्टर से लौटकर एयरपोर्ट पर उतरते है तो एक दूसरे का अभिवादन जरूर करते है और कुशल क्षेम भी पूंछते है। ऐसे में मैं समझ नहीं पाता हूं कि मतदाता आमने-सामने आने पर एक दूसरे के साथ भिड़ने तथा मरने मारने के लिए क्यों तैयार हो जाते है? क्यों उन नेताओं से सबक नहीं सीखते है जो चुनाव प्रचार के दौरान एक दूसरे के विरूद्ध आग बबूला होने वाले एअरपोर्ट की वीआईपी लाउन्ज में एक साथ बैठकर काफी पीते है।
अब मैं यहां सपा प्रमुख मुलायम सिंह के उस भाषण का जिक्र कर रहा हूं जिसके कारण तमाम थूका-फजीहत हो रहीं है, उन्हें तमाम भला बुरा कहा जा रहा है, लानत-मलानत की जा रहीं है-
‘‘मुलायम सिंह का कहना था कि लड़के भूलवश या नादानी में बलात्कार कर बैठते है, लिहाजा उन्हें फांसी जैसी कड़ी सजा नहीं होनी चाहिये। उनके मुताबिक सहमति से सम्बन्ध बनाने वाली एक परिचित लड़की ही किसी बात से नाराज होकर लड़के पर बलात्कार का आरोप लगा देती है।‘‘ सपा प्रमुख ने यह बयान कोई हड़बड़ी में नहीं दिया और न ही उनके जैसे वरिष्ठ राजनेता से यह उम्मीद की जा सकती है कि वे बगैर कुछ सोचे समझे ऐसे सवेदनशील मुद्दे पर बयान देंगे। अब प्रश्न यह उठता है कि तो फिर उन्होने ऐसा बयान क्यों दिया? पाठकों को यह समझना होगा कि मुरादाबाद के लगभग 17 लाख मतदाताओं में से 40 प्रतिशत मतदाता मुस्लिम हैं। सपा प्रमुख की सभा भी जिस जामा मस्जिद पार्क इलाके में हो रही थी वह भी मुस्लिम बहुल इलाका है। मुम्बई रेप कांड में फांसी की सजा पाने युवक भी मुस्लिम वर्ग के हैं। इस बात को ध्यान में रखकर नेताजी ने यह बयान दिया ताकि मतों का धुव्रीकरण हो सके और युवा वर्ग का समर्थन भी मिल सके। मैं इस बयान कि क्रिया और प्रतिक्रिया में नहीं जाना चाहता हूं और न ही इसका विश्लेषण करना चाहता हूं कि चुनाव में सपा को कितना फायदा होगा या नुकसान? इस बयान के मद्देनजर मैने केवल इतना समझा है कि यह बयान अन्य सवेंदनशील बयानों कि ही तरह ‘राजनीतिक बयान‘ है जिसका वास्तविकता से कुछ भी लेना देना नहीं। इसके पीछे की सोच केवल और केवल वोट हथियाना है। जैसा कि अब तक मुलायम सिंह करते आए हैं। यह बात अलग है कि जनता जागरूक हो रही है और हर बयान के मायने निकालने लगी है। फिलहाल यह पहली बार हुआ जब मुलायम सिंह का तीर तुक्के पर सही नहीं बैठ सका।

Friday, 11 April 2014

आश्चर्य! सत्ता पक्ष ही लड़ रहा विपक्ष से

16वीं लोकसभा के लिए हो रहा चुनाव वाकई में ऐतिहासिक है। इस चुनाव मेें पहली बार ऐसा दिख रहा है कि सत्ता पक्ष ही विपक्ष से लड़ रहा है। सोनिया गांधी, राहुल के साथ ही सभी पार्टियों के पास आज अपनी अच्छाई बताने के बजाय केवल नरेन्द्र मोदी की कमी गिनाना मुद्दा रह गया है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया और राहुल की सभाओं में तो लोग ऊबते नजर आ रहे हैं। राहुल अक्सर कहते हैं कि हम देश के लोगों को शक्ति देना चाहते हैं। उनसे कौन कहे कि देश की जनता देख रही है कि जिस व्यक्ति प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति की शक्ति छीन ली हो, वह देश के आम नागरिक को कैसे शक्ति दे सकता है। सच्चाई अगर देखी जाए तो आज सोनिया को देश सिर्फ इसलिए बर्दाश्त कर रहा है कि वह राजीव जी की पत्नी और इंदिरा गांधी की बहू हैं। राहुल और प्रियंका इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह राजीव जी के बेटे और इंदिरा जी के नाती है। इसके सिवाय इन लोगों के निजी जीवन की ऐसी कोई खास उपलब्धि नहीं है, जिससे लोग इन्हें याद कर सकें। अगर इन लोगों का आचरण ऐसे ही रहा तो धीरे-धीरे इन लोगों का यह वजन भी उसी तरह से खत्म हो जाएगा, जैसे महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के परिवार के लोगों का। राहुल को यह बताना चाहिए कि चुनाव का प्रचार करने के लिए आखिर देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह क्यों नहीं निकल रहे हैं। वह न तो मीडिया में दिख रहे हैं, न सोशल मीडिया में और न ही कार्यकर्ताओं के बीच। आखिर राहुल जी ने मनमोहन सिंह को कौन सी शक्ति दे रखी है कि वे इस कदर शक्तिहीन हो गए है कि चुनाव के दौरान अपनी बात भी नहीं कह पा रहे हैं। राहुल जी को यह भी बताना चाहिए कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में उनका संगठन कहां पर है, जिस प्रदेश से वह खुद चुनाव लड़ा करते हैं। सवाल है कि जो अपने संगठन और सरकार में बैठे लोगों को शक्ति नहीं देना चाहता है, वह आम आदमी को कैसे शक्ति दे सकेगा। पिछले दस साल से सरकार आखिर किसकी रही। राहुल जी जो सपने दिखा रहे हैं, उसे पूरा करने के लिए क्या दस साल कम होते हैं। ऐसा करके राहुल जी लोगों का ध्यान मौजूदा परिस्थियों से भटकाना चाह रहे, जिससे आम आदमी अब जान चुका है।

Thursday, 10 April 2014

आजम साहब! गुस्ताखी मॉफ

अरे भाई आजम साहब, आपने यह क्या किया। यूपी को ऊपी कहने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह को आप पर नॉज है। शायद इसी वजह से 2012 में विधानसभा चुनाव से पहले आपको समाजवादी पार्टी में लाने के लिए उन्होंने भरपूर अंदाज में नाटक किया था। उस नाटक में आपका भी गजब का किरदार रहा। शिवपाल भाई ने नेता प्रतिपक्ष पद का त्याग पत्र लिखकर आप को दिया और आप ने उसे फाडकर फेंक दिया। बेशक ऐसा करना उस उस लॉजिमी था। मुलायम सिंह के कहने पर ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आपको प्रयाग में लगने वाले कुंभ मेले का प्रभारी बनाया। अब जब भारतीय लोकतंत्र का महाकुंभ मेला चल रहा है तो आप अपने असली रंग में आ गए। उत्तर प्रदेश के किसी भी नागरिक को आपसे ऐसी उम्मीद नहीं रही। आप केवल मुसलमानों के मसीहा नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं में भी आपकी लोकप्रियता है। दुख है के आपने अपनी इस लोकप्रियता का सकारात्मक उपयोग करने की कोशिश नहीं की। आपको लगता है कि मुस्लिम कट्टरवाद दिखाकर ही हम मुलायम सिंह के करीबी बने रह सकते हैं। यह आपकी भूल है। जिस दिन मुलायम सिंह को लगेगा कि आप उनके लिए वोट का इंतजाम नहीं कर सकते, उसी दिन से आपका काम खतम। कम से कम अब तो सुधर जाईए। ऐसी  बातें बोलिए जो हर सम्पद्राय के लोगों को अच्छी लगे। जिस समय करगिल का युद्ध हुआ था, हमें याद है इस देश का हर नागरिक रोया था। क्या हिन्दू, क्या मुसलमान। क्या सिख, क्या ईसाई। भाई अखिलेश यादव की तारीफ करूंगा कि उन्होंने इस मसले पर अपनी राय बेबाकी से रखी। अगर आजम साहब आप मुसलमानों के हिमायती हैं तो आज तक मुजफ्फरनगर की धरती पर क्यों नहीं गए। जहां हमारी मुस्लिम माताओं ने अपने दिल के टुकड़ें को ठंड से मरते देखा। जहां हमारे मुसलमान नौजवान भाईयों ने आंख के सामने सपने को चूर होते देखा। अब चुनाव आ गया है तो आप मुसलमानों का मसीहा बनने की कोशिश में पूरी कौम को हाशिए पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा करने में आपकों शर्म आनी चाहिए शर्म।

Tuesday, 8 April 2014

लोकतंत्र पर धनबल का काला साया

तमिलनाडु़ में लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे 1318 उम्मीदवारों में से छह उम्मीदवार ऐसे हैं, जिनकी गणना करोड़पति नहीं बल्कि महाकरोड़पति में की जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। छह उम्मीदवारों के पास सौ करोड़ से अधिक की सम्पत्ति है। यह सम्पत्ति उनके द्वारा दिए गए शपथपत्र में घोषित की गयी है। इसके अलावा करोड़पति प्रत्याशियों की संख्या को तो कहने ही क्या है। नंदन नीलकेणि, अरुण जेटली, हेमामालिनी जैसे कई ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनके पास करोड़ों की सम्पत्ति है। पिछले 67 सालों में हमारे लोकतंत्र में कई बड़े बदलाव आए हैं। एक तरफ दलितों, पिछड़ों की भागीदारी मजबूत हुई है, तो दूसरी तरफ यह धारणा भी बनी है कि भारतीय लोकतंत्र धनबल का दास बन गया है। एक-दो दशक पहले तक बाहुबल का बोलबाला था, लेकिन चुनाव आयोग की सक्रियता से इस पर काबू पा लिया गया। बूथ पर कब्जे और डरा-धमका कर वोट डलवाने की बातें पुरानी हो चुकी हैं। अब चुनावों पर धनबल का काला साया है। आज आर्थिक संसाधन से हीन, किसी व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ने की कल्पना करना भी कठिन है। छोटी पार्टियों के लिए, नैतिकता में विश्वास रखनेवाली पार्टियों के लिए चुनाव गैरबराबरी का मैदान बन गया है। झारखंड में एक-एक प्रत्याशी सिर्फ  बूथ प्रबंधन पर औसतन 30 लाख रुपए खर्च कर रहा है। यह तो वह रकम है जो नेता-कार्यकर्ता स्वीकार कर रहे हैं। वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। आज लोकसभा चुनाव में खर्च की कानूनी अधिकतम सीमा 70 लाख रुपए कर दी गयी है। पर जमे-जमाए नेता इससे ज्यादा ही रकम खर्च करते हैं। अब जिन प्रत्याशियों और पार्टियों के पास इतना पैसा नहीं है, वो तो दौड़ में पहले ही पीछे हो जाते हैं। सवाल है कि आखिर चुनाव लड़ना इतना महंगा क्यों हो गया है? क्यों भाड़े के कार्यकर्ताओं की जरूरत पड़ रही है? क्यों वोटरों में पैसा बांटना पड़ता है? जवाब सीधा है अब मुख्यधारा की राजनीति बदलाव के लिए, अपने विचारों के लिए संघर्ष का औजार नहीं रह गयी है। यह धंधा बन गयी है। यानी, इस हाथ ले और उस हाथ दे। जब नेता जी चुनाव सिर्फ अपने निजी हित के लिए जीतना चाहते हैं, तो कार्यकर्ता और जनता भी क्यों न उनसे अधिक से अधिक उगाहने की सोचें। कुल मिला कर, राजनीति अब पूरी तरह पैसे का खेल बन चुकी है। बाहुबल हमारी राजनीति में सामंतवाद के वर्चस्व का प्रतीक था, तो अब धनबल राजनीति के पूंजीवाद में संक्रमण को बता रहा है। सांठगांठ पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) ने बड़े राजनीतिक दलों को इफरात धन उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है। यह धन पूरी राजनीति को विकृत कर रहा है। अब व्यापक चुनाव सुधारों के बिना धनबल पर लगाम मुश्किल है। यह दौर राजनीति पर पूंजीपतियों के कब्जे का दौर कहा जाय तो गलत नहीं होगा। राजनीति पर कब्जा जमाने के बहाने कहीं न कहीं सत्ता पर काबिज होने की पूंजीपतियों की यह साजिश है। ऐसे में देश में वैचारिक राजनीति का धरातल क्या बचा रह पाएगा। यह एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।

   

Sunday, 6 April 2014

मनमोहन को लग गई परिवर्तन की 'आहट'

मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री है। राजनीति में आने से पहले वह भारत जैसे महान देश के गवर्नर रहे। इस देश की महानता रही है कि जिसने परिवर्तन की आहट को महसूस किया और उसके अनुरुप खुद को ढाल लिया तो वह इतिहास पुरुष बन गया। अगर हम द्वापर युग की बात करे तो परिवर्तन की इसी आहट को महात्मा विदुर ने महसूस किया था। त्रेता युग में देखे तो परिवर्तन की इसी आहट को विभीषण ने महसूस किया था। वैसे भी भारत की महानता है कि यहां प्रकृति भी परिवर्तनशील है। यहां की ऋतुए परिवर्तनशील हैं। नदियां और पहाड़ और पठार परिवर्तनशील है। मौजूदा समय में शरद ऋतु परिवर्तित हो रही है और ग्रीष्म ऋतु दस्तक दे रहा है। सो इस गर्माहट के आहट को भांप जिम्मेदार नागरिक गर्मी की झुलसाती हुई तपिश से बचने का इंतजाम करने लगे हैं। कोई घर की एसी ठीक करा रहा है तो कोई कूलर ठीक करा रहा है। गांव में कोई चौबारा ठीक करा रहा है तो कोई ठंडे पानी का इंतजाम करने के लिए मटके की व्यवस्था कर रहा है। ऐसे ही इस देश की सत्ता के परिवर्तन का भी मौसम आ गया है। चुनाव का ऐलान हो गया है। अब रानीतिक दलों के पहलवान अपनी-अपनी बात लेकर मैदान में कूद गए है। फैसला यहां की आम जनता को करना है। यह जनता वही है जो पिछले एक दशक से मंहगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी की तपिश से झुलस रही है। इस तपिशभरी झुलसन के बचने के लिए उसके पास एक मौका आया है। इससे बचने के लिए वह कैसा इंतजाम करेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। पर इतना जरुर है कि इस देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इस परिवर्तन की आहट लग गयी है। हम ऐसा इस आधार पर कह रहे हैं कि उनके लिए मोतीलाल नेहरु मार्ग पर एक बंगला तैयार किया जा रहा है, जहां वह 16 मई को आने वाले लोकसभा परिणाम से पहले ही सेवानिवृत्ति प्रवास के लिए जा सकते हैं। पीएमओ कार्यालय ने केंद्रीय लोकनिर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) को 30 अप्रैल 2014 तक बंगले में सभी काम पूरा करने के निर्देश दिए हैं, ताकि मनमोहन  सिंह इस तारीख के बाद कभी भी वहां स्थानांतरित हो सकें। सीपीडब्ल्यूडी, 3 मोतीलाल नेहरु मार्ग पर बंगले का नवीनीकरण कर रहा है जिसे दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने फरवरी में खाली किया था।    मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी गुरशरण कौर ने बंगले के चयन से पहले फरवरी में इसे देखा था । फिलहाल वे 7 रेसकोर्स रोड स्थित प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास में रह रहे हैं। सन 1920 में निर्मित चार शयनकक्षों वाला यह बंगला 3.5 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला है और इसमें एक जैव विविधता पार्क भी है । इसमें कार्यालय की जगह है जो किसी प्रधानमंत्री की जरुरतों को पूरा करती है। बंगले पर दोबारा से रंग रोगन किया गया है और सभी तल, छत तथा प्लास्टर खराबी को दुरुस्त किया गया है। एसपीजी ने बंगले का कई बार सर्वेक्षण किया है। सीपीडब्ल्यूडी के अधिकारियों ने कहा कि एसपीजी जल्द ही जरुरतों की सूची सौंप सकती है, जिसके आधार पर सुरक्षा प्रबंधों के लिए ढांचा तैयार किया जाएगा। सुरक्षा इंतजामों में सीसीटीवी कैमरे और तलाशी बूथ शामिल होंगे। लुटियंस बंगले के आवंटन के साथ मनमोहन और उनकी पत्नी जीवनभर इस बंगले में रहने के हकदार होंगे। देश में चलरही सत्ता परिवर्तन की इस लहर को अगर मनमोहन सिंह ने समझ लिया है तो वह अकारण नहीं। आखिर पूरे जीवन उन्होंने इसी परिवर्तन को बारीकी से देखने का काम किया है और उसी के अनुरुप उसका अनुसरण भी किया है। मै समझ रहा हूं कि परिवर्तन की यह लहर अब बयार बन चुकी है। बयार चलेगी ही क्योंकि यह सत्ता के परिवर्तन की बयार है, मौसम के परिवर्तन की बयार है। इतना ही नही यह देश में एक राजनैतिक युग के परिवर्तन की बयार है।

Saturday, 5 April 2014

कौन करेगा विश्व गुरू भारत की बात

आज भारत रो रहा है। इस देश पर हुकूमत करने का सपना पाले लोगों में से कोई भी भारत को विश्व गुरू बनाने की बात नहीं कर रहा है। कोई कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रहा है तो कोई मोदी मुक्त भारत बनाने के नाम पर वोट मांग रहा है। अरे भारतवासियों उस दिन को याद करो, जब दुनिया में हम चीख-चीख कर कहा करते थे, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, आपस में हैं भाई-भाई। वह नारा कहां गया। 16वंी लोकसभा के चुनाव में कोई देश में मुसलमान के नाम पर वोट मांग रहा है तो कोई हिन्दू के नाम पर वोट मांग रहा है। कितना दुखद है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत बेटियों की अस्मत बचाने में, पर्यटकों की इज्जत बचाने में, देश को भ्रष्टाचार से बचाने में नाकाम रहा है और इस देश को दुनिया में अपमान सहन करना पड़ा। आज भी देश में किसान रो रहा है। शिक्षित नौजवार रोजगार पाने के लिए दर-दर की ठोकर खा रहा है। महिलाए देह व्यापार करने के लिए मजबूर हो रही हैं। आदिवासी इलाकों में उनके जीवन के साथ क्रूर मजाक किया जा रहा है। वोट की खातिर दंगे कराए जा रहे हैं। इसके उलट देश में पूंजीपतियों ने भारतीय संस्कृति को अपनी मुटठी में ले लिया है। जिस देश में लोग पैदल चलकर वोट मांगा करते थे, आज वहां हेलीकॉप्टर से प्रचार करने का ग्लैमर दिखाया जा रहा है। वोट को शराब और नोटों से खरीदा जा रहा है। लोगों को लालच दी जा रही है। हैरत है कि किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में (जो अब तक आ चुके हैं) भारत को विश्व गुरू का दर्जा दिलाने के दिशा में काम करने की बात नहीं की गयी है। किसी ने बेराजगार युवकों के हाथ में रोजगार उपलब्ध कराने की बात नहीं की है। किसी ने कृषि को रोजगार का दर्जा दिलाए जाने की बात नहीं की है। किसी ने राईट टू रोजगार की बात नहीं की है। महिलाओं पर चारों ओर हो रही हिंसा की घटनाओं पर रोक कैसे लगे, इसकी बात नहीं की है। बिगड़ते ग्रामीण परिवेश, नष्ट होते कुटीर उद्योग, धूमिल होती सांस्कृतिक विरासत को बचाने की बात किसी ने नहीं की है। सबसे दुखद तो यह रहा कि धर्म की ध्वजा को ऊंचा करने की बजाय एक धर्म गुरू ने तो बाकायदा एक पार्टी के लिए वोट देने का फतवा जारी कर दिया। उन्होंने ऐसा करके देश को साम्प्रदायिक विभाजन के कगार पर खड़ा कर दिया है। गांव में जहां लोग एक दूसरे परिवार को अपना भाई मानने की संस्कृति का पालन कर रहे हैं, वहीं देश के  नेता उनके बीच विभाजन की रेखा खड़ा कर रहे हैं। हद है अगर सोच यही रही तो हमारा देश कहां जाएगा। देश के मतदाताओं को इस बात पर बहस करनी होगी और खूब सोच समझकर निर्णय  लेना होगा। अगर निर्णय की इस घड़ी में चूक हो गयी तो पांच साल के लिए फिर पछतावा करना होगा।

Thursday, 3 April 2014

सोमनाथ से विश्वनाथ जय यात्रा मोदी का चुनावी मंत्र

भारतीय इतिहास में दो घटनाओं का जिक्र ज्यादातर किया जाता है। एक है अयोध्यानरेश राजा दशरथ के पुत्र राम की पैदल यात्रा और दूसरा यदुनंदन भगवान श्रीकृष्ण का मथुरा छोड़कर द्वारिका को नई नगरी बसाना। प्राय: भारतवासी इसे धार्मिक कहानी समझकर बड़े चाव से सुना करते हैं पर भारतीय दर्शन के मर्मज्ञ इसकी व्याख्या राजनीति के उत्तम मानदंड को स्थापित करने के रुप में करते हैं। दशरथ नंदन भगवान राम की अयोध्या से  श्रीलंका तक की यात्रा यूं ही नहीं रही। इस यात्रा के जरिए उन्होंने देश के उत्तरी भूभाग से लेकर दक्षिण के बीच एकात्म स्थापित किया। शायद यही कारण है कि आज उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक भगवान राम की पूजा होती है। दूसरा घटनाक्रम श्रीकृष्ण का लें तो मथुरा से द्वारिका जाने के पीछे भी यही कारण है। मथुरा से द्वारिका के बीच श्रीकृष्ण ने जो तादात्म्य स्थापित किया, उसका कोई और विकल्प नहीं हो सकता था। वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में यह दोनों घटनाए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की चुनावी यात्रा पर पूरी तरह से फिट बैठ रही है। इन दोनों घटनाओं का जिक्र करना हमने इस वजह से समीचीन समझा कि इन दिनों राजनीति के एक तबके द्वारा नरेन्द्र मोदी के दो स्थानों से चुनाव लड़ने पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं और उसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि दो स्थानों पर किसी भय के कारण चुनाव लड़ा जा रहा है। पर ऐसा नहीं है। हिन्दू आस्था में जिन 12 ज्योतिर्लिंगो की कल्पना की गई है। उनमें से एक गुजरात के सोमनाथ और दूसरा उत्तर प्रदेश के वाराणसी में विश्वनाथ के रुप में हैं। नरेन्द्र मोदी अकारण वाराणसी और वडोदरा दो स्थानों से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। इसके पीछे वही परिकल्पना है कि सोमनाथ से लेकर विश्वनाथ के बीच एकात्म स्थापित हो सके। जो हवां मोदी के पक्ष में गुजरात से चली है, उसका असर उत्तर प्रदेश तक दिखाई दे। इसके लिए मोदी का वाराणसी से चुनाव लड़ना बेहद अनिवार्य है। इस चुनाव में मोदी ने सोमनाथ से विश्वनाथ की जय यात्रा को ही अपना चुनावी मूल मंत्र बना रखा है। अब तक आ रहे सर्वेक्षणों से साफ हो गया है कि मध्य और उत्तर भारत में मोदी की हवा चल रही है। इस हवा को रोकने के लिए कांग्रेस के साथ कई अन्य राज्य स्तर के छोटे दलों ने पूरी कोशिश की, पर उसका कहीं कोई असर देखने को नहीं मिल रहा है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश से तो कांग्रेस का सफाया होता दिख रहा है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में जयललिता का असर देखने को मिल रहा है। ऐसे में कांग्रेस सशक्त विपक्ष की स्थिति में भी पहुंच पाने की हैसियत में नहीं दिख रही है। अमेरिका के झुकाव और कांग्रेस उम्मीदवारों में मची भगदड़ को देखने से भी साफ हो जा रहा कि मोदी की इस सोमनाथ से विश्वनाथ की जय यात्रा अब रुकने वाली नहीं है।

Tuesday, 1 April 2014

दिल पर रखकर हाथ कहिए, देश क्या आजाद है

रमेश पाण्डेय
हम हर साल आजादी की वर्षगांठ बड़ी धूमधाम से मनाते आए हैं, बड़े गर्व के साथ खुद को आजाद कहलवाते हैं लेकिन अफसोस कि जब सच सामने आता है तो हमारे पास मुंह तक छिपाने के लिए कोई जगह नहीं बचती। हम दुनिया की उन घूरती आंखों का सामना नहीं कर पाते जो हमें अभी भी उसी नजर से देखती हैं जिस नजर से किई गुनाहगार को देखा जाता है और देखे भी क्यों ना। यह भी तो हमारा ही गुनाह है जो हम आजादी के इस मतलब को समझ नहीं पाए, भूख से बिलखते लोगों के पेट की आग को शांत नहीं कर पाए। जिस मुल्क को हम अपना आशियाना बनाकर रहते हैं उस मुल्क को हम गरीबी और लाचारी की हालत में छोड़ देते हैं। अभी पिछले दिनों आई हंगर ग्लोबल इंडेक्स की रिपोर्ट ऐसे बद्तर हालातों का ही एक नमूना थी जिसके अनुसार भुखमरी के आंकड़ों में भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों से भी कहीं ज्यादा आगे निकल गया है और अब जिस नई रिपोर्ट की बात हम यहां करने जा रहे हैं। उसके अनुसार दुनिया में जितने भी गुलाम है उनमें से आधे भारत में हैं। बहुत से लोगों के लिए यह रिपोर्ट हैरानी का सबब बन सकती है लेकिन दुनिभर में मौजूद करीब 30 लाख गुलामों में से आधे गुलाम भारत की आबादी का हिस्सा हैं। वैश्विक स्तर के सूचकांक के अनुसार 30 लाख की यह आबादी उन लोगों की है जिन्हें जबरदस्ती मजदूर बनाया गया है, पैसे ना चुका पाने के कारण बंधुआ मजदूर बनाकर रखा गया है, मानव तस्करी के बाद न्यूनतम पैसों में अपना गुलाम बनाकर रखा गया है। ऑस्ट्रेलिया के मानवाधिकार संगठन द्वारा हुए इस अध्ययन के बाद यह बात प्रमाणित हुई है कि भारत में जो गुलाम मौजूद हैं उन्हें या तो मानव तस्करी के बाद वेश्यावृत्ति में ढकेला गया है या फिर घरेलू सहायक के तौर पर उनका शोषण किया जाता है. इतना ही नहीं इससे भी ज्यादा दुखद तथ्य यह है कि ऐसे मजदूरों की संख्या भी बहुत ज्यादा है जिन्हें परिवार समेत बंधुआ मजदूरी करनी पड़ती हैं और उनकी आने वाली पीढ़ी को भी यह दर्द सहना पड़ता है क्योंकि वह कुछ पैसे लेनदार को नहीं चुका पाए थे। स्वतंत्रता का अधिकार प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। वह अपनी मर्जी से जहां चाहे वहां जा सकता है, अपने बात दूसरों तक पहुंचा सकता है,पढ़ सकता है कुछ बन सकता है। लेकिन उनका क्या जो आज भी एक कठपुतली की भांति अपने मालिक के ही इशारों पर नाच रहे हैं। उनका क्या जो आजादी के इतने वर्षों बाद भी आजादी की सांस लेने के लिए एक खुली खिड़की का इंतजार कर रहे हैं, उनका क्या जो जिनकी चीख बंद दीवारों के बीच कैद होकर रह जाती है? भारत का यह चेहरा वाकई बेहद दर्दनाक है लेकिन फिर भी हम शान से कहते हैं कि हम आजाद है। 16वीं लोकसभा के चुनाव में हमे पल प्रतिपल इस पर विचार करने की जरुरत है कि आखिर आजाद देश में 65 साल बाद भी यह स्थिति क्यों बनी हुई है। इसके लिए कौन से कारक जिम्मेदार हैं। साथियों अब समय आ गया जब हम जाति, मजहब और धर्म से ऊपर उठकर बिना किसी लालच और लाग लपेट के यह सोंचे की कौन सा उम्मीदवार देश के लिए बेहतर होगा। इसकी सबसे बड़ी और अहम जिम्मेदार उन दस करोड़ नौजवान साथियों की है जो पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।