Wednesday, 5 February 2014

बरसेंगे लॉलीपॉप, और निकालेगी हमारी-आपकी जेब से ही

लगातार 10 हिट फिल्में दे सकनेवाला निर्माता-निर्देशक भी नहीं बता सकता कि हिट फिल्म बनाने का फॉर्मूला क्या है! लैपटॉप के वादे पर भैया अखिलेश की सरकार बन जाती है, लेकिन लैपटॉप बंट जाने के बाद वही जनता भैया अखिलेश से बिदकी नजर आती है! हाल-फिलहाल कोई चुनाव हुआ तो नहीं, लेकिन कई जनमत सर्वेक्षण ऐसा ही हाल बता रहे हैं. कहीं पर चावल-गेहूं एक-दो रुपये प्रति किलो के भाव पर देने से सरकार बच जाती है, तो कहीं कोई गहलोत साहब हर तरह का ‘जनकल्याण’ करके भी ऐतिहासिक हार का मुकुट पहन लेते हैं. राजस्थान में चुनाव से पहले करीब सवा करोड़ सीएफएल बल्ब बंटे, जिनमें गहलोत जी चमक रहे थे, लेकिन इससे उनकी चुनावी किस्मत नहीं चमक सकी. खबर पढ़ने को मिली कि अब भी कुछ लाख बल्ब राज्य सरकार के गोदामों में पड़े हैं. वसुंधरा सरकार परेशान है कि वह गहलोत की तसवीरों वाले इन बल्बों का करे तो क्या करे! ऐसे में बेचारे राजनेताओं के पास केवल यही विकल्प बचता है कि पुराने फॉमरूलों को आजमाते रहें और उसके बाद अपनी अच्छी किस्मत के लिए प्रार्थना करें. केंद्र की यूपीए सरकार अभी यही कर रही है. गैस सिलिंडरों की संख्या नौ से बढ़ा कर 12 करने का फैसला किया गया. इस उपकार का सेहरा युवराज के सिर पर बांधा गया. भले ही कोई पूछता रहे कि हुजूर, नौ की सीमा तो आपकी ही सरकार ने लगायी थी, तो आपका कौन-सा फैसला गलत है, पहले वाला या अभी वाला! जो भी हो, इस फैसले से यूपीए सरकार को यह कहने का एक मौका मिलेगा कि वह जनता की तकलीफों पर मरहम लगाती है. सीएनजी और पीएनजी के दाम घटा दिये गये. दाम बढ़ाये किसने थे, यह सवाल अब भूल जाइये न! क्या पता आनेवाले दिनों में पेट्रोल के दाम भी कुछ घटा दिये जायें! केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों को भी तोहफे बांटना शुरू कर दिया है. पीएफ पर ब्याज दर बढ़ाने की घोषणा हाल में की गयी है. पिछले साल सितंबर में उनके लिए महंगाई भत्ता 10 प्रतिशत बढ़ाने का फैसला किया गया था. अब खबर है कि महंगाई भत्ता 10 प्रतिशत और बढ़ाया जायेगा और इसकी घोषणा अगले महीने हो सकती है. पांच महीने के अंदर ही इसकी दोबारा समीक्षा कर्मचारी-हितों की चिंता में की जा रही है, या वोटों की चिंता में? महंगाई क्यों बढ़ी, इस सवाल को लेकर आप क्यों परेशान हो रहे हैं? आप तो महंगाई भत्ता लेकर खुश रहें.अब ताजा खबर यह है कि सरकार ने सातवां वेतन आयोग गठित कर दिया है. वैसे तो नया वेतन आयोग 10 साल बाद गठित किया जाता है. छठवां वेतन आयोग अक्तूबर, 2006 में गठित हुआ था, इसलिए केंद्र सरकार चाहती तो सातवां वेतन आयोग बनाने का फैसला ढाई साल बाद करती. लेकिन आपको याद ही होगा कि छठवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हो जाने का फायदा 2009 के चुनाव में मिला था. ओह, माफ करें, जनता की याद्दाश्त ज्यादा नहीं होती, होनी भी नहीं चाहिए! आप बस इतना याद रखें कि इस सरकार ने खाद्य सुरक्षा कानून बना दिया है. साथ में याद रखने लायक और कौन-कौन सी बातें हैं, यह आपको विज्ञापनों से पता चलता रहेगा. सरकार आपको याद दिलाती रहेगी कि मेट्रो बीते 10 सालों में चली है. याद रहे कि दिल्ली में मेट्रो रेल का श्रेय लेने की होड़ यूपीए-1 की सरकार बनने से भी पहले केंद्र की एनडीए और दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार के बीच चली थी. सरकार आपको याद दिलाती रहेगी कि अब मनरेगा के तहत अस्थायी मजदूरी गांव में मिल जाती है. लेकिन आप सरकार से यह न पूछें कि देश में बीते पांच वर्षो में कितना रोजगार सृजन हुआ है. बीते 10 वर्षो में समावेशी विकास (इन्क्लूसिव ग्रोथ) कब रोजगार-विहीन विकास (जॉबलेस ग्रोथ) में बदला और कब विकास ही ठहर गया, इस तरह के सवाल न ही पूछें तो अच्छा है.
चला-चली की बेला में यूपीए-2 सरकार लोगों के लिए अभी और भी बहुत-से लॉलीपॉप बांट दे, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं. आश्चर्य तो तब होगा, जब वह ऐसा न करे. यह उसके लिए बिना जोखिमवाला खेल है. इस दानवीरता से अगर वह वापस सरकार बनाने की हालत में आ जाये तो खेल बन गया समङिाए. हालांकि आज ऐसी उम्मीद शायद कट्टर कांग्रेसजनों को भी नहीं होगी! लेकिन अगर ऐसा करने से उसे होनेवाला नुकसान ही कुछ हल्का हो जाये तो क्या बुरा है! रही बात इस दानवीरता का सरकारी खजाने पर होनेवाला असर संभालने की, तो वह चिंता तो आनेवाली सरकार की होगी. वैसे भी रिवाज के अनुसार हर नयी सरकार आते ही बयान देती है कि उसे खजाना खाली मिला है. सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर है कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने मौजूदा सरकार के कार्यकाल में प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) पारित होने के बारे में नाउम्मीदी जता दी है. डीटीसी पारित करके मध्य वर्ग के लिए आय कर में छूट की सीमा बढ़ाने का फैसला उनके लिए एक बड़ा चुनावी हथियार बन सकता था. डीटीसी की तैयारियों का काम तो साल भर पहले ही पूरा हो चुका था. इसे लेकर कोई खास राजनीतिक गतिरोध भी नहीं रहा है. भाजपा के यशवंत सिन्हा की अध्यक्षतावाली संसदीय समिति ने अपना काम साल भर पहले ही पूरा कर दिया था और वे सरकार से पूछते रहे हैं कि इस विधेयक को पेश क्यों नहीं किया जा रहा! इससे तो लगता है कि डीटीसी का स्वरूप ऐसा नहीं बन पा रहा था, जो लोक-लुभावन हो. यानी भविष्य में भी डीटीसी लागू होने पर किसी बड़ी राहत की उम्मीद आम लोगों को नहीं करनी चाहिए. संभव है कि सरकार एक हाथ से थोड़ा देकर दूसरे हाथ से ज्यादा ले ले. दरअसल डीटीसी में एक तरफ आय कर छूट की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव है, तो दूसरी तरफ दुनिया भर की कर रियायतों को खत्म करने की भी बात है. इसलिए शायद स्थिति ऐसी बन रही हो कि डीटीसी लागू होने से काफी लोगों के लिए आय कर का बोझ घटने के बदले कुछ बढ़ ही जाये. खैर, अभी चुनावी बादलों ने घुमड़ना शुरू कर दिया है. कुछ लॉलीपॉप बरसेंगे, कुछ वादे बरसेंगे. लॉलीपॉप के पैसे अगली सरकार देगी, और निकालेगी हमारी-आपकी जेब से ही.